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प्रियंका गांधी के बेटे की प्रदर्शनी पर सियासी संग्राम, क्या छात्रों के आंदोलन की तस्वीरों से डर गई सरकार?

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और रॉबर्ट वाड्रा के बेटे, आर्टिस्ट रेहान वाड्रा की बीकानेर हाउस (दिल्ली) में आयोजित फोटो प्रदर्शनी "नो आइडियाज इज फाइनल" को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।


क्या गांधी परिवार की अगली पीढ़ी की राजनीति में औपचारिक एंट्री की जमीन तैयार हो रही है? क्या प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा के बेटे रेहान वाड्रा जल्द ही सक्रिय राजनीति में कदम रखने वाले हैं? यह सवाल अचानक इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि दिल्ली के ऐतिहासिक बीकानेर हाउस में आयोजित रेहान वाड्रा की एक फोटो प्रदर्शनी को लेकर बहुत बड़ा राजनीतिक तूफान आ गया है।

इस पूरे विवाद का तार दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ महीनों से चल रहे युवाओं और छात्रों के आंदोलनों से जुड़ा है। इन प्रदर्शनों में कभी पेपर लीक का मुद्दा था, तो कभी चुनाव आयोग के एसआईआर (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग। अब खुद सांसद प्रियंका गांधी अपने बेटे के समर्थन में उतर आई हैं और सरकार से सवाल पूछ रही हैं।

क्या था विवाद और बीकानेर हाउस का फरमान?

रेहान वाड्रा एक विजुअल आर्टिस्ट हैं। बीकानेर हाउस में उनकी एक फोटो प्रदर्शनी तय की गई थी, जिसका नाम था— "नो आइडियाज इज फाइनल" (No Ideas Is Final)। इस प्रदर्शनी में कुल 105 तस्वीरें लगाई जानी थीं। लेकिन बुधवार को प्रदर्शनी शुरू होने से ठीक कुछ घंटे पहले राजस्थान सरकार के नियंत्रण वाले बीकानेर हाउस प्रशासन ने रेहान वाड्रा को नोटिस थमा दिया।

प्रशासन ने रेहान को 105 में से 74 तस्वीरों को तुरंत हटाने या उनकी जगह दूसरी तस्वीरें लगाने का फरमान सुनाया। इसके लिए उन्हें महज 30 मिनट का समय दिया गया। जिन 74 तस्वीरों पर रोक लगाई गई, उनमें से ज्यादातर तस्वीरें पिछले छः महीनों के दौरान दिल्ली में हुए छात्र आंदोलनों, पुलिस की धक्का-मुक्की और युवाओं के विरोध प्रदर्शनों की थीं।

तिरंगे की फोटो और खाली फ्रेमों पर भी एतराज!

मामला सिर्फ छात्र आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा। रेहान वाड्रा का आरोप है कि प्रदर्शनी में लगी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) की दो तस्वीरों को भी हटाने का मौखिक आदेश दिया गया। जब उनकी टीम ने इस पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा, तो अधिकारियों ने कोई लिखित जवाब नहीं दिया और रेहान की अनुपस्थिति में उन तस्वीरों को खुद ही हटा दिया।

इसके बाद रेहान की टीम ने विरोध स्वरूप हटाई गई तस्वीरों की दीवारों पर केवल खाली फ्रेम (Empty Frames) टांग दिए। लेकिन अधिकारियों को वह खालीपन भी चुभने लगा और उन खाली फ्रेमों को भी हटाने का निर्देश दे दिया गया। यानी दीवार पर जो तस्वीरें थीं उनसे भी ऐतराज था, और जो जगह खाली बची उससे भी परेशानी थी।

सत्ता की आपत्ति: 'समय और संदर्भ सही नहीं'

बीकानेर हाउस प्रशासन ने तस्वीरें हटाने के पीछे तर्क दिया कि यह कदम मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था, परिस्थितियों और उनकी प्रशासनिक नीति को ध्यान में रखकर उठाया गया है। उनके मुताबिक इन तस्वीरों में 'पॉलिटिकल मटेरियल' मौजूद था।

हालांकि, रेहान वाड्रा का कहना है कि उन्होंने 15 अक्टूबर को ही पूरी प्रदर्शनी का लेआउट प्रशासन को सौंप दिया था। अगर तस्वीरों पर कोई आपत्ति थी तो समय रहते क्यों नहीं बताया गया? रेहान का कहना है कि उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल के झंडों या नारों वाली तस्वीरों को पहले ही हटा दिया था और वे केवल एक दर्शक व नागरिक के रूप में आंदोलन की मानवीय संवेदनाओं और ऊर्जा को प्रस्तुत कर रहे थे।

राष्ट्रवाद, तिरंगा और सरकार से असहज सवाल

इस पूरी घटना ने देश में जारी राष्ट्रवाद की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा किसी एक राजनीतिक दल की बपौती या निजी संपत्ति नहीं है। वह हर उस नागरिक का है जो इस देश में रहता है—चाहे वह किसान हो, मजदूर हो, छात्र हो या सरकार की नीतियों का आलोचक हो।

जब सरकार के पक्ष में तिरंगा लेकर बाइक रैलियां निकाली जाती हैं या 'हर घर तिरंगा' अभियान चलता है, तो उसे देशभक्ति माना जाता है। लेकिन जब वही तिरंगा हाथ में लेकर कोई नागरिक या छात्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, तो उस पर पुलिसिया दमन देखने को मिलता है। हाल ही में जंतर-मंतर पर तिरंगा लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी भी इसी मानसिकता का उदाहरण है।

मां प्रियंका गांधी का तीखा हमला और व्यापक प्रभाव

इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया पर अपने बेटे का हौसला बढ़ाया। प्रियंका ने लिखा, "जब सत्ता में बैठा ताकतवर व्यक्ति किसी दूसरे के विवेक से डरने लगता है, तो उसे एहसास नहीं होता, लेकिन वह उस ताकत को पहले ही खो चुका होता है जिसे बचाने की वह कोशिश कर रहा होता है।" मीडिया से बात करते हुए उन्होंने इसे केवल रेहान की बात न बताकर देश भर के युवाओं और कलाकारों की आवाज दबाने का प्रयास ठहराया।

दिलचस्प बात यह भी है कि दिल्ली में यह पाबंदी केवल रेहान वाड्रा की आर्ट शो तक सीमित नहीं है। जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध पंजाबी गायक दिलजीत दोसांझ के म्यूजिक कंसर्ट को भी दिल्ली पुलिस ने अनुमति देने से इनकार कर दिया है।

बीकानेर हाउस का यह कदम क्या प्रशासनिक नियमों का पालन है या सरकार के भीतर किसी गहरी बेचैनी और असहमति के डर का नतीजा है? रेहान वाड्रा ने स्पष्ट किया है कि वे सेंसरशिप के सामने नहीं झुकेंगे और अपनी पूरी तस्वीरों की प्रदर्शनी को किसी दूसरे मंच पर जल्द ही देश की जनता के सामने लाएंगे। कला और अभिव्यक्ति की आजादी कभी बंद कमरों और सेंसरशिप की मोहताज नहीं होती, वह अपना रास्ता खुद बना ही लेती है।

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