x

Siyasat : शेयर बाजार में सुनामी! विदेशी पैसा बाहर, निवेशक बेहाल… मोदी सरकार की बढ़ी टेंशन?

भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कमजोर रुपये ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। घरेलू निवेश और SIP बाजार को संभाल रहे हैं, लेकिन लगातार गिरता पोर्टफोलियो मोदी सरकार के आर्थिक नैरेटिव पर भी सवाल खड़े कर रहा है।


भारतीय शेयर बाजार में जारी गिरावट अब सिर्फ निवेशकों और दलाल स्ट्रीट की चिंता नहीं रह गई है। इसके तार सियासत से भी जुड़ने लगे हैं. एक तरफ मोदी सरकार भारत को दुनिया की तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनाती रही है. दूसरी तरफ भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों गिरावट की सुनामी आई हुई है. भारतीय बाजार से विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं, रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है. म्यूचुअल फंड्स, इंश्योरेंस, एनपीएस में निवेश कर घरेलू निवेशक बाजार को सहारा दे रहे हैं. लेकिन जब वे अपना रिटर्न देख रहे हैं तो सिर पकड़ ले रहे क्योंकि उन्हें अपने निवेश पर अब भारी नुकसान हो रहा है. और उनके निवेश के दम पर विदेशी निवेशक बिकवाली पर पैसा निकाल रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है क्या शेयर बाजार की मौजूदा हालत मोदी सरकार के आर्थिक नैरेटिव के लिए नई राजनीतिक चुनौती बन गई है. आज सियासत में बात गिरते शेयर बाजार और निवेशकों की गाढ़ी कमाई में लग रहे सेंध की करेंगे. आप देख रहे हैं द फेडरल देश और मैं हूं मनीष कुमार....

बीएसई सेंसेक्स और एनएसई की निफ्टी में जोरदार गिरावट
भारतीय शेयर बाजार की मौजूदा तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है. साल 2026 के पिछले 9 महीने में बीएसई सेंसेक्स और एनएसई की निफ्टी में जोरदार गिरावट आ चुकी है. डॉलर के लिहाज से सेंसेक्स करीब 20 फीसदी और निफ्टी 18.6 फीसदी तक नीचे आ चुका है. रुपये में गिरावट कुछ कम दिखती है, लेकिन विदेशी निवेशक के लिए तस्वीर ज्यादा खराब है, क्योंकि बाजार की कमजोरी के साथ रुपया भी डॉलर के मुकाबले 6.4 फीसदी गिर चुका है. सवाल है कि दुनिया की तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत का शेयर बाजार आखिर दुनिया के प्रमुख स्टॉक मार्केट्स के मुकाबले सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले बाजारों में क्यों शामिल है?

तुलना चौंकाने वाला है. आंकड़ों के मुताबिक 2026 में अमेरिका का S&P 500 करीब 12 फीसदी और Nasdaq 15 फीसदी ऊपर है. जापान का Nikkei करीब 30 फीसदी चढ़ा है. ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजारों में करीब 61 और 72 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है. इसके उलट भारतीय शेयर बाजार गिरावट के हर रोज नए रिकॉर्ड बना रहा है.

निफ्टी लगातार सात हफ्तों से गिरकर बंद हो रहा है. अगर गिरावट आठवें सप्ताह भी जारी रही तो यह 2001 के बाद सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट में से एक होगी. हालांकि एक महत्वपूर्ण फर्क है. मौजूदा सात हफ्तों में निफ्टी की गिरावट करीब 5.8 फीसदी है, जबकि 2001, 2008 और 2020 सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली थी. बड़ी गिरावट होने से कौन रोक रहा क्या आप जानते हैं वो हैं आपके जैसे छोटे निवेशक जो हर महीने में अपनी गाढ़ी कमाई से थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर एसआईपी के जरिए म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं जो पैसा बाजार में लग रहा है और वो पैसा बड़ी गिरावट आने से रोक रहा है.

इसके बावजूद शेयर बाजार में बड़ी कमजोरी आ चुकी है. आंकड़ों के मुताबिक BSE 500 की 375 कंपनियों में 202 कंपनियां अपने पांच साल के औसत वैल्यूएशन से नीचे कारोबार कर रही हैं. करीब दो-तिहाई BSE 500 कंपनियां पिछले दो वर्षों में पॉजिटिव रिटर्न देने में नाकाम रही हैं.

भारत से निकल रहे हैं विदेशी निवेशक
गिरावट की बड़ी वजह विदेशी निवेशक यानि fpi हैं जो लगातार भारत से निकाल रहे हैं? पिछले एक साल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 2.17 लाख करोड़ रुपयये से ज्यादा निकाल चुके हैं. कुल निकासी को करीब ₹2.5 लाख करोड़ तक बताया जा रहा है. धीमी कॉरपोरेट अर्निंग ग्रोथ, महंगा कच्चा तेल, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर ने भारतीय बाजार की मुश्किल बढ़ा दी है. दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में टेक्नोलॉजी और AI से जुड़ी कंपनियों की तेजी ने विदेशी पूंजी को आकर्षित किया है. यानी यह सिर्फ शेयर बाजार की कहानी नहीं है. यह वैश्विक पूंजी के सामने भारत की प्रतिस्पर्धा की कहानी भी है.

लेकिन यहां कहानी का दूसरा पहलू भी है. जिस समय विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे थे, उसी दौरान घरेलू म्यूचुअल फंडों ने करीब 5 लाख करोड़ बाजार में लगाए हैं. इस घरेलू निवेश ने विदेशी बिकवाली का बड़ा हिस्सा अपने ऊपर लेकर सोख लिया. यही वजह है कि विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद रुपये में सेंसेक्स-निफ्टी की गिरावट डॉलर के मुकाबले कम दिखाई देती है. लेकिन यहीं एक असहज सवाल भी पैदा होता है क्या भारतीय बाजार की मजबूती अब तेजी से घरेलू निवेशकों और लगातार आने वाले SIP के पैसे पर निर्भर होती जा रही है? घरेलू निवेश बाजार को सहारा दे रहा है, लेकिन इससे निवेशकों को भारी नुकसान हो रहा है. उनके निवेश के सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. बाजार गिरता है तो SIP के जरिए निवेश करने वाले छोटे निवेशकों के पोर्टफोलियो की वैल्यू भी घटती है. पिछले कुछ वर्षों में सरकार और वित्तीय संस्थानों ने आम लोगों की शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में भागीदारी बढ़ने को निवेश की नई संस्कृति के तौर पर पेश किया है. लेकिन अब इसी तस्वीर का दूसरा पहलू सामने है. अगर विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे हैं और घरेलू पैसा उस दबाव को सोख रहा है, तो सवाल उठेगा कि इस जोखिम का कितना हिस्सा आखिरकार भारतीय परिवारों के निवेश पर आ रहा है? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक दौर में छोटे निवेशको को Shock Absorber कह रही थीं. लेकिन यही Shock Absorber को सबसे बड़ा Shock लगा हुआ है क्योंकि उसकी गाढ़ी कमाई मिट्टी में मिलती जा रही है.

सेंसेक्स की डॉलर में मार्केट कैप 2026 में 372 अरब डॉलर से ज्यादा घट चुकी है. इस नुकसान का बड़ा हिस्सा चुनिंदा दिग्गज कंपनियों में केंद्रित है. आंकड़ों के मुताबिक Reliance Industries की मार्केट वैल्यू करीब $70 अरब, HDFC Bank की $54 अरब और TCS की लगभग $52 अरब घटी है. Infosys में करीब $32 अरब और ITC में लगभग $22 अरब की कमी आई है. दस बड़ी कंपनियां सेंसेक्स की डॉलर मार्केट कैप में आई कुल गिरावट के करीब 80 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार है.

कच्चा तेल बना सबसे बड़ा सिरदर्द?

भारत की मुश्किल सिर्फ विदेशी बिकवाली नहीं है. Brent crude $100 प्रति बैरल के ऊपर पहुंचना भारत जैसी तेल इंपोर्ट करने वाली अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है. महंगे कच्चे तेल के चलते आयात बिल रहा है. रुपये पर दबाव पड़ रहा है. इसके चलते महंगाई भी बढ़ रही है. और कंपनियों की लागत भी ऊपर जा रही है. और इस सब का खामियाजा कौन भुगत रहा है. देश का उपभोक्ता. इसके साथ अमेरिकी 10 वर्ष की ट्रेजरी यील्ड 5 फीसदी के ऊपर बनी हुई है. जब अमेरिका में ही निवेशकों को ऊंचा सुरक्षित रिटर्न मिलने लगे, तब भारत जैसे उभरते बाजारों को निवेशक अपनी पूंजी क्यों डालेंगे.

सबसे गंभीर स्थिति छोटे निवेशक की है. यहीं सरकार की शेयर बाजार को लेकर पॉलिसी पर सवाल खड़े होते हैं. STT यानी सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स के साथ इक्विटी निवेशकों पर Short-Term Capital Gains और Long-Term Capital Gains Tax लागू है. आलोचकों का तर्क है कि जब घरेलू निवेशकों के पैसे को विदेशी बिकवाली के सामने बाजार का महत्वपूर्ण सहारा बताया जाता है, तब सरकार को यह भी बताना चाहिए कि छोटे और लंबी अवधि के निवेशकों के लिए उसकी नीति क्या है. लेकिन टैक्स घटाना बाजार की गिरावट का सीधा समाधान है ऐसा मानना भी जल्दबाजी होगी. विदेशी निवेशकों की निकासी के पीछे वैश्विक ब्याज दरें, तेल, डॉलर, कॉरपोरेट अर्निंग और दूसरे बाजारों में बेहतर अवसर जैसे कई कारण हैं.

इस बहस का राजनीतिक पहलू भी है. राहुल गांधी पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की चुनाव के दौरान शेयर बाजार को लेकर की गई टिप्पणियों पर सवाल उठा चुके हैं और इसे लेकर गंभीर आरोप लगा चुके हैं. वो दोनों के बयान को स्टॉक मार्केट स्कैम का नाम दे चुके हैं. मौजूदा गिरावट के बीच उन पुराने बयानों की राजनीतिक चर्चा फिर तेज हो गई है. आपको याद होगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने नतीजों के आने के बाद बड़ी तेजी की भविष्यवाणी की थी और इस तेजी के मद्देनजर निवेशकों को शेयर बाजार में निवेश की सलाह दी थी.

पीएम मोदी ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि... 25000 से सेंसेक्स की यात्रा शुरू हुई थी 75000 पहुंचे हैं. दुनिया में इससे हमारी प्रतिष्ठा भी बनती है. जितने ज्यादा सामान्य नागरिक बाजार में आते हैं उतनी इकोनॉमी को बड़ा बल मिलता है. मैं तो चाहता हर नागरिक के मन में थोड़ी रिस्क लेने की क्षमता होनी चाहिए. ये जरूरी होता है. सोच कर क्या करूंगा ऐसी जिंदगी जीने से बात बनती नहीं. 4 जून को जिन दिन चुनाव का नतीजा आएगा आप हफ्ते भर में देखना भारत का स्टॉक मार्केट में क्या होगा. इसी प्रकार तब अमित शाह ने भी निवेशकों को चुनाव नतीजों से पहले निवेश की सलाह दी थी. अमित शाह ने तब कहा था कि, 6 जून के पहले आप खरीद लेना 4 जून से पहले वो शूट पर करेगा. 400 पार ( बीजेपी की सीटें) होने वाला है. मोदी जी की स्थिर सरकार आने वाली इसलिए निश्चित रूप से बाजार ऊपर जाएगा.

2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद राहुल गांधी ने पीएम मोदी और अमित शाह के इन बयानों को लेकर उन्हें कटघरे में खड़ा किया था. राहुल गांधी का पुराना बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने मोदी शाह पर बड़े आरोप लगाए थे.

बहरहाल बाजार में तेज गिरावट के बाद कुछ ब्रोकरेज का मानना है कि गिरावट के बाद निफ्टी का वैल्यूएशन काफी नीचे आया है. यानी बाजार में संकट के संकेत हैं, लेकिन सस्ता होता वैल्यूएशन आपदा में अवसर की ओर भी इशारा कर रहा है. अब असली परीक्षा यह है कि घरेलू निवेशकों का पैसा बाजार को कब तक संभाल सकता है, कॉरपोरेट कमाई कितनी तेजी से सुधरती है और कच्चे तेल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड तथा विदेशी बिकवाली का दबाव कब कम होता है.

क्योंकि फिलहाल बाजार का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है विदेशी पैसा तो बाहर जा रहा है, घरेलू पैसा बाजार को बड़ी गिरावट आने से रोक रहा है. लेकिन छोटे निवेशक के पोर्टफोलियो पर गिरावट का सबसे ज्यादा असर दिखाई दे रहा है. दलाल स्ट्रीट की गिरावट अब केवल शेयरों के भाव की कहानी नहीं है. यह विदेशी निवेशकों के भरोसे, घरेलू निवेशकों के पैसे और मोदी सरकार के आर्थिक नैरेटिव तीनों की राजनीतिक परीक्षा बनती जा रही है.

Read More
Next Story