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2029 की भविष्यवाणी या चुनावी बहस? अमित शाह के दावे पर क्यों भड़का विपक्ष!

गुजरात निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की शानदार जीत के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला। अमित शाह ने दावा किया कि 2029 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस लगातार चौथी बार हारेगी।


क्या 2029 के लोकसभा चुनाव का नतीजा अभी से तय हो गया है? देश के गृह मंत्री अमित शाह को यह कैसे पहले से मालूम है कि अगले आम चुनाव में कौन जीतेगा और कौन हारेगा? और अगर उन्हें इतना ही भरोसा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएगा, तो इस अटूट भरोसे का असली आधार क्या है? यह वह सवाल हैं जो आज देश के राजनीतिक गलियारों में जोर-शोर से गूंज रहे हैं। गुजरात निकाय चुनाव के नतीजों के बाद गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान ने भारतीय राजनीति में एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है।

राहुल गांधी पर हमला और 2029 में चौथी हार की भविष्यवाणी

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर तीखा प्रहार करते हुए दावा किया कि 2029 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी को लगातार चौथी करारी हार का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि देश की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चट्टान की तरह खड़ी है और 2029 में एनडीए एक बार फिर प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी करेगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब अगले लोकसभा चुनाव में अभी ढाई साल से ज्यादा का वक्त बाकी है, तो गृह मंत्री इतने यकीन के साथ चुनावी नतीजे की भविष्यवाणी कैसे कर रहे हैं?

चाय पर चर्चा की तस्वीरें और अमित शाह का बयान: क्या है कनेक्शन?

राजनीतिक जानकार इस बयान की टाइमिंग पर भी गंभीर सवाल उठा रहे हैं। अमित शाह का यह आक्रामक रुख ठीक उस समय सामने आया है जब राहुल गांधी के आवास पर 'चाय पर चर्चा' की तस्वीरें मीडिया में छाई हुई थीं। इस बैठक में 'इण्डिया' (INDIA) ब्लॉक के शीर्ष नेताओं के साथ-साथ छात्र संगठनों और सिविल सोसाइटी के प्रमुख चेहरे भी शामिल हुए थे। इसके अलावा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने का आह्वान और सड़कों पर छात्रों का बढ़ता आक्रोश सरकार पर दबाव बना रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी के इस बढ़ते जनसमर्थन और विपक्ष की साझा तस्वीरों से बीजेपी में बेचैनी बढ़ी है, जिसके चलते अमित शाह को खुद मोर्चा संभालना पड़ा?

गुजरात निकाय चुनाव और उपचुनावों की जीत का हवाला

अपने दावों को मजबूत करने के लिए अमित शाह ने हाल ही में आए गुजरात निकाय चुनाव के नतीजों का सहारा लिया, जहां बीजेपी ने 104 में से 90 सीटों पर कब्जा किया है। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में हुए उपचुनावों का जिक्र करते हुए कहा कि जनता ने राहुल गांधी और विपक्ष के 'झूठ' को पूरी तरह से नकार दिया है। अमित शाह का तर्क है कि कांग्रेस 41 सालों से गुजरात में कोई चुनाव नहीं जीत पाई है, इसलिए उसे एसआईआर (SIR) या ईवीएम पर आरोप लगाने के बजाय अपनी लगातार होती हार पर गहन आत्मचिंतन करना चाहिए।

विपक्ष का पलटवार: क्या चुनाव आयोग और बीजेपी ने नतीजे तय कर लिए?

अमित शाह के इस बयान के सामने आते ही विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा और 'सीजेपी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने गृह मंत्री के इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अभिजीत दीपके ने तीखा तंज कसते हुए पूछा कि अगर अमित शाह इतने विश्वास के साथ कह रहे हैं कि 2029 में एनडीए ही जीतेगा, तो क्या गृह मंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पहले से ही बैठकर यह तय कर लिया है कि चुनाव में किसे जिताना है और किसे हराना है?

चुनावी निष्पक्षता पर उठते सवालों के बीच गृह मंत्री का दावा

वैसे देखा जाए तो अमित शाह एक मंझे हुए राजनेता हैं और चुनाव से पहले अपनी पार्टी का मनोबल बढ़ाना उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हों और चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हों, तब देश के गृह मंत्री का चुनाव से ढाई साल पहले ही नतीजों का ऐलान कर देना कई गंभीर संशयों को जन्म देता है।

बीजेपी का आत्मविश्वास या राजनीतिक दबाव का असर?

अमित शाह का यह दावा कि देश की जनता प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़ी है, बीजेपी के जमीनी जनाधार का प्रतीक हो सकता है। लेकिन जिस तरह से विपक्ष, छात्र और नागरिक समाज एक मंच पर आकर 'वोट चोरी' और लोकतांत्रिक अधिकारों का मुद्दा उठा रहे हैं, उसने सत्ता पक्ष को सोचने पर मजबूर जरूर किया है। अब देखना यह होगा कि 2029 का यह दावा महज एक राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाता है या फिर विपक्ष इस सवाल को जनता की अदालत में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने में कामयाब होता है।

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