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सियासत में आर-पार: चंदे पर सवाल उठाना 'मन्दिर विरोधी' कैसे?

'सियासत' में मनीष कुमार का तीखे सवाल- चंदे पर सवाल उठाना मन्दिर विरोधी कैसे? चंपत राय के इस्तीफे के बाद आरएसएस के कृष्ण मोहन संभालेंगे राम मन्दिर ट्रस्ट की कमान।


Siyasat: अयोध्या में प्रभु श्री रामलला के चरणों में चढ़ाए गए चढ़ावे और चंदे में हुई कथित हेराफेरी का मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फेडरल देश' के चर्चित शो 'सियासत' में वरिष्ठ एंकर मनीष कुमार ने इस पूरे मामले की परतें खोलते हुए तीखे सवाल उठाए हैं। शो में यह गंभीर मुद्दा उठाया गया कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र में हुई इस विफलता पर सवाल पूछने वालों को 'मन्दिर विरोधी' या 'हिंदू विरोधी' का ठप्पा क्यों दिया जा रहा है?


क्या सिर्फ कुछ कर्मचारियों की गिरफ्तारी से जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी?
शो की शुरुआत करते हुए एंकर मनीष कुमार ने कहा कि अयोध्या में राम मन्दिर कोई साधारण मन्दिर नहीं है; यह देश के गरीब, मजदूर, किसान और आम भक्तों की गाढ़ी कमाई और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। विशेष जांच दल (SIT) की प्रारंभिक जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मन्दिर में चोरी एक-दो बार नहीं, बल्कि कई बार (CCTV फुटेज के अनुसार) लगातार होती रही।

प्रमुख सवाल:

"यदि किसी सरकारी बैंक में करोड़ों का घोटाला हो जाए, तो क्या सिर्फ कैशियर को गिरफ्तार करके मामला रफा-दफा कर दिया जाता है? क्या वहां के ब्रांच मैनेजर, ऑडिट सिस्टम और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से जवाब नहीं मांगा जाता? फिर देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण धार्मिक ट्रस्ट से सवाल पूछना गलत कैसे हो गया?"

राम मन्दिर और ट्रस्ट दो अलग चीजें: प्रशासनिक विफलता पर पर्दा डालने की कोशिश
शो में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई कि जब भी चंदे की सुरक्षा और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो सत्ता पक्ष या जुड़े संगठनों द्वारा इसे 'राम मन्दिर का विरोध' और 'हिंदू समाज को बांटने की साजिश' करार दिया जाता है।

रिपोर्ट में साफ किया गया कि भगवान रामलला करोड़ों लोगों की आस्था हैं, लेकिन 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' एक प्रशासनिक संस्था है। जिस तरह किसी अस्पताल के प्रबंधन पर सवाल उठाने का मतलब डॉक्टरों या मरीजों का विरोध नहीं होता, उसी तरह ट्रस्ट के मैनेजमेंट से जवाब मांगना आस्था पर हमला नहीं है।

चंपत राय का इस्तीफा और नए महासचिव कृष्ण मोहन की एंट्री
विवाद के लगातार बढ़ने के बाद, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया है। हालांकि, ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने चंपत राय का बचाव करते हुए कहा कि उनकी निष्ठा पर कोई सवाल नहीं है, बल्कि यह केवल एक 'असावधानी' थी।

लेकिन शो में विपक्ष और आलोचकों के हवाले से इस दलील पर भी सवाल उठाए गए कि इतने कड़े सुरक्षा मानकों, सीसीटीवी कैमरों और बैंकिंग प्रक्रियाओं के बावजूद बार-बार चोरी होना केवल 'असावधानी' है या एक गंभीर प्रशासनिक नाकामी?

इस बीच, ट्रस्ट के भीतर एक बड़ा फेरबदल करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी कृष्ण मोहन को ट्रस्ट का नया महासचिव घोषित कर दिया गया है और उन्हें मन्दिर प्रबंधन की पूरी बागडोर सौंप दी गई है। इस नियुक्ति पर भी विपक्षी दलों ने निशाना साधते हुए कहा कि जिस प्रबंधन की निगरानी में यह सब हुआ, उसी विचार के व्यक्ति को दोबारा इतनी बड़ी कमान सौंप दी गई।

एसबीआई (SBI) पर जिम्मेदारी टालने की कोशिश पर उठे सवाल
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने यह भी बयान दिया था कि शिकायत दर्ज कराने की पहली जिम्मेदारी भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की थी, क्योंकि बैंकिंग प्रक्रिया उनके साथ मिलकर चल रही थी।

इस पर शो 'सियासत' में तीखा पलटवार किया गया कि आम श्रद्धालुओं ने अपना पैसा एसबीआई को नहीं, बल्कि रामलला के नाम पर ट्रस्ट को दान किया था। बैंक न तो कर्मचारियों की नियुक्ति कर रहा था, न ही सीसीटीवी कैमरों की निगरानी। ऐसे में ट्रस्ट अपनी मूल जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर किसी दूसरे संस्थान पर दोष नहीं मढ़ सकता।

जवाबदेही शीर्ष तक तय हो
एंकर मनीष कुमार ने शो के अंत में यह स्पष्ट किया कि किसी भी संस्था में सबसे ऊपर बैठा व्यक्ति सीधे तौर पर हर अपराध में शामिल नहीं होता, लेकिन हर प्रशासनिक नाकामी की नैतिक जिम्मेदारी हमेशा शीर्ष नेतृत्व की होती है। अब देखना यह होगा कि क्या एसआईटी की इस जांच के बाद जवाबदेही ऊपर बैठे रसूखदारों तक तय होगी या फिर कहानी सिर्फ कुछ छोटे कर्मचारियों की बलि चढ़ाकर खत्म कर दी जाएगी।


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