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सरदार सरोवर बांध विवाद सुलझा, दावों को छोड़ने पर एमपी में छिड़ा सियासी घमासान

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में चार राज्यों का 30 साल पुराना नर्मदा विवाद खत्म, कांग्रेस ने उठाए मध्य प्रदेश के 7,669 करोड़ के दावे पर सवाल।


Siyasat: नर्मदा नदी को मध्य प्रदेश की जीवनरेखा माना जाता है, जिसका उद्गम एमपी की धरती से होता है। लेकिन इसी नदी पर बनी देश की सबसे बड़ी बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं में से एक 'सरदार सरोवर बांध परियोजना' को लेकर पिछले 30 सालों से चला आ रहा वित्तीय विवाद एक झटके में खत्म हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुए इस 'वन टाइम सेटलमेंट' के बाद अब मध्य प्रदेश की राजनीति पूरी तरह गरमा गई है। 'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने इस समझौते की इनसाइड स्टोरी और इस पर उठ रहे तीखे राजनीतिक सवालों का विस्तृत विश्लेषण किया है।


क्या है पूरा मामला और क्यों मचा है बवाल?
सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के निर्माण के चलते सबसे बड़ी कीमत मध्य प्रदेश को चुकानी पड़ी थी। राज्य के करीब 200 गांव जलमग्न हो गए, हजारों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन और जंगल पानी में समा गए, और सबसे बड़ी संख्या में आदिवासी परिवारों को विस्थापित होना पड़ा। इन्हीं भारी नुकसानों के मूल्यांकन के आधार पर मध्य प्रदेश ने पड़ोसी राज्य गुजरात से 7,669 करोड़ रुपये के भुगतान का दावा किया था कि वही गुजरात जिसे इस परियोजना से सबसे ज्यादा पानी, बिजली, सिंचाई और 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' व अहमदाबाद रिवरफ्रंट जैसे पर्यटन लाभ मिले हैं।

हैरानी की बात यह है कि इस नए समझौते के बाद मध्य प्रदेश का ₹7,669 करोड़ का दावा तो खत्म हो ही गया, उल्टे अब एमपी सरकार को गुजरात को 231.80 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा।

सरकार का दावा: ₹1,268 करोड़ की बड़ी राहत
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और भाजपा सरकार इस फैसले को एक 'ऐतिहासिक उपलब्धि' और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की मिसाल बता रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव का तर्क है:

"पहले की गणना और कानूनी विवादों के हिसाब से मध्य प्रदेश को गुजरात को करीब 1,500 करोड़ रुपये देने पड़ सकते थे। लेकिन इस वन टाइम सेटलमेंट के बाद यह देनदारी घटकर सिर्फ 231.80 करोड़ रुपये रह गई है। इस तरह प्रदेश को करीब 1,268 करोड़ रुपये की सीधी आर्थिक राहत मिली है।"

सरकार का कहना है कि दशकों पुराने कानूनी विवादों में उलझे रहने के बजाय आपसी सहमति से रास्ता निकालना राज्य के हित में था, और प्रदेश को बिजली व सिंचाई का लाभ लगातार मिलता रहेगा।

'डबल इंजन' सरकार और गुजरात कनेक्शन पर विपक्ष के सवाल
इस समझौते के बाद विपक्ष (कांग्रेस) ने मोहन यादव सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार को घेरते हुए कई तीखे सवाल दागे हैं:

अगर मध्य प्रदेश का ₹7,669 करोड़ का दावा सही था, तो उसे क्यों छोड़ दिया गया?

अगर यह दावा गलत था, तो इतने वर्षों तक भाजपा और अन्य सरकारें यह दावा क्यों करती रहीं?

क्या इस इतने बड़े वित्तीय सरेंडर से पहले कैबिनेट में चर्चा हुई या विधानसभा को विश्वास में लिया गया?

क्या इस समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक की जाएंगी? कांग्रेस ने इस पूरे मामले पर 'श्वेत पत्र' (White Paper) जारी करने की मांग की है।

विपक्ष का यह भी आरोप है कि चूंकि केंद्र में और सेटलमेंट कराने वाले गृह मंत्री अमित शाह मजबूत स्थिति में हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह दोनों का गृह राज्य गुजरात है, इसलिए मध्य प्रदेश के हितों की अनदेखी कर गुजरात को फायदा पहुंचाया गया है। विपक्ष ने महाराष्ट्र का उदाहरण भी दिया, जहां से फॉक्सकॉन सेमीकंडक्टर और टाटा-एयरबस जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स गुजरात शिफ्ट हो गए थे।

न्याय मिला या मजबूरी का समझौता?
7 जुलाई को दिल्ली में हुई इस बैठक में अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्यमंडियों ने हस्ताक्षर किए। अमित शाह ने कहा कि 'डबल इंजन' सरकार होने से यह मुमकिन हुआ और पानी चाहे जहां इस्तेमाल हो, फायदा देश के किसानों को ही मिलता है।

लेकन बड़ा सवाल अभी भी जस का तस बना हुआ है - क्या जिस राज्य (मध्य प्रदेश) ने इस विकास के लिए अपने जंगल, जमीन और आदिवासियों की सबसे बड़ी कुर्बानी दी, वन टाइम सेटलमेंट में उसके नुकसान का सही मूल्यांकन हुआ? क्या एमपी को उसके हिस्से का न्याय मिला, या सबसे ज्यादा कीमत चुकाने वाला राज्य अंत में राजनीतिक दबाव में सबसे बड़ा आर्थिक समझौता करने पर मजबूर हो गया?


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