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नालसर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: BCI का यू-टर्न, CJI बोले- विरोध हक है

'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में देखिए नालसर यूनिवर्सिटी विवाद। BCI द्वारा एनरोलमेंट रोक का फैसला वापस, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और CJI का बयान।


Siyasat: हैदराबाद स्थित प्रतिष्ठित 'नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ' (NALSAR University of Law) के दीक्षांत समारोह (Convocation) को लेकर खड़ा हुआ विवाद अब एक बड़े कानूनी और प्रशासनिक मोड़ पर पहुंच गया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा नालसर के 2026 बैच के छात्रों के वकालत (अधिवक्ता एनरोलमेंट) पर रोक लगाने के आदेश को चौतरफा विरोध, छात्र संगठनों की चेतावनी और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद वापस लेना पड़ा है।


डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म द फेडरल देश के खास कार्यक्रम 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने नालसर विवाद, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की भूमिका, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और इसके कानूनी पहलुओं पर विस्तृत रिपोर्ट पेश की।

क्या है पूरा विवाद?
हैदराबाद स्थित नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वर्ष 2026 बैच के लगभग 450 छात्रों ने अपने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर आगामी दीक्षांत समारोह में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित न करने और उनके हाथों से डिग्री प्राप्त न करने का निर्णय लिया था।

छात्रों का यह विरोध मुख्य न्यायाधीश द्वारा छात्र आंदोलनों के दौरान युवाओं को लेकर दी गई कथित टिप्पणियों और दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिस बर्बरता के वीडियो संबंधी याचिका पर दिए गए बयानों से जुड़ा था।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया का ड्रैकोनियन आदेश
छात्रों के इस लोकतांत्रिक विरोध के जवाब में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने 13 अगस्त की शाम को एक कड़ा रुख अपनाते हुए राज्यों के बार काउंसिल को निर्देश जारी कर दिया। BCI ने कहा कि जब तक अगला आदेश न आए, नालसर के वर्ष 2026 बैच के किसी भी छात्र को किसी भी राज्य के बार काउंसिल में बतौर अधिवक्ता (Advocate) एनरोल न किया जाए।

इसके साथ ही BCI ने विश्वविद्यालय प्रशासन से विरोध में शामिल छात्रों के नाम और इस पूरे घटनाक्रम के पीछे जिम्मेदार लोगों की रिपोर्ट मांगी। इस आदेश को छात्रों के भविष्य और वकालत करने के मौलिक अधिकार पर सीधे हमले के रूप में देखा गया।

चौतरफा विरोध और 'लीगल कॉकरोच यूनाइट' अभियान
बार काउंसिल के इस कदम के सामने आते ही कानूनी बिरादरी और छात्र संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली:

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP):
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और प्रवक्ता सौरभ दास ने बीसीआई के चेयरमैन व भाजपा के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा के फैसले को पूरी तरह गैर-कानूनी और तानाशाही करार दिया। उन्होंने 'लीगल कॉकरोच यूनाइट' अभियान का आह्वान करते हुए चेतावनी दी कि यदि आदेश वापस नहीं लिया गया तो बीसीआई दफ्तर और चेयरमैन के आवास के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जाएगा।

वरिष्ठ वकीलों की राय: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने बीसीआई के इस आदेश को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी वैधानिक संस्था (Regulator) या बीसीआई चेयरमैन के पास पूरे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, क्योंकि एनरोलमेंट का कार्य राज्य बार काउंसिल का होता है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और बीसीआई का यू-टर्न
बढ़ते जनाक्रोश और कानूनी दबाव के बाद 13 अगस्त की देर रात बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए आदेश को वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि "छात्रों का हित सर्वोपरि है और किसी भी छात्र को नुकसान पहुंचाना काउंसिल की मंशा नहीं थी, इसलिए आदेश को तुरंत वापस ले लिया गया है।"

वहीं दूसरी ओर यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा। सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने कोर्ट के समक्ष बीसीआई की कार्रवाई पर सवाल उठाए। मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने बीसीआई के हस्तक्षेप पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा:

"यह विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच का एक आंतरिक संवाद है, इसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।"

"यदि छात्र कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रख रहे हैं या विरोध व्यक्त कर रहे हैं, तो संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उन्हें अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है।"

मुख्य न्यायाधीश ने अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम निर्देश दिया कि इस मामले में नालसर यूनिवर्सिटी के किसी भी छात्र या फैकल्टी के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।

राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल
विश्लेषण के अंत में इस बात पर भी जोर दिया गया कि बीसीआई चेयरमैन और भाजपा सांसद मनन कुमार मिश्रा द्वारा जारी किया गया यह असंवैधानिक आदेश संस्थागत अधिकारों के दुरुपयोग को दर्शाता है। भले ही विरोध और सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद फैसला वापस ले लिया गया हो, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बार फिर देश में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों और नियामक संस्थाओं की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


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