नीतीश के बाद कौन? JDU में निशांत की एंट्री से शुरू हुआ ‘विरासत’ का खेल!
JDU की बैठक में निशांत कुमार की बढ़ती सक्रियता और विधायकों के सामने उनके भाषण ने पार्टी के भावी नेतृत्व को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। वहीं ललन सिंह समेत कुछ बड़े चेहरों की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर राजनीतिक समीकरणों और नीतीश कुमार की विरासत को लेकर सवाल बढ़ा दिए हैं।
राजनीति में जो हो रहा होता है, वह अक्सर मंच पर नहीं, मंच के आसपास दिखाई देता है। बिहार की जनता दल (यू) की विधानमंडल दल की बैठक भी कुछ ऐसी ही थी। ऊपर से देखें तो यह एक सामान्य बैठक थी। विधायकों और विधान पार्षदों का प्रशिक्षण, विकास का प्रेजेंटेशन, नीतीश कुमार की उपलब्धियों का बखान। लेकिन अगर तस्वीर को थोड़ा देर तक देखें, चेहरों को पढ़ें, अनुपस्थित लोगों की गिनती करें और बोलने वालों का क्रम समझें, तो यह बैठक सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही हलचल का आईना लगती है।
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक सवाल धीरे-धीरे आकार ले रहा है। सवाल यह नहीं कि अगला चुनाव कौन जीतेगा। सवाल यह है कि जनता दल (यू) के भीतर अगला नेता कौन होगा? और उससे भी बड़ा सवाल… क्या यह फैसला पार्टी करेगी, विधायक करेंगे, या इतिहास की तरह परिवार करेगा?
शुक्रवार की बैठक शायद इन्हीं सवालों के जवाब देने की कोशिश थी।
मंच पर एक नया चेहरा था। नाम—निशांत कुमार।
वही निशांत कुमार जिन्हें वर्षों तक राजनीति से दूर रहने वाला, सार्वजनिक जीवन से बचने वाला व्यक्ति माना जाता रहा। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। पहले चुनाव प्रचार में दिखे, फिर नेताओं से मुलाकातें हुईं, फिर संगठन में सक्रियता बढ़ी, और अब पहली बार पार्टी के विधायकों और विधान पार्षदों के सामने भाषण।
राजनीति में भाषण सिर्फ भाषण नहीं होता। यह अधिकार का सार्वजनिक प्रदर्शन होता है। संदेश होता है कि अब यह व्यक्ति सिर्फ सुनने नहीं, सुनाने भी आया है।
निशांत कुमार ने कहा कि जदयू नीतीश कुमार की विचारधारा पर चलेगी। सवाल यह नहीं था कि पार्टी किस विचारधारा पर चलेगी। सवाल यह था कि उस विचारधारा का वारिस कौन होगा?
और शायद पहली बार पार्टी ने मंच से उसका उत्तर देने की कोशिश की।
औपचारिक घोषणा नहीं हुई। किसी प्रस्ताव में नाम नहीं आया। लेकिन राजनीति में हर घोषणा शब्दों से नहीं होती। कई बार सिर्फ कुर्सी, माइक और मंच ही घोषणा कर देते हैं।
लेकिन राजनीति की सबसे दिलचस्प कहानी मंच पर नहीं, खाली कुर्सियों पर लिखी जा रही थी।
केंद्रीय मंत्री ललन सिंह नहीं आए।
कुछ वरिष्ठ विधायक नहीं आए।
अनंत सिंह नहीं आए।
अब कोई कह सकता है कि सांसदों को बुलाया ही नहीं गया था। पार्टी ने यही कहा भी। लेकिन राजनीति में अनुपस्थिति की भी अपनी भाषा होती है। अगर कोई बड़ा नेता किसी महत्वपूर्ण बैठक में नहीं दिखता, तो सवाल उठते हैं। और इस बार सवाल पार्टी के भीतर से ही उठे।
बताया गया कि करीब दो दर्जन विधायकों ने खड़े होकर पूछा कि ललन सिंह कहां हैं?
सोचिए… जिस बैठक का उद्देश्य एकजुटता दिखाना हो, वहां सबसे ज्यादा चर्चा उन लोगों की हो जो मौजूद ही नहीं हैं।
राजनीति में कई बार खाली कुर्सियां भरी हुई कुर्सियों से ज्यादा बोलती हैं।
लेकिन राजनीति की सबसे दिलचस्प कहानी मंच पर नहीं, खाली कुर्सियों पर लिखी जा रही थी।
केंद्रीय मंत्री ललन सिंह नहीं आए।
कुछ वरिष्ठ विधायक नहीं आए।
अनंत सिंह नहीं आए।
अब कोई कह सकता है कि सांसदों को बुलाया ही नहीं गया था। पार्टी ने यही कहा भी। लेकिन राजनीति में अनुपस्थिति की भी अपनी भाषा होती है। अगर कोई बड़ा नेता किसी महत्वपूर्ण बैठक में नहीं दिखता, तो सवाल उठते हैं। और इस बार सवाल पार्टी के भीतर से ही उठे।
बताया गया कि करीब दो दर्जन विधायकों ने खड़े होकर पूछा कि ललन सिंह कहां हैं?
सोचिए… जिस बैठक का उद्देश्य एकजुटता दिखाना हो, वहां सबसे ज्यादा चर्चा उन लोगों की हो जो मौजूद ही नहीं हैं।
राजनीति में कई बार खाली कुर्सियां भरी हुई कुर्सियों से ज्यादा बोलती हैं।

