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उत्तर बिहार में बाढ़ का खतरा, क्या पूरा होगा 'सप्तकोसी हाई डैम' का सपना?

'सियासत' में मनीष कुमार का विश्लेषण: उत्तर बिहार में बाढ़ के खतरे के बीच 35 साल से अटकी सप्तकोसी हाई डैम परियोजना की डीपीआर और 72 सालों की जल कूटनीति का सच।


Siyasat: नेपाल के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश और ग्लेशियर पिघलने के कारण एक बार फिर उत्तर बिहार में बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है। नदियों के बढ़ते जलस्तर और तटबंधों पर बढ़ते दबाव के साथ ही बिहार को बाढ़ से स्थायी राहत दिलाने का 35 साल पुराना 'सप्तकोसी हाई डैम' (Saptakosi High Dam Project) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।


डिजिटल प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के खास शो सियासत में पत्रकार मनीष कुमार ने बिहार में हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़, भारत-नेपाल जल कूटनीति और दशकों से अटकी सप्तकोसी परियोजना की जमीनी हकीकत पर विस्तृत विश्लेषण पेश किया है।

राजनीतिक वादे बनाम जमीनी हकीकत
रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयानों का हवाला देते हुए चुनावी वादों और जमीनी स्थिति के अंतर को रेखांकित किया गया:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान: दरभंगा की सभा में प्रधानमंत्री ने कहा था कि सरकार कोसी और मिथिला क्षेत्र को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए ईमानदारी से काम कर रही है और नेपाल के साथ मिलकर विस्तृत योजना तैयार की जा रही है।

एनडीए का 'बाढ़ मुक्त बिहार' संकल्प: बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान एनडीए के संकल्प पत्र और गृह मंत्री अमित शाह की सुपौल रैली में अगले 5 वर्षों में नदियों को जोड़कर बिहार को पूरी तरह 'बाढ़ मुक्त' बनाने का वादा किया गया था।

सच्चाई: वादों और घोषणाओं के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। हर साल मानसून आते ही बिहार सरकार का काम सिर्फ अलर्ट जारी करने और राहत शिविर लगाने तक सीमित रह जाता है।

क्या है 'सप्तकोसी हाई डैम प्रोजेक्ट' और क्यों है जरूरी?
नेपाल के ऊपरी पहाड़ी हिस्से में सप्तकोसी नदी पर एक विशाल बांध (जलाशय) बनाने की योजना को 'सप्तकोसी हाई डैम प्रोजेक्ट' नाम दिया गया था।

बाढ़ नियंत्रण: नेपाल में ऊपरी जलाशय बनने से भारी बारिश के दौरान आने वाले अचानक पानी को रोका जा सकेगा, जिससे उत्तर बिहार में कोसी नदी के तांडव और तबाही से स्थायी मुक्ति मिल सकेगी।

बिजली और सिंचाई: इस परियोजना से हजारों मेगावाट जल विद्युत (Hydroelectricity) का उत्पादन होगा और बिहार तथा नेपाल के बड़े हिस्से में सिंचाई की सुविधाएं विकसित होंगी।

ग्लेशियर पिघलने का खतरा: विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमनद झील फटने (GLOF) और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। ऐसे में यह बांध एक सुरक्षा कवच बन सकता है।

1954 से 2026 तक: 72 सालों की कोसी कूटनीति का इतिहास
1954 का कोसी समझौता: प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय भारत और नेपाल के बीच कोसी समझौता हुआ, जिसके तहत कोसी बैराज और तटबंध बनाए गए।

नेपाल की चिंताएं (1966 का संशोधन): नेपाल के भीतर यह सवाल उठा कि विस्थापन और जमीन उनकी जा रही है, जबकि बड़ा फायदा भारत को मिल रहा है। 1965 में पीएम लाल बहादुर शास्त्री के नेपाल दौरे के बाद 1966 में समझौते में संशोधन किए गए।

1987 की त्रासदी और हाई डैम की नींव: 1987 में तटबंध टूटने के बाद यह समझ आया कि केवल बैराज और तटबंध काफी नहीं हैं। 1991 में तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान 'सप्तकोसी हाई डैम' की डीपीआर (Detailed Project Report) बनाने पर सहमति बनी।

2004 का जॉइंट प्रोजेक्ट ऑफिस: 2004 में विराटनगर (नेपाल) में एक संयुक्त परियोजना कार्यालय स्थापित किया गया, जिसे 30 महीनों (ढाई साल) के भीतर डीपीआर तैयार करनी थी।

35 साल बाद भी क्यों नहीं बनी DPR? अड़चनें और सवाल
30 महीनों का काम 22 साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। इसके पीछे मुख्य प्रशासनिक और कूटनीतिक कारण निम्नलिखित हैं:

कमेटी की सुस्ती: केंद्र सरकार ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि टोपोग्राफिकल, हाइड्रोलॉजिकल और भूकंपीय अध्ययन तो पूरे हो चुके हैं, लेकिन भारत-नेपाल संयुक्त समिति (Indo-Nepal Joint Committee) की बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं हुईं।

नेपाल की आंतरिक राजनीति और चीन का प्रभाव: नेपाल में भूमि अधिग्रहण, लोगों के पुनर्वास, मुआवजे और भारत के प्रति राजनीतिक संप्रभुता संबंधी संशयों के कारण परियोजना धीमी पड़ी है।

हालिया प्रशासनिक हलचल: बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात कर सप्तकोसी परियोजना की डीपीआर जल्द पूरी कराने के लिए हस्तक्षेप की मांग की है।


रिपोर्ट के अंत में यह गंभीर सवाल उठाया गया है कि क्या कोसी का हाई डैम केवल चुनावी भाषणों और घोषणापत्रों का हिस्सा बना रहेगा? यदि मानसून गुजर जाने के बाद यह फाइल फिर से ठंडे बस्ते में चली गई, तो उत्तर बिहार के करोड़ों लोगों को हर साल बाढ़ का दंश झेलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।


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