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'साइलेंट टैरिफ हाइक': एयरटेल ने बंद किए सस्ते प्लान, जियो लाया मेंबरशिप

'सियासत' में मनीष कुमार का विश्लेषण: टेलीकॉम कंपनियों का 'साइलेंट टैरिफ हाइक', एयरटेल-जियो की रणनीति और कैसे 'डुओपॉली' से जेब पर बढ़ रहा वित्तीय बोझ।


Siyasat: आंदोलनों के शोर, पेपर लीक विवादों और राजनीतिक खींचतान के बीच आम जनता की जेब पर एक बड़ा अप्रत्यक्ष हमला होने जा रहा है। देश की प्रमुख टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां सीधे तौर पर दामों में बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा किए बिना, अत्यंत गोपनीय और रणनीतिक तरीके से मोबाइल रीचार्ज महंगे कर रही हैं।


डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने विश्लेषण किया कि कैसे टेलीकॉम कंपनियां सस्ते रीचार्ज प्लान्स को धीरे-धीरे खत्म करके और 'प्राइम मेंबरशिप' का नया गणित पेश करके ग्राहकों को महंगे टैरिफ की ओर धकेल रही हैं। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर नियामक संस्था (TRAI) मूकदर्शक बनी बैठी है।

एयरटेल और जियो का नया पैंतरा: 'साइलेंट टैरिफ हाइक' और प्राइम मेंबरशिप
कंपनियों ने इस बार सीधे दाम बढ़ाने की बजाय 'साइलेंट टैरिफ हाइक' का फॉर्मूला अपनाया है:

एयरटेल का साइलेंट हाइक: भारती एयरटेल (Bharti Airtel) ने हाल ही में अपने लोकप्रिय सस्ते प्रीपेड प्लान्स— जैसे 249, 299, 579, 619 और 649 रुपये वाले प्लान्स को पूरी तरह बंद कर दिया है। मिसाल के तौर पर, 299 रुपये वाले प्लान (28 दिन वैलिडिटी, 1.5 GB/दिन) को हटाकर ग्राहकों के सामने सीधा 349 रुपये का विकल्प रखा गया है। यानी ग्राहक पर बिना किसी औपचारिक वृद्धि के सीधे 16% का अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल दिया गया है।

रिलायंस जियो की प्राइम मेंबरशिप: रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने 300 रुपये की 'प्राइम मेंबरशिप' की शुरुआत की है। दावा है कि इसे लेकर ग्राहक 5 सितंबर 2027 तक होने वाली किसी भी संभावित टैरिफ बढ़ोतरी से बच सकेंगे। जब जियो ने अभी टैरिफ बढ़ाने का आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, तब 1 साल तक महंगाई से बचाने वाली मेंबरशिप बेचना इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले दिनों में मोबाइल रीचार्ज प्लान्स का महंगा होना तय है।

'कंपटीशन' से 'कंसॉलिडेशन' तक: कैसे खत्म हुई बाजार में प्रतिस्पर्धा?
एक दशक पहले भारत का टेलीकॉम सेक्टर अत्यंत प्रतिस्पर्धी हुआ करता था। एयरटेल, वोडाफोन, आईडिया, रिलायंस कम्युनिकेशंस, एयरसेल, टाटा डोकोमो और टेलीनॉर जैसी दर्जनों कंपनियां सस्ती कॉलिंग और सस्ते डेटा के लिए आपस में होड़ लगाती थीं।

2016 का प्राइस वॉर: 2016 में रिलायंस जियो के आने के बाद डेटा की कीमतें 225 रुपये प्रति जीबी से घटकर 7-8 रुपये प्रति जीबी तक आ गईं।

कंसॉलिडेशन का असर: इस प्राइस वॉर के कारण आर्थिक रूप से कमजोर कंपनियां (आरकॉम, एयरसेल, डोकोमो) बाजार से बाहर हो गईं और वोडाफोन-आइडिया का विलय हो गया।

'डुओपॉली' की स्थिति: आज 140 करोड़ आबादी वाले देश का टेलीकॉम बाजार मुख्य रूप से केवल दो बड़ी निजी कंपनियों— रिलायंस जियो और भारती एयरटेल— के हाथों में सिमट चुका है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'डुओपॉली' (Duopoly) कहा जाता है, जहां प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और ग्राहक के पास विकल्प सीमित रह जाते हैं। नतीजतन, 'नंबर पोर्टेबिलिटी' (MNP) का विकल्प भी अब बेअसर साबित हो रहा है।

ARPU बढ़ाने का दबाव और 5G निवेश की वसूली
अब टेलीकॉम कंपनियों का फोकस नए ग्राहक जोड़ने से हटकर ARPU (Average Revenue Per User) यानी प्रति ग्राहक औसतन कमाई बढ़ाने पर है।

300 रुपये ARPU का लक्ष्य: फिलहाल जियो का ARPU 215.6 रुपये और एयरटेल का 264 रुपये है। दोनों कंपनियों का लक्ष्य इसे जल्द से जल्द 300 रुपये तक पहुंचाना है, जिसका सीधा रास्ता रीचार्ज महंगे करना है।

5G पर हुआ भारी खर्च: कंपनियों ने 5G स्पेक्ट्रम, टावर और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर पर लाखों करोड़ रुपये खर्च किए हैं। अब वे इस भारी-भरकम निवेश का रिटर्न ग्राहकों की जेब से सामान्य रीचार्ज प्लान्स महंगे करके वसूलना चाहती हैं।

10 से 15% की और बढ़ोतरी संभव: वित्तीय शोध संस्थानों (जैसे सेंट्रम और एक्सिस कैपिटल) का अनुमान है कि अगले 3 से 6 महीनों में प्रीपेड प्लान्स में 10 से 15 फीसदी तक की एक और औपचारिक बढ़ोतरी हो सकती है।

'Gen-Z' और छात्रों के बजट पर सीधा प्रहार
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल इंटरनेट कोई विलासिता नहीं, बल्कि शिक्षा, बैंकिंग, यूपीआई (UPI), सरकारी योजनाओं और आजीविका की बुनियादी जरूरत है।

ऑनलाइन क्लासेस, टेस्ट सीरीज, पीडीएफ डाउनलोड्स और कंटेंट क्रिएशन पर निर्भर छात्रों और युवाओं (Gen-Z) के लिए रीचार्ज का महंगा होना सीधे उनके मासिक बजट को बिगाड़ेगा। 299 रुपये के प्लान का 349 रुपये होना केवल 50 रुपये की वृद्धि नहीं है, बल्कि एक छात्र के लिए सालाना 600 रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ है, जो आने वाले समय में और बढ़ सकता है।


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