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अमेरिका-ईरान जंग से फिर दहला पश्चिम एशिया, भारत पर मंडराया महंगाई का खतरा

डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान; हॉर्मुज जलडमरूमध्य (State of Hormuz) में तनाव से टूटा एक महीने का सीजफायर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 7% तक उछलीं।


Siyasat: पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर आकर खड़ा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े बयानों और लगातार दूसरे दिन ईरान के विभिन्न शहरों पर हुए अमेरिकी मिसाइल हमलों ने दुनिया भर की चिंताएं बढ़ा दी हैं। 'द फेडरल देश' के खास शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम को डिकोड करते हुए बताया कि मात्र एक महीने के भीतर ही अमेरिका और ईरान के बीच हुआ ऐतिहासिक सीजफायर पूरी तरह टूट चुका है। दोनों देश एक बार फिर आमने-सामने हैं और इसका सीधा असर अब वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।


एक महीने में ही क्यों टूटा इस्लामाबाद समझौता?
याद दिला दें कि इसी साल 14 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर और शांति समझौते पर सहमति बनी थी, जिसके बाद 17 जून 2026 को दोनों देशों ने इस्लामाबाद में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Hormuz Strait) में जहाजों पर हुए हमलों के बाद यह शांति समझौता एक महीना भी नहीं टिक सका। अमेरिकी सेना (CENTCOM) का दावा है कि उसने ईरान के करीब 90 सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी की है, जिसमें एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन स्टोरेज और नौसैनिक ठिकाने शामिल हैं। इसके जवाब में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने भी बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों पर पलटवार करने का दावा किया है।

डोनाल्ड ट्रंप के बदलते बयान और अमेरिका में विरोध
इस पूरे मामले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख काफी अनिश्चित दिखाई दे रहा है। पहले उन्होंने बयान दिया कि दोनों देशों के बीच सीजफायर खत्म हो चुका है, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उन्होंने कहा कि ईरान के साथ फिर से बड़ी जंग नहीं होगी, हालांकि अगर ईरान ने कोई हिमाकत की तो 10 गुना ताकत से जवाब दिया जाएगा। ट्रंप के इस रुख का अमेरिका के भीतर ही कड़ा विरोध शुरू हो गया है। अमेरिकी सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन और बर्नी सैंडर्स ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर ट्रंप के इस कदम को लापरवाह बताया है और कहा है कि इस युद्ध की वजह से अमेरिकी टैक्सपेयर्स के अरबों डॉलर बर्बाद हो रहे हैं और दुनिया भर में महंगाई बढ़ रही है।

भारत की बढ़ेगी मुसीबत: तेल, एलपीजी और शेयर बाजार पर बड़ा असर
पश्चिम एशिया में इस युद्ध के दोबारा शुरू होने से भारत की मुश्किलें सबसे ज्यादा बढ़ने वाली हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से दुनिया की 20% तेल सप्लाई होती है और इस रूट पर तनाव आते ही इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल के दाम 7% तक बढ़कर $79 प्रति बैरल के करीब पहुंच गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबा खिंचा, तो कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर $120 प्रति बैरल तक जा सकती हैं, जैसा कि इस साल फरवरी में हुआ था। तब भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम ₹8 प्रति लीटर तक बढ़ गए थे और एलपीजी (LPG) व एलएनजी (LNG) की किल्लत के कारण घरेलू रसोई गैस का भारी संकट खड़ा हो गया था। युद्ध के इस नए आगाज से भारतीय शेयर बाजार भी सहम गया है; हाल ही में सेंसेक्स में 2000 अंक और निफ्टी में 500 अंकों की भारी गिरावट दर्ज की गई थी, जिससे निवेशकों के मन में डर का माहौल है।


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