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क्या छात्र आंदोलन के डर से RSS को याद आई GenZ और Gen Alpha?

द फ़ेडरल देश के शो 'सियासत' में मनीष कुमार के साथ देखिए जंतर-मंतर छात्र आंदोलन के बाद RSS प्रमुख मोहन भागवत के GenZ और Gen Alpha आउटरीच, अतुल लिमये के बयान और राहुल गांधी के तीखे हमलों का विश्लेषण।


Siyasat: लोकतंत्र में जनता को सर्वोच्च माना जाता है, लेकिन अक्सर सत्ता के गलियारों में यह मान लिया गया था कि देश का युवा और GenZ (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) सिर्फ सोशल मीडिया और रील्स बनाने तक सीमित है। लेकिन जब यही युवा जंतर-मंतर पर उतरकर पेपर लीक, संस्थागत भ्रष्टाचार और बेरोजगारी पर सीधे सवाल पूछने लगा, तो सत्ता और संगठन दोनों की नींद उड़ गई।


डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने विश्लेषण प्रस्तुत किया है कि कैसे जंतर-मंतर और सिवान के छात्र आंदोलनों के बाद अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत को GenZ और Gen Alpha के बीच जाकर आउटरीच (Outreach) करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।


1. मुंबई में भागवत का संवाद: 2,000 छात्रों के बीच संघ प्रमुख का भाषण

6 अगस्त को मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (NMACC) में संघ प्रमुख मोहन भागवत 'इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइटेड नेशंस' (IIMUN) के वार्षिक सम्मेलन में भाग लेंगे।


2,000 से अधिक छात्र: देश भर के 100 से अधिक शहरों से आने वाले 15 से 19 साल के लगभग 2,000 से ज्यादा GenZ और Gen Alpha (2010 के बाद जन्मे बच्चे) छात्र इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।


बदला हुआ रुख: हालांकि संघ प्रमुख इससे पहले भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाते रहे हैं, लेकिन इस बार का पूरा फोकस GenZ और युवाओं पर है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह संवाद युवाओं के आक्रोश को शांत करने की एक रणनीतिक कोशिश है या सचमुच संघ युवाओं के वास्तविक सवालों को सुनने जा रहा है?


2. संघ के बयानों में विरोधाभास: एंटी-बीजेपी आंदोलन को बताया 'संविधान विरोधी'

एक तरफ जहाँ मोहन भागवत युवाओं से संवाद का हाथ बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ RSS के सह-सरकार्यवाह अतुल लिमये का हालिया विवादास्पद बयान सामने आया है।


अतुल लिमये का बयान: लिमये ने छात्रों के जंतर-मंतर प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "इस आंदोलन को सिर्फ एंटी-बीजेपी दृष्टिकोण से मत देखिए। यह आंदोलन संविधान के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है और यह भारत विरोधी (Anti-Nation) आंदोलन है।"


सवाल खड़े करती नीतियां: जब संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी युवाओं के आंदोलन को राष्ट्रविरोधी और संविधान विरोधी करार दे रहे हों, तब मोहन भागवत का यह आउटरीच कितना प्रामाणिक माना जाएगा? क्या भागवत जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुई पुलिसिया बर्बरता, वाटर कैनन और लाठीचार्ज पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे?


3. 'रील्स और सस्ते डाटा' का भ्रम टूटा: जंतर-मंतर पर उभरे तीखे सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि बीजेपी सरकार द्वारा दिए गए सस्ते डाटा के कारण बिहार और देश के युवा रील्स बनाकर कमाई कर रहे हैं और अपनी क्रिएटिविटी दिखा रहे हैं।


लाठी vs संवाद: जंतर-मंतर के आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि युवाओं की प्राथमिकता सिर्फ रील्स और सस्ता इंटरनेट नहीं है। वे पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक माफिया पर लगाम, सस्ती पढ़ाई और स्थायी नौकरियां चाहते हैं।


विपक्षी नेताओं का हमला: कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके ने कहा कि बुजुर्ग नेताओं को भाषण देने के बजाय युवाओं की अगुवाई वाले चेहरों को आगे लाना चाहिए। वहीं विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया कि संघ केवल अपने ही कैडर के चुनिंदा बच्चों (आरएसएस समर्थकों के पोते-नातियों) से बात करेगा, जंतर-मंतर पर पुलिसिया दमन झेलने वाली बेटियों (जैसे नेहा बोरा) से संवाद करने की हिम्मत वे नहीं जुटाएंगे।


4. राहुल गांधी का संघ पर सीधा वार: "विश्वविद्यालयों पर आरएसएस का कब्जा"

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार देश की शिक्षा व्यवस्था के गिरते स्तर और संस्थागत संकट के लिए सीधे तौर पर RSS को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।


अंधभक्त बनाने का आरोप: राहुल गांधी ने कहा कि "देश के लगभग हर बड़े विश्वविद्यालय में आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले कुलपतियों (Vice Chancellors) को बिठाया गया है। धर्मेंद्र प्रधान तो केवल एक प्रतीक थे, युवाओं के असली दुश्मन आरएसएस की विचारधारा है जो छात्रों को सवाल पूछने से रोककर केवल 'अंधभक्त' बनाना चाहती है।"


भविष्य की लड़ाई: राहुल के इस तीखे वैचारिक हमले के बीच मोहन भागवत का यह सम्मेलन संघ के लिए रक्षात्मक छवि से बाहर निकलने की एक कोशिश मानी जा रही है।


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