सियासत: टाटा ट्रस्ट्स ने पलटा बोर्ड का फैसला, शेयर बाजार में हाहाकार
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच मची रार। जानिए एन. चंद्रशेखरन के यू-टर्न, नोएल टाटा के विरोध और शेयर बाजार में टाटा कंपनियों के गिरते शेयरों की पूरी कहानी।
Siyasat: भारत के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित औद्योगिक समूह टाटा ग्रुप के बोर्डरूम में एक बार फिर बड़ा सत्ता संघर्ष शुरू हो गया है। टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) को एक बार फिर 5 साल का नया कार्यकाल दिए जाने के फैसले के तुरंत बाद, टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी में करीब 66% हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) ने इसे कानूनी रूप से अवैध करार दे दिया है। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) और बोर्ड के बीच पैदा हुए इस गतिरोध ने कॉर्पोरेट जगत और शेयर बाजार में हड़कंप मचा दिया है।
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के शो सियासत में टाटा समूह के भीतर मचे इस घमासान, कानूनी दांव-पेच और निवेशकों पर पड़ने वाले असर पर विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई है।
विवाद की शुरुआत: कब पलटा फैसला?
अगस्त 2026 में चंद्रशेखरन की घोषणा: 12 अगस्त 2026 को एन. चंद्रशेखरन ने टाटा संस के बोर्ड को सूचित किया था कि फरवरी 2027 में अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद वे दोबारा नियुक्ति के लिए खुद को आगे नहीं करेंगे। अगले ही दिन टाटा ट्रस्ट ने इस फैसले का स्वागत करते हुए नए चेयरमैन के चयन के लिए सिलेक्शन कमेटी बनाने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा था।
सितंबर में अचानक यू-टर्न: लेकिन 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड ने अपने फैसले में यू-टर्न लेते हुए चंद्रशेखरन से अपने फैसले पर पुनः विचार करने का अनुरोध किया और उन्हें अगले 5 साल (2027 के बाद भी) के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
टाटा संस बोर्ड बनाम टाटा ट्रस्ट: असली लड़ाई क्या है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि टाटा साम्राज्य में अंतिम फैसला लेने की शक्ति किसके पास है—टाटा संस के बोर्ड के पास या लगभग दो-तिहाई हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट के पास?
बोर्ड का रुख: 17 सितंबर की बैठक में एन. चंद्रशेखरन ने खुद को इस प्रक्रिया से अलग रखा। बोर्ड के 4 डायरेक्टर्स ने उनके पक्ष में मतदान किया (जिसमें ट्रस्ट के एक नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन भी शामिल थे)। बहुमत के आधार पर बोर्ड ने उन्हें हरी झंडी दे दी।
टाटा ट्रस्ट और नोएल टाटा का विरोध: टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस पुनर्नियुक्ति का कड़ा विरोध किया। टाटा ट्रस्ट का तर्क है कि टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' (Articles of Association) के प्रावधानों के अनुसार, चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए ट्रस्ट के नॉमिनी डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन अनिवार्य है। चूँकि नोएल टाटा ने इसका विरोध किया, इसलिए ट्रस्ट का दावा है कि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से वैध नहीं है।
पूर्व CJI की कानूनी राय: टाटा ट्रस्ट ने बोर्ड के सामने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय भी रखी, जो ट्रस्ट के रुख का समर्थन करती है, हालांकि बोर्ड ने इस पर विचार नहीं किया।
शेयर बाजार पर भारी असर और निवेशकों को झटका
टाटा समूह के भीतर इस अंतरकलह का सीधा असर शेयर बाजार में लिस्टेड टाटा कंपनियों के शेयरों पर देखने को मिला:
टाटा केमिकल्स (करीब 11% की गिरावट)
टाटा टेक्नोलॉजीज (करीब 4% की गिरावट)
टीसीएस (TCS - करीब 4% की गिरावट)
टाटा मोटर्स (करीब 5.25% की गिरावट)
इस उठापटक के चलते टाटा समूह की कंपनियों के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन में भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। इसके अलावा, टाटा संस की संभावित स्टॉक एक्सचेंज लिस्टिंग और आरबीआई के नियमों से जुड़े मुद्दों को लेकर भी बोर्ड और ट्रस्ट के बीच मतभेद बने हुए हैं।
निष्कर्ष: 2016 के मिस्त्री विवाद की यादें ताजा
यह पूरा घटनाक्रम साल 2016 के सायरस मिस्त्री विवाद की याद दिलाता है, जब टाटा समूह एक असाधारण नेतृत्व संघर्ष से गुजरा था। अंतर यह है कि इस बार विवाद किसी चेयरमैन को हटाने के बजाय उत्तराधिकार की पहले से तय प्रक्रिया को बीच में ही पलटने को लेकर है।
फिलहाल, सवाल यह बना हुआ है कि क्या टाटा संस के बोर्ड का बहुमत भारी पड़ेगा या टाटा ट्रस्ट की शेयरधारिता और कानूनी व्याख्या इस जंग को जीतेगी। यह विवाद टाटा समूह के कॉर्पोरेट गवर्नेंस मॉडल की अगली बड़ी परीक्षा बन गया है।
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