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सियासत: रांची में छात्रों पर लाठीचार्ज; सोरेन सरकार पर उठे सवाल

जेएसएससी-सीजीएल की सीबीआई जांच पर फंसा पेंच, जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष की गिरफ्तारी के बाद बढ़ा राजनीतिक पारा, जानिए रांची छात्र आंदोलन का पूरा सच।


Siyasat: झारखंड की राजधानी रांची में छात्रों के विधानसभा घेराव आंदोलन के बाद राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्मा गया है। द फ़ेडरल देश के विशेष कार्यक्रम सियासत में एंकर मनीष कुमार ने रांची की सड़कों पर हुए इस बड़े घटनाक्रम और इसके पीछे के कारणों का गहराई से विश्लेषण किया है। आज से ठीक बीस दिन पहले बीस जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का जो प्रदर्शन देखने को मिला था, रांची की सड़कों पर हुई घटना ने एक बार फिर उसकी याद ताजा कर दी है।

इस बड़े छात्र आंदोलन के बाद हेमंत सोरेन सरकार की प्रशासनिक रणनीति और विपक्ष को मिले राजनीतिक मौके को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

बातचीत विफल होने के बाद बिगड़े हालात

रांची में जिस टकराव की आशंका पहले से जताई जा रही थी, आखिरकार वही हुआ। छात्र संगठनों और हेमंत सोरेन सरकार के बीच तीन दौर की वार्ता हुई, लेकिन बातचीत का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। इसके बाद छात्रों द्वारा झारखंड विधानसभा के घेराव का आह्वान किया गया, जिसमें शामिल होने के लिए दस अगस्त की सुबह से ही राज्य के अलग-अलग जिलों, शहरों और गांवों से हजारों की संख्या में छात्र रांची पहुंचने लगे।

सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए प्रशासन ने विधानसभा के आसपास कटीले तारों की बाड़ लगाकर कड़ी किलेबंदी कर दी थी। लेकिन परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के कारण अपने भविष्य को लेकर चिंतित छात्र पीछे हटने को तैयार नहीं थे।

लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल

छात्रों ने जब कड़े सुरक्षा घेरे को तोड़कर विधानसभा की ओर बढ़ने का प्रयास किया, तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इस दौरान माहौल अचानक बिगड़ गया।

  • बल प्रयोग और लाठीचार्ज: स्थिति नियंत्रित करने के लिए पुलिस की ओर से बल प्रयोग और लाठीचार्ज किया गया।

  • पानी की बौछार और आंसू गैस: जब हालात और अधिक अनियंत्रित हो गए, तब पुलिस को भीड़ को तीतर-बीतर करने के लिए पानी की तेज बौछारों और आंसू गैस के गोलों का सहारा लेना पड़ा।

  • उपद्रवी तत्वों का दावा: प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों ने यह आशंका भी जताई कि आंदोलन को बदनाम और माहौल खराब करने के लिए उसमें कुछ असामाजिक या उपद्रवी तत्व घुस आए थे।

प्रदर्शन के दौरान छात्रों के अलग-अलग रंग भी देखने को मिले। पुलिस की वाटर कैनन की पानी की तेज बौछारों के बीच कई छात्र रेन डांस करते नजर आए, तो एक छात्र चर्चित फिल्म पुष्पा के भेष में विरोध जताने पहुंचा। पिछले नौ दिनों से अनशन पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो भी एंबुलेंस में ही छात्रों का हौसला बढ़ाने के लिए विधानसभा मार्च में शामिल हुए और सरकार को आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दी।

सरकार का नब्बे-आठ फीसदी मांगों का दावा और जमीनी पेंच

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि तीन दौर की बैठकों के बाद भी बात क्यों नहीं बन सकी। झारखंड सरकार का दावा है कि उसने छात्रों की नब्बे-आठ फीसदी मांगों को स्वीकार कर लिया है, जबकि प्रदर्शनकारी छात्र इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं।

किन मांगों पर बनी सहमति?

सरकार की ओर से कई प्रमुख बिंदुओं पर सहमति जताई गई है:

  • परीक्षाएं रद्द करने का फैसला: चौदहवीं जेपीएससी परीक्षा और एसीएफ परीक्षा को रद्द करने की मांग मान ली गई है।

  • विशेषज्ञ समिति का गठन: भर्ती प्रक्रिया और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए आईआईटी आईएसएम धनबाद, आईआईएम रांची और एक्सएलआरआई जमशेदपुर के विशेषज्ञों की एक समिति बनाने का प्रस्ताव है।

  • प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई: जेपीएससी और जेएसएससी में पारदर्शिता के लिए नया एसओपी बनाने, गड़बड़ियों की ईडी जांच और फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से नब्बे दिनों में चार्जशीट दाखिल करने की बात कही गई है।

  • भविष्य के सुधार: आने वाली भर्ती परीक्षाओं के लिए छात्रों से सुझाव लेने के लिए एक विशेष पोर्टल शुरू करने पर सहमति बनी है।

कहाँ फंसा है मुख्य पेंच?

सहमति के इन दावों के बाद भी आंदोलन खत्म न होने की मुख्य वजह दो मांगें हैं:

  1. सीबीआई जांच पर अड़े छात्र: छात्र जेएसएससी-सीजीएल मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग पर अड़े हैं। वहीं सरकार का तर्क है कि यह परीक्षा हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई थी, इसलिए सरकार ने रिटायर्ड हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में जांच कमेटी बनाने का विकल्प दिया है।

  2. परीक्षाएं रद्द करने की संख्या: छात्रों का कहना है कि उन्होंने कुल तेरह परीक्षाओं को रद्द करने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने केवल तीन को ही रद्द किया है। इसके अलावा छात्र एक तय भर्ती कैलेंडर और आयु सीमा में छूट की भी मांग कर रहे हैं।

जेपीएससी में इस्तीफे और गिरफ्तारियों का दौर

छात्रों के इस आंदोलन के बीच झारखंड लोक सेवा आयोग के अंदर भी बड़ा प्रशासनिक भूचाल आया है। आयोग के तीन सदस्यों ने नौ अगस्त को अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते बाईस जुलाई को इस्तीफा दे चुके थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सीआईडी ने एल. खियांग्ते को पूछताछ के लिए बुलाया था, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके साथ ही आयोग की पूर्व सदस्य अजिता भट्टाचार्य से भी पूछताछ की गई है। पूर्व अध्यक्ष की गिरफ्तारी के बाद माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में जांच की आंच कई अन्य बड़े अधिकारियों और राजनीतिक हस्तियों तक पहुंच सकती है।

सोरेन सरकार और इंडिया गठबंधन के सामने राजनीतिक चुनौती

प्रदीप सहगल और मनीष कुमार के विश्लेषण के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम ने हेमंत सोरेन सरकार को बैकफुट पर ला दिया है। जिस समय केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं और परीक्षाओं के मुद्दों को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे, ठीक उसी समय झारखंड में हुए इस लाठीचार्ज ने विपक्ष को सोरेन सरकार के खिलाफ एक बड़ा हथियार दे दिया है।

क्या झारखंड सरकार समय रहते संवाद के जरिए इस आंदोलन को टाल सकती थी? इस विफलता का असर केवल राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन के नेताओं के लिए भी सोरेन सरकार के इस कदम का बचाव करना काफी मुश्किल साबित होगा।

रांची की सड़कों पर हुआ यह प्रदर्शन स्पष्ट संकेत देता है कि भर्ती परीक्षाओं में अनिश्चितता और पेपर लीक से परेशान युवाओं का धैर्य अब जवाब दे रहा है। जब तक सीबीआई जांच और सभी परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता की मांग पर कोई सर्वमान्य समाधान नहीं निकलता, तब तक झारखंड में यह राजनीतिक और सामाजिक तनाव थमने वाला नहीं दिखता।


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