हाथों में तिरंगा, होठों पर सवाल! जब हक के लिए कलेक्ट्रेट पहुंच गए स्कूली बच्चे
'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार का बड़ा खुलासा: जानिए कैसे यूपी, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और राजस्थान में स्कूली बच्चे खुद सड़कों पर उतरकर स्थानीय प्रशासन से सीधे जवाबदेही तय कर रहे हैं।
Siyasat: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद अब देश भर में एक अभूतपूर्व और नई तस्वीर देखने को मिल रही है। देश के युवाओं (Gen-Z) के नक्शेकदम पर चलते हुए अब स्कूली बच्चे यानी 'जेन-अल्फा' (Gen-Alpha: 2014 के बाद जन्मे बच्चे) भी अपनी बुनियादी सुविधाओं, अधिकारों और अव्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। टूटी सड़कों, कक्षाओं में लटकते जर्जर पंखों, दूषित पेयजल और शिक्षकों की कमी से परेशान स्कूली छात्र अब सीधे स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही तय कर रहे हैं।
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष विश्लेषण कार्यक्रम 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने देश के अलग-अलग राज्यों से आ रही स्कूली बच्चों के विरोध-प्रदर्शन की तस्वीरों और इसके दूरगामी सामाजिक-राजनीतिक असर पर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की।
क्या है 'जेन-अल्फा' आंदोलन और क्यों भड़का गुस्सा?
साल 2014 के बाद जन्मी पीढ़ी को तकनीकी और सामाजिक शब्दावली में 'जेन-अल्फा' कहा जाता है। यह वह पीढ़ी है जिसने बचपन से ही विकास के बड़े-बड़े दावे और नारे सुने हैं। लेकिन जब धरातल पर उन्हें अपने ही स्कूलों तक जाने के लिए कीचड़ से भरे रास्तों का सामना करना पड़ा, कक्षाओं में पीने का साफ पानी नहीं मिला और मिड-डे मील की घटिया गुणवत्ता देखने को मिली, तो उनका सब्र जवाब दे गया।
जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलनों से प्रेरणा लेकर अब इन मासूम बच्चों ने चुपचाप सहने के बजाय अपनी मांगों को लेकर सीधे कलेक्ट्रेट और प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तरों का रुख करना शुरू कर दिया है।
देश के विभिन्न राज्यों से आई प्रदर्शन की प्रमुख तस्वीरें
कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई 'जेन-अल्फा' के विरोध-प्रदर्शन की घटनाओं को प्रमुखता से रेखांकित किया गया:
उत्तर प्रदेश (हमीरपुर और फतेहपुर): हमीरपुर जिले की चंदूपुर ग्राम पंचायत के स्कूली छात्र हाथों में तिरंगा लेकर 5 किलोमीटर पैदल चलकर सीधे कलेक्ट्रेट पहुंच गए और 4 घंटे तक धरने पर बैठ गए। उनकी मांग स्कूल तक पक्की सड़क बनवाने की थी। बच्चों के इस प्रदर्शन के बाद जिला प्रशासन तुरंत हरकत में आया और गांव में सड़क निर्माण का सर्वे शुरू हुआ। वहीं फतेहपुर में भी सरकारी इंटर कॉलेज के छात्रों ने बिजली, पंखे और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर मोर्चा खोला।
उत्तराखंड (खटीमा): मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह नगर खटीमा स्थित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय के लगभग 400 जनजातीय छात्र-छात्राओं ने दूषित पानी, खराब भोजन और शौचालयों की गंदगी के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद स्कूल के प्राचार्य को पद से हटा दिया गया।
महाराष्ट्र (रायगढ़): रायगढ़ में स्कूली छात्राओं (नेहा घारे और मानसी पवार) ने जर्नलिस्ट अंदाज में रिपोर्टिंग करते हुए टूटी सड़कों और गड्ढों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। उन्होंने तंज कसते हुए सवाल उठाया कि "रास्ते में गड्ढा है या गड्ढे में रास्ता?"
राजस्थान और बिहार: राजस्थान में शिक्षकों की भारी कमी और जर्जर स्कूल भवनों को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन किया, जबकि बिहार में भी सरकारी स्कूलों के बच्चों ने मूलभूत सुविधाओं की कमी पर प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई।
प्रशासनिक जवाबदेही तय कर रही नई पीढ़ी
इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल या सरकार के खिलाफ न होकर सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन की सुस्ती और अव्यवस्था के खिलाफ है।
यह नई पीढ़ी अब किसी भी गलत व्यवस्था को चुपचाप सहने को तैयार नहीं है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि केवल कागजी दावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर जाकर जनता और इन बच्चों की समस्याओं को सुनकर उनका त्वरित समाधान करना होगा।

