'सियासत': राम मंदिर में चंदा चोरी के बाद अब नौकरशाही बनाम VHP का टकराव
'सियासत' में मनीष कुमार का विश्लेषण: राम मंदिर ट्रस्ट में चंपत राय की 9 पन्नों की चिट्ठी, नृपेंद्र मिश्रा पर लगाए गंभीर आरोप और VHP बनाम नौकरशाही की जंग।
Siyasat: अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे (दान) की कथित चोरी के विवाद में उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष जांच टीम (SIT) से क्लीन चिट मिलने के बाद एक नया और गंभीर प्रशासनिक मोड़ आ गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा के बीच वर्चस्व और फैसलों की जवाबदेही को लेकर शीत युद्ध (Cold War) अब खुलकर सार्वजनिक हो गया है।
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने राम मंदिर ट्रस्ट के भीतर उभरे इस तीखे मतभेद, चंपत राय की 9 पन्नों की विस्फोटक चिट्ठी और 'आंदोलनकारी नेतृत्व बनाम नौकरशाही' की इस वर्चस्व की लड़ाई का विस्तृत विश्लेषण किया।
चंपत राय का इस्तीफा और 9 पन्नों की गोपनीय चिट्ठी में 33 सवाल
राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला गरमाने पर चंपत राय ने 26 जून को महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे 6 जुलाई को स्वीकार किया गया। लेकिन SIT जांच में बेदाग साबित होने के तुरंत बाद उन्होंने 9 पन्नों का एक विस्तृत पत्र जारी कर 33 बिंदुओं के जरिए मंदिर निर्माण और वित्तीय फैसलों की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं:
कॉर्पोरेट कंपनियों के चयन पर घेरा: चंपत राय का आरोप है कि लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को निर्माण कार्य सौंपने, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसलटेंट के रूप में टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को जोड़ने और परिसर के अन्य भवनों के डिजाइन के लिए नोएडा की डिज एसोसिएट्स (Design Associates) को चुनने में नृपेंद्र मिश्रा की ही मुख्य भूमिका थी।
'बॉस' कल्चर का आरोप: चिट्ठी में दावा किया गया है कि निर्माण समिति की अनुमति के बिना एक भी काम नहीं हुआ। नृपेंद्र मिश्रा समिति में खुद को 'बॉस' मानते थे और अन्य सदस्यों के सुझावों को तरजीह नहीं देते थे। पूर्व NBCC चेयरमैन अनूप मित्तल जैसे अधिकारियों को भी वे खुद ही बैठकों में लाए थे।
नृपेंद्र मिश्रा का रुख: 'सीईओ मॉडल' और पेशेवर प्रबंधन की वकालत
चंपत राय के आरोपों पर प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव व पूर्व आईएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने ऐसी किसी चिट्ठी को नहीं देखा है और मीडिया में मनगढ़ंत बातें फैलाई जा रही हैं।
हालांकि, इससे पहले चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने पर नृपेंद्र मिश्रा ने प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे 'डाका, कलंक और शर्मिंदगी' करार दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि दान पेटियों की गिनती और सुरक्षा में भारी ढिलाई हुई और अब मंदिर प्रशासन को पेशेवर 'सीईओ मॉडल' (Professional CEO Model) पर लाया जाना चाहिए।
आंदोलनकारी बनाम नौकरशाही: नियंत्रण की असली जंग
वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार के अनुसार, यह विवाद केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि विश्व हिंदू परिषद (VHP)/संघ के आंदोलनकारी वर्ग और दिल्ली के पूर्व नौकरशाहों के बीच नियंत्रण की जंग को दर्शाता है:
आंदोलन से परियोजना तक का सफर: दशकों तक जिस राम मंदिर आंदोलन को VHP, संतों और संघ परिवार के नेताओं ने अपनी मेहनत से सींचा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वह एक विशाल मेगा-प्रोजेक्ट में तब्दील हो गया, जहां कॉर्पोरेट और पूर्व आईएएस हावी हो गए।
जवाबदेही की खींचतान: एसआईटी से बेदाग निकलने के बाद चंपत राय अब यह संदेश दे रहे हैं कि यदि मंदिर प्रबंधन में कोई अनियमितता हुई है, तो उसकी जवाबदेही सिर्फ महासचिव की नहीं, बल्कि निर्माण समिति के प्रमुख की भी होनी चाहिए।
उठते राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल
शो के अंत में यह बड़ा सवाल उठाया गया कि क्या एसआईटी की यह कार्रवाई केवल गिनती करने वाले कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों और दान पेटियों तक सिमट कर रह जाएगी, या फिर पिछले 6 सालों में मंदिर निर्माण से जुड़े बड़े प्रशासनिक, वित्तीय और ढांचागत फैसलों की भी निष्पक्ष जांच की जाएगी? करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस पावन धाम में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित होना बेहद जरूरी है।
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