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क्या दूर हो गए पुराने गिले-शिकवे? अखिलेश और आजम खान की मुलाकात के जानिए क्या हैं सियासी मायने

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक चार महीने पहले राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुँच चुकी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रामपुर जेल में बंद वरिष्ठ नेता आजम खान से करीब 70 मिनट तक गुप्त मुलाकात की।


उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अब महज चार महीने का वक्त बचा है और राज्य में सियासी शह और मात का खेल पूरी तेजी से शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव अपने कोर वोट बैंक 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को एकजुट करने में पूरी ताकत से जुट गए हैं। इसी रणनीतिक अभियान के तहत अखिलेश यादव रामपुर जेल पहुंचे, जहां उन्होंने पार्टी के संस्थापक सदस्य और दिग्गज नेता आजम खान से मुलाकात की।

जेल प्रशासन ने दोनों नेताओं के लिए केवल 45 मिनट की मुलाकात की अनुमति दी थी, लेकिन यह बैठक करीब 70 मिनट तक चली। जेल के बाहर निकलते ही अखिलेश यादव ने अपने पुराने तेवर दिखाते हुए विरोधियों पर करारा हमला बोला और आजम खान की जमकर तारीफ की। अखिलेश ने कहा— "आदरणीय आजम खान साहब से मिलकर आ रहा हूं। वे आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे।"

उर्दू भाषा में 'आजम' शब्द का अर्थ 'महान' या 'सबसे बड़ा' होता है। अखिलेश यादव द्वारा आजम खान को इस अंदाज में सबसे महान और बड़ा कहना महज एक भावुक बयान नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित छिपा हुआ है।

क्या महज हालचाल या 2027 के चुनाव का हिसाब-किताब?

चुनाव से ठीक पहले जब किसी राज्य का सबसे बड़ा विपक्षी नेता अपने जेल में बंद साथी से मिलने पहुंचता है, तो इसके मायने केवल हालचाल जानने तक सीमित नहीं रहते। अखिलेश यादव और आजम खान की इस मुलाकात का हिसाब-किताब कई बड़े सवाल खड़े करता है।

यह मुलाकात पिछले एक साल के भीतर दोनों नेताओं के बीच हुई तीसरी मुलाकात बताई जा रही है। इससे पहले अक्टूबर 2025 में अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे थे और नवंबर 2025 में आजम खान खुद लखनऊ जाकर अखिलेश से मिले थे। हालांकि दोनों के बीच संवाद का सिलसिला कभी पूरी तरह नहीं टूटा, लेकिन दो मुलाकातों के बीच लगभग 350 दिनों का लंबा अंतर भी रहा।

राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि अगर आजम खान समाजवादी पार्टी के लिए इतने ही अपरिहार्य और महत्वपूर्ण नेता हैं, तो यह मुलाकातें इतनी सीमित क्यों रहीं? क्या जेल से बाहर रहते समय दोनों के बीच कुछ गिले-शिकवे थे? या फिर आजम समर्थकों के बीच पनप रही नाराजगी को दूर करने के लिए चुनाव से ठीक पहले इस मुलाकात को नई सियासी अहमियत दी गई है?

ओवैसी के हमलों का जवाब और मुस्लिम नेतृत्व का सवाल

अखिलेश यादव का रामपुर दौरा अचानक नहीं हुआ है। इसके पीछे एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का आक्रामक प्रचार अभियान भी एक बड़ा कारण है। ओवैसी लगातार मुस्लिम बहुल इलाकों का दौरा कर रहे हैं और उनके निशाने पर सीधे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी हैं।

अखिलेश के रामपुर पहुंचने से ठीक चार दिन पहले, 18 अक्टूबर को ओवैसी ने रामपुर में ही एक जनसभा को संबोधित किया था। वहां ओवैसी ने अखिलेश यादव पर सीधा आरोप लगाया था कि सपा केवल मुसलमानों के वोटों का इस्तेमाल करती है, लेकिन संकट के समय उनके नेताओं (जैसे आजम खान) को बेसहारा छोड़ देती है।

ओवैसी के इस तीखे हमले के तुरंत बाद अखिलेश का रामपुर जाना यह साबित करता है कि सपा नेतृत्व को अपने मुस्लिम वोट बैंक और आजम समर्थकों के बीच उठ रहे सवालों का जवाब देना बेहद जरूरी हो गया था। अखिलेश को बखूबी अहसास है कि आजम खान को नजरअंदाज करने या उनसे दूरी बनाने की राजनीतिक कीमत पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुकानी पड़ सकती है।

"आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे": संदेश और मायने

रामपुर जेल से बाहर आने के बाद अखिलेश यादव ने मीडिया के सामने आजम खान और उनके परिवार का खुलकर बचाव किया। उन्होंने कहा कि आजम खान के परिवार ने जितने मुकदमों और अन्याय को झेला है, वैसा राजनीतिक इतिहास में बहुत कम देखने को मिलता है।

अखिलेश यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि आजम खान ने चुनाव लड़ने के लिए अपने परिवार या समर्थकों के लिए कोई सीट नहीं मांगी है, बल्कि पार्टी को संगठन के स्तर पर मजबूत करने और 2027 के चुनाव को जीतने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।

यह बयान देकर अखिलेश ने दो बड़े संदेश देने की कोशिश की है:

पार्टी कैडर को संदेश: आजम खान आज भी समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का अहम हिस्सा हैं और उनके अनुभवों का इस्तेमाल चुनाव जीतने में किया जाएगा।

विरोधियों को जवाब: सपा अपने पुराने और निष्ठावान नेताओं के साथ मजबूती से खड़ी है और ओवैसी या भाजपा का यह नैरेटिव गलत है कि सपा ने आजम परिवार को अकेला छोड़ दिया है।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव और आजम खान की यह 70 मिनट की मुलाकात राज्य के राजनीतिक समीकरणों को नया आकार दे सकती है। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने और ओवैसी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अखिलेश यादव का यह कदम बेहद कारगर साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या यह मुलाकात सपा के पारंपरिक वोट बैंक में पूरा भरोसा बहाल कर पाती है या विरोधियों के पास इस काट का कोई नया हथियार होगा।

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