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FCRA संशोधन बिल 2026: जानिए JPC को क्यों भेजना पड़ा विवादित विधेयक

'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में मनीष कुमार का विश्लेषण। जानिए FCRA संशोधन बिल 2026, JPC के पास भेजे जाने की वजह और इसके सियासी मायनों का पूरा सच।


Siyasat: विदेशी चंदा नियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और विपक्षी दलों के बीच चला आ रहा तीखा टकराव फिलहाल एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। विपक्षी दलों—कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), वामपंथी दलों (Left) और डीएमके (DMK)—के भारी दबाव के बाद सरकार को इस विवादित विधेयक को संसद की संयुक्त समिति (JPC) के पास भेजने का प्रस्ताव रखना पड़ा। 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम और विधेयक के उन विवादास्पद प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया है, जिन पर देश भर में हायतौबा मची हुई है।


संसद में हंगामा: अमित शाह की गैरहाजिरी और तीखी नोकझोंक
लोकसभा में इस संशोधन बिल को जेपीसी (JPC) को भेजने का प्रस्ताव गृह मंत्री अमित शाह की जगह गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने पेश किया। इस पर संसद के भीतर तीखी राजनीतिक जुबानी जंग देखने को मिली:

के. सी. वेणुगोपाल का सवाल: कांग्रेस सांसद के. सी. वेणुगोपाल ने गृह मंत्री अमित शाह की गैरहाजिरी पर सवाल उठाते हुए सरकार की मंशा पर संदेह जताया।

अखिलेश यादव का हमला
: समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार हर काम अल्पसंख्यकों के खिलाफ लक्षित करके करती है।

किरेन रिजिजू का पलटवार: संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने अखिलेश यादव के इन आरोपों पर कड़ा ऐतराज जताया और खारिज किया।

सपा का रुख: सपा सांसद डिंपल यादव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आरएसएस अपने चंदे के स्रोतों (Funding Sources) का पारदर्शी खुलासा क्यों नहीं करती?

FCRA संशोधन बिल 2026: क्या हैं वे प्रावधान जिन पर मचा है विवाद?
FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के तहत विदेशों से आर्थिक मदद लेने वाले एनजीओ और गैर-लाभकारी संगठनों की निगरानी की जाती है। नए संशोधन विधेयक के प्रस्तावित नियमों में कुछ ऐसे बिंदु हैं जिन्हें लेकर संस्थाओं में भारी आशंकाएं हैं:

संपत्तियों पर सरकारी/अथॉरिटी का नियंत्रण:

यदि किसी एनजीओ का FCRA प्रमाण पत्र रद्द होता है, नवीनीकृत नहीं होता, खारिज होता है या संस्था खुद इसे सरेंडर करती है—तो विदेशी चंदे से निर्मित सभी संपत्तियों/अचल एसेट पर 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' का नियंत्रण हो जाएगा।

घरेलू पैसों से बनी संपत्तियों पर संशय:

कई अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों के निर्माण में विदेशी चंदे के साथ-साथ भारतीय दाताओं का पैसा भी लगा है। नए बिल के तहत पूरी संपत्ति पर शुरुआती तौर पर अथॉरिटी का कब्जा हो सकता है, और संस्था को बाद में अपने घरेलू हिस्से को छुड़ाने के लिए कानूनी दावा करना पड़ेगा।

पुराने मामलों पर भूतलक्षी प्रभाव:

विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं जिनका असर उन संस्थाओं की पुरानी संपत्तियों पर भी पड़ सकता है जिनका FCRA लाइसेंस पहले ही समाप्त या रद्द हो चुका है।

सज़ा की अवधि में कटौती:

एक तरफ नियमों को सख्त किया गया है, वहीं दूसरी तरफ FCRA नियमों के उल्लंघन पर मिलने वाली अधिकतम जेल की सज़ा को 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है।

अपील और सुनवाई का अभाव:

यदि सरकार किसी संस्था के FCRA लाइसेंस के रिन्यूअल आवेदन को खारिज कर देती है, तो संस्था के पास स्पष्ट रूप से अपील करने या अपना पक्ष रखने के अधिकार पर संशय बना हुआ है।

ईसाई संगठनों की चिंताएं और गृह मंत्री से मुलाक़ात
चर्च और ईसाई धर्मावलंबियों से जुड़े एनजीओ में इस बिल को लेकर गहरा डर देखा जा रहा है। उन्हें आशंका है कि अतीत में निर्मित चर्च, स्कूल और अस्पताल भी नए कानून के घेरे में आ सकते हैं।

गृह मंत्री से मुलाकात: ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों ने गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं।

डीएमके की पहल: डीएमके सांसद पी. विल्सन ने चर्च प्रतिनिधियों के साथ गृह मंत्री से भेंट कर बिल वापस लेने या जेपीसी को भेजने की मांग की थी।

मिजोरम के मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप: मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी पूर्वोत्तर के ईसाई समुदाय की आपत्तियों से केंद्र सरकार को अवगत कराया था।

आंकड़ों में FCRA: 72% से अधिक एनजीओ के लाइसेंस निष्क्रियां
गृह मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2012 से अब तक कुल 52,159 संस्थाओं को विदेशी फंडिंग के लिए पंजीकृत किया गया था।

सक्रिय संस्थाएं: फिलहाल केवल 14,455 संस्थाएं (लगभग 27.7%) ही सक्रिय हैं।

रद्द लाइसेंस
: 22,498 एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं (जिनमें से बड़ी संख्या 2015 के बाद रद्द हुई)।

रद्द माने गए: 15,206 संस्थाओं के लाइसेंस नियमों का पालन न करने या नवीनीकरण न कराने के कारण समाप्त हो चुके हैं।

राज्यवार स्थिति: तमिलनाडु में सबसे ज्यादा (2,104) सक्रिय FCRA एनजीओ हैं, जिसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है। रद्द और समाप्त लाइसेंस के मामले में बिहार शीर्ष पर है।

मोदी सरकार का दांव और JPC के सियासी मायने
संसद में पर्याप्त बहुमत होने के बावजूद विधेयक को बिना चर्चा पारित कराने के बजाय जेपीसी को भेजना सरकार की एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है:

दक्षिण में राजनीतिक पैठ: भाजपा केरल और तमिलनाडु में ईसाई समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुँच बढ़ाने के प्रयास में है। ईसाई संगठनों की आपत्तियों के बीच सीधे बिल पास कराने से पार्टी को राजनीतिक नुकसान हो सकता था।

परिसीमन बिल पर सहयोग: भविष्य में आने वाले परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर डीएमके (DMK) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन केंद्र के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

आगे का रास्ता: जेपीसी संबंधित संगठनों, चर्च प्रमुखों, विशेषज्ञों और सरकार का पक्ष सुनकर सुधार के सुझाव दे सकती है। यद्यपि जेपीसी की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन इससे सरकार को इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने और व्यापक चर्चा का अवसर मिल जाएगा।


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