पेपर लीक पर नया कानून: छात्रों का भविष्य बचेगा या सिर्फ सियासत?
लगातार हो रहे पेपर लीक पर 'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार का तीखा विश्लेषण। क्या नया सख्त कानून परीक्षा माफियाओं का नेक्सस तोड़ पाएगा?
Siyasat: देश में शायद ही कोई ऐसा युवा या छात्र हो, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हो और पेपर लीक के दंश से अछूता हो। NEET से लेकर राज्य लोक सेवा आयोग, पुलिस और शिक्षक भर्ती तक—लगभग हर परीक्षा विवादों के घेरे में है। सरकारें हर बार "दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा" का रटा-रटाया बयान देती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि परीक्षा माफियाओं का नेटवर्क आज भी बदस्तूर जारी है। 'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने इस पूरे सिस्टम, नए कानून और इस पर हो रही राजनीति का तीखा और सटीक विश्लेषण किया।
विपक्ष का तीखा प्रहार: गौरव गोगोई ने सरकार को घेरा
संसद में पेपर लीक रोकने के लिए लाए जा रहे नए और सख्त कानून पर चर्चा के दौरान भारी सियासी घमासान देखने को मिला। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुई पुलिस बर्बरता, पैलेट गन के इस्तेमाल और बिहार में छात्रों पर AK-47 से फायरिंग जैसी घटनाओं की याद दिलाई।
गोगोई ने सदन में सीधे सवाल दागे कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से जिन 47 लोगों को हटाया गया, वे कौन थे? शिक्षा मंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा क्यों दिया और उनके इस्तीफे के बावजूद NTA चेयरमैन अपने पद पर क्यों बने हुए हैं? गोगोई ने भाजपा सांसदों द्वारा संसद परिसर में फूल-मालाओं और मिथिला के पग से धर्मेंद्र प्रधान का स्वागत किए जाने पर भी कड़ा तंज कसा और पूछा, "क्या प्रधान जी पाकिस्तान के साथ जंग जीतकर लौटे थे?"
क्या नया कानून सिस्टम का भ्रष्टाचार मिटा पाएगा?
सरकार का दावा है कि नया कानून बेहद सख्त होगा। इसमें फास्ट-ट्रैक कोर्ट, दोषियों की संपत्ति जब्ती, भारी जुर्माना और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) जैसी डिजिटल निगरानी का प्रावधान है। लेकिन एंकर मनीष कुमार ने एक बेहद चुभता हुआ सवाल उठाया—क्या भ्रष्ट सिस्टम को AI ईमानदार बना सकता है?
अपराधी कानून से नहीं डरते, क्योंकि उन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण मिलता है। पेपर लीक केवल किसी एक पार्टी की विफलता नहीं है, बल्कि राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों के उदाहरण बताते हैं कि यह पूरे सिस्टम की नाकामी है।
छात्रों का दर्द और जवाबदेही का सवाल
उस छात्र की पीड़ा की कल्पना कीजिए, जिसके परिवार ने ज़मीन गिरवी रखकर उसे पढ़ने भेजा और परीक्षा के दिन पता चला कि पेपर पहले ही बिक चुका था। छात्रों को सिर्फ सख्त कानून नहीं, बल्कि ईमानदार परीक्षा प्रणाली चाहिए। क्या संसद यह तय करेगी कि पेपर लीक होने पर संबंधित अधिकारियों की नौकरी जाएगी, पेंशन रोकी जाएगी या उनकी संपत्ति जब्त होगी? या हर बार की तरह कुछ छोटे एजेंटों को पकड़कर फाइल बंद कर दी जाएगी?
संसद में चल रही यह बहस सिर्फ एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य का सवाल है। कानून बनाना आसान है, लेकिन छात्रों का टूटा हुआ भरोसा वापस जीतना मुश्किल। यदि यह नया कानून भी बिना निष्पक्ष जांच और अधिकारियों की जवाबदेही के लागू हुआ, तो यह सिर्फ एक 'कोरा कागज' साबित होगा।
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