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FPI की रिकॉर्ड बिकवाली से दहला दलाल स्ट्रीट: आसान एग्जिट या भारी टैक्स का झटका?

शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान से निवेशक हैरान। 10 महीने में निकले ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा।


Siyasat: देश के लाखों शेयर बाजार निवेशकों के चेहरों पर इन दिनों मायूसी छाई हुई है। बाजार खुलते ही बिकवाली का दौर शुरू होता है और बाजार बंद होने तक रिटेल निवेशकों की मेहनत की कमाई डूबती नजर आती है। एक तरफ जहाँ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) रिकॉर्ड रफ्तार से भारतीय बाजारों से अपना पैसा खींच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नीतिगत स्तर पर कोई ठोस मार्गदर्शन मिलने के बजाय वित्त मंत्रालय से आए एक बयान ने निवेशकों के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है।


आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक की बैठक में हिस्सा लेने बैंकॉक गईं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक अंतरराष्ट्रीय चैनल को दिए इंटरव्यू में बाजार की इस भारी गिरावट और विदेशी निवेशकों की निकासी का ठीकरा "बाजार में जरूरत से ज्यादा लिक्विडिटी (नकदी)" और "आसान एग्जिट विकल्पों" पर फोड़ दिया।

1. 10 महीनों में ₹3.12 लाख करोड़ की निकासी: ऐतिहासिक बिकवाली
आंकड़े बताते हैं कि विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजारों से अभूतपूर्व स्तर पर हाथ खींच रहे हैं:

रिकॉर्ड तोड़ बिकवाली: साल 2026 में केवल 10 महीनों के भीतर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 3.12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच डाले हैं। यह आंकड़ा 2025 के पूरे साल में हुई कुल बिकवाली (1.66 लाख करोड़ रुपये) के दोगुने के करीब है।

अक्टूबर में भारी झटका: जब पूरा देश त्योहारी खरीदारी और उत्साह में डूबा था, अकेले अक्टूबर महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 52,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली की। जुलाई और अगस्त को छोड़ दें तो इस साल हर महीने बिकवाली का दबाव खरीदारी पर भारी रहा है।

हिस्सेदारी रिकॉर्ड निचले स्तर पर: नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर सूचीबद्ध कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर बीते कई वर्षों के न्यूनतम स्तर पर आ गई है।

2. रिटेल निवेशकों की SIP पर ही फोड़ा ठीकरा?
बाजार जानकारों के बीच सबसे तीखी प्रतिक्रिया वित्त मंत्री के 'अत्यधिक लिक्विडिटी' वाले तर्क को लेकर हो रही है:

बदलता रुख: कुछ समय पहले तक सरकार इस बात का श्रेय ले रही थी कि भारतीय रिटेल निवेशक (घरेलू निवेशक) सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए घरेलू बाजार को थामे हुए हैं और विदेशी निवेश पर देश की निर्भरता खत्म हो चुकी है।

विदेशी निवेशकों के लिए 'आसान निकास': अब वित्त मंत्री का तर्क यह दर्शा रहा है कि घरेलू निवेशकों द्वारा म्यूचुअल फंड्स के जरिए डाला जा रहा पैसा ही बाजार में 'जरूरत से ज्यादा नकदी' पैदा कर रहा है, जिससे विदेशी निवेशकों को अपना मुनाफा काटकर आसानी से सुरक्षित निकलने (Exit) का रास्ता मिल रहा है। विश्लेषक पूछ रहे हैं कि जिस घरेलू भागीदारी को आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बताया गया था, क्या अब वही बाजार के पतन का कारण बन गई है?

3. भारी-भरकम टैक्स और सरकारी नीतियां जिम्मेदार?
बाजार के दिग्गज वित्त मंत्री के तर्कों से पूरी तरह असहमत हैं और सरकार के टैक्स ढांचे को इस बिकवाली की मुख्य वजह बता रहे हैं:

कैपिटल गेन टैक्स का बोझ: वर्ष 2018 में मोदी सरकार द्वारा फिर से लागू किए गए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स को 2024 में 10% से बढ़ाकर 12.50% कर दिया गया था, जबकि एसटीटी (STT) को हटाया नहीं गया। शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) टैक्स भी 15% से बढ़ाकर 20% कर दिया गया।

दिग्गज निवेशकों की तीखी टिप्पणी:

मार्केट विशेषज्ञ गुरमीत चड्ढा ने सवाल उठाया कि अत्यधिक टैक्स की वास्तविक समस्या को दरकिनार कर सरकार कभी एआई (AI) तो कभी घरेलू निवेशकों की लिक्विडिटी पर दोष मढ़ देती है।

जाने-माने निवेशक वल्लभ भंसाली ने दो टूक कहा कि भारत विदेशी संस्थागत निवेशकों पर जितना टैक्स लगाता है, उतना दुनिया में कोई नहीं लगाता; इसी का खामियाजा आज बाजार भारी नुकसान के रूप में भुगत रहा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी आंकड़ों के मजबूत होने के दावों के बीच शेयर बाजार से विदेशी पूंजी का इस कदर पलायन नीति-निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी है। विदेशी निवेशकों के डगमगाते भरोसे को दोबारा बहाल करने और अनपेक्षित टैक्स नीतियों की समीक्षा करने के बजाय निवेशकों की ही जमा पूंजी को समस्या करार देना न केवल बाजार के मनोबल को तोड़ता है, बल्कि छोटे निवेशकों को भी अधर में छोड़ देता है।


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