क्या कांग्रेस बन गई सपा की नई चुनौती? यूपी में सीटों पर छिड़ी बड़ी सियासी जंग
2027 यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस और सपा के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान तेज हो गई है। बढ़ती दावेदारी ने INDIA गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वही सवाल है, जो हर चुनाव से पहले विपक्ष को परेशान करता है। बीजेपी को हराना ज्यादा मुश्किल है या विपक्ष का एकजुट रहना? 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा। नतीजा भी नजर आया। बीजेपी 2019 की तुलना में आधी रह गई। समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई और कांग्रेस छह सीटें जीतने में सफल रही। लेकिन अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू होते ही दोस्ती की तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। दोनों दलों के बीच बयानबाजी भले ही सीमित हो, हालांकि अंदरखाने सीटों को लेकर शीत युद्ध शुरू हो चुका है।
क्या कांग्रेस के पास 100 से ज्यादा विधानसभा सीटें मांगने का कोई राजनीतिक आधार है? यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ छह सीटों पर जीत दर्ज की। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं और पूरे गठबंधन की सबसे मजबूत ताकत बनकर उभरी। अगर सिर्फ चुनावी प्रदर्शन देखा जाए तो कांग्रेस का स्ट्राइक रेट अच्छा जरूर था, लेकिन क्या उसके संगठन का ढांचा यूपी के हर इलाके में उतना मजबूत है कि वह 120 से 130 विधानसभा सीटों पर चुनौती दे सके?
कांग्रेस के नए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम का कहना है कि गठबंधन बराबरी और सम्मान के साथ होना चाहिए। इसके बाद खबरें आ रही हैं कि कांग्रेस ने करीब 170 विधानसभा सीटों पर प्रोफेशनल सर्वे एजेंसी के जरिए ग्राउंड सर्वे शुरू कर दिया है। यानी कांग्रेस अब यह संदेश देना चाहती है कि वह सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि सत्ता की दावेदार पार्टी है। लेकिन मुद्दा वही है कि दावेदारी सिर्फ इच्छा से तय होती है या जमीन पर पार्टी के असर से भी? क्या कांग्रेस के पास बूथ स्तर का संगठन है? क्या उसके पास हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार हैं? क्या उसके पास उतने कार्यकर्ता हैं, जो 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य में सपा के बराबर लड़ सकें?
इस मामले में कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, "हम लोग तो पहले से ही कह रहे हैं कि सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इसमें संशय कहां है? समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों का मानना है कि बीजेपी को मात देने के लिए सभी सीटों पर मजबूती से लड़ने की जरूरत है। किसी भी सीट पर किसी भी दल का सिंबल हो, उससे क्या फर्क पड़ता है। जो लोग हम लोगों के बीच मनभेद या मतभेद की बात कर रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।"
क्या कांग्रेस की यह रणनीति बीजेपी को हराने के लिए है या समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने के लिए? कई बार शुरुआत बड़ी मांग से होती है, ताकि मोलभाव में बेहतर सौदा मिल सके। क्या कांग्रेस भी यही कर रही है? यदि कांग्रेस 120-130 सीटें मांग रही है या 149 मजबूत सीटों पर प्रोफेशनल एजेंसी से सर्वे करा रही है, तो क्या उसका अंतिम मकसद 90-100 सीटों पर ही समझौता करना है? या वह वास्तव में इतनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है? दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी हालात समझ रही है। अखिलेश यादव जानते हैं कि अगर कांग्रेस को बहुत ज्यादा सीटें दे दी गईं तो नुकसान सपा का होगा। अगर कम सीटें दी गईं तो कांग्रेस नाराज होगी। यानी अखिलेश यादव के सामने चुनावी गणित और गठबंधन धर्म, दोनों का इम्तिहान है।
क्या समाजवादी पार्टी कांग्रेस के बिना ज्यादा मजबूत है या कांग्रेस सपा के बिना? यह सवाल दोनों दलों को परेशान करता है। अगर 2024 का चुनाव अलग-अलग लड़ते, तो क्या कांग्रेस छह सीटें जीत पाती? शायद नहीं। लेकिन दूसरी ओर, क्या समाजवादी पार्टी भी अकेले 37 सीटें जीत पाती? इस पर अलग-अलग तर्क हो सकते हैं, क्योंकि कई सीटों पर दोनों दलों का वोट ट्रांसफर हुआ। कहने का अर्थ यह है कि दोनों ने एक-दूसरे को फायदा पहुंचाया था। लेकिन विधानसभा चुनाव का मिजाज लोकसभा से अलग होता है। लोकसभा में मुद्दे राष्ट्रीय होते हैं, जबकि विधानसभा में जातीय समीकरण, स्थानीय नेता, क्षेत्रीय संगठन और उम्मीदवार सबसे बड़ा फैक्टर बनते हैं। यहीं समाजवादी पार्टी खुद को कांग्रेस से कहीं ज्यादा मजबूत मानती है।
कांग्रेस का तर्क यह है कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहती है। अगर वह हमेशा 40-50 सीटों पर लड़ती रही, तो कभी बड़ी पार्टी नहीं बन पाएगी। यह तर्क राजनीतिक रूप से गलत नहीं कहा जा सकता। हर दल अपने विस्तार की कोशिश करता है। मुद्दा यह है कि क्या गठबंधन में रहते हुए विस्तार संभव है? अगर कांग्रेस ज्यादा सीटों पर लड़ती है, तो क्या समाजवादी पार्टी अपनी सीटें छोड़ेगी? अगर समाजवादी पार्टी सीटें नहीं छोड़ेगी, तो कांग्रेस का विस्तार रुक जाएगा।
यूपी की सियासत पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शेखर श्रीवास्तव कहते हैं, "दरअसल, सियासी लड़ाई में इस तरह के प्रयोग होते रहते हैं। हर दल को अधिकार है कि वह अपना विस्तार करे। लेकिन हालात के हिसाब से फैसले लिए जाते हैं। जहां तक पीडीए की बात है, तो इतिहास में अगर देखें, कांग्रेस की राजनीति भी सपा की ही तरह रही है। अगर यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस दबाव बनाने के लिए इस तरह की बातें कर रही है, तो इसे आप शिगूफा मान सकते हैं। इसमें दो मत नहीं है कि इस समय इन दोनों दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी की तरफ से है। चुनाव से पहले सीटों को लेकर शीत युद्ध जैसी खबरें सुनने को मिलती रहेंगी।"
समाजवादी पार्टी का मानना है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई वही लड़ रही है। उसका संगठन गांवों तक फैला हुआ है। उसके पास पीडीए का आधार है। ऐसे में वह अपनी मजबूत सीटें कांग्रेस के लिए क्यों छोड़े? सपा नेताओं का मानना है कि कांग्रेस को 60 से 80 सीटें मिल सकती हैं, लेकिन उससे ज्यादा देना राजनीतिक नुकसान होगा।
क्या सीटों की यह लड़ाई 2027 से पहले इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएगी? बीजेपी के नेता अभी से विपक्ष पर हमला कर रहे हैं। अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच यह खींचतान सार्वजनिक होती गई, तो उसका सबसे बड़ा फायदा किसे मिलेगा? जवाब साफ है—बीजेपी को। क्योंकि चुनाव सिर्फ गणित से नहीं, बल्कि केमिस्ट्री से भी जीते जाते हैं। अगर कार्यकर्ता ही भ्रम में रहेगा कि लड़ना किसके लिए है, तो चुनावी मैदान में उसका जज्बा भी कमजोर पड़ जाएगा।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज यादव शीत युद्ध जैसी बातों से इनकार करते हैं। उन्होंने कहा, "इंडिया गठबंधन का मकसद साफ है। पीडीए की मजबूती के मुद्दे पर हम दोनों दल एक हैं। यह सब बीजेपी की साजिश है। बीजेपी के लोग यही चाहते हैं कि विपक्ष में मनभेद की बात उछालकर मतभेद को हवा दी जाए, ताकि उनका रास्ता साफ हो जाए। लेकिन यूपी की जनता अब इस बात को समझ चुकी है कि प्रदेश के हित में इंडिया गठबंधन ही बेहतर विकल्प है। कांग्रेस और सपा के बीच तनातनी या शीत युद्ध की बात कोरी कल्पना से अधिक कुछ भी नहीं है।"
उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 202 सीटों की जरूरत होती है। अगर विपक्ष बंटा, तो फायदा बीजेपी को होगा। यदि विपक्ष साथ रहा, तो सीट बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती बनेगा। यानी जीत का रास्ता गठबंधन से होकर जाता है, लेकिन वही गठबंधन सबसे बड़ी परीक्षा भी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर है। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है, तो समाजवादी पार्टी अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहती है। दोनों का मकसद बीजेपी को हराना है, लेकिन दोनों अपने-अपने राजनीतिक भविष्य से समझौता भी नहीं करना चाहते।

