कांग्रेस का नया चुनावी फॉर्मूला: 20 लाख दिखाओ, टिकट पाओ! खजाना खाली या बदली रणनीति?
यूपी में कांग्रेस का मॉडल, अपने पैसे से लड़ो चुनाव! कांग्रेस को चाहिए ‘जिताऊ’ के साथ ‘पैसे वाला’ उम्मीदवार?
क्या कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं है? जिसके बाद उसे बैंक खाते में 20 लाख रुपये दिखाओ चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस का टिकट पाओ का सहारा लेना पड़ रहा है. 2027 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के चुनाव और उन्हें टिकट देने के लिए ये फॉर्मूला निकाला है. यानी चुनाव लड़ने के दौरान पार्टी अपने खजाने से पैसे नहीं देगी बल्कि उम्मीदवार को पहले अपने जेब से पैसे लगाने होंगे और यदि कांग्रेस का उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहा तो पार्टी उसे चुनावी खर्च के तौर पर 40,000 रुपये का भुगतान चुनाव के बाद रिमबर्समेंट के रूप में करेगी.
यानि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट चाहिए तो सिर्फ नेता होना, संगठन में पकड़ होना या जनता के बीच लोकप्रिय होना काफी नहीं होगा. बल्कि टिकट मांगने वाले उम्मीदवार कितना मोटा आसामी है यानी उसकी जेब कितनी मजबूत है, यह भी टिकट की दावेदारी तय करने के क्राईटेरिया में शामिल होने जा रही है. तो सवाल उठता है कांग्रेस ऐसा फैसला लेने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा है .
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस इस बार उत्तर प्रदेश में अपने उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए पार्टी फंड से पहले पैसे नहीं देगी. बल्कि इसके उलट टिकट मांगने वाले दावेदारों को पार्टी को ये दिखाना होगा कि उनका बैंक बैलेंस कितना मजबूत है और उनके खाते में पहले से 20 लाख रुपये हैं भी या नहीं. यानी पहले पैसा दिखाइए, फिर टिकट की दावेदारी कीजिए. और टिकट हासिल करने के बाद अपने पैसे से चुनाव लड़िए और अगर जीत गए तो पार्टी उम्मीदवार को करीब 40 लाख रुपए Reimburse करेगी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस टिकट देने के इस फॉर्मूला के जरिए ये परखना चाहती है कि उम्मीदवार चुनाव लड़ने को लेकर कितना गंभीर है. लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीति में अब ‘जिताऊ उम्मीदवार’ के साथ ‘पैसे वाला उम्मीदवार’ होना भी जरूरी हो जाएगा? और उससे भी बड़ा सवाल जो कांग्रेस लगातार सामाजिक न्याय, भागीदारी और आम कार्यकर्ता को आगे बढ़ाने की बात करती है, क्या उसका यह फॉर्मूला आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन जमीन पर मजबूत कार्यकर्ताओं के लिए टिकट का रास्ता और मुश्किल नहीं कर देगा? सवाल उठता है कांग्रेस को क्यों लेना पड़ रहा है ये फैसला? इस फैसले की जड़ में कांग्रेस के पिछले चुनावों का अनुभव बताया जा रहा है. हालांकि कांग्रेस के नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने इस खबर का खंडन किया है. उन्होंने कहा ये बीजेपी द्वारा फैलाया जा रहा है.
दरअसल पहले कांग्रेस विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशियों को करीब 40 लाख रुपए तक पार्टी फंड देती थी. पहली किस्त करीब 25 लाख रुपए और दूसरी करीब 15 लाख रुपए की होती थी. लेकिन पार्टी की अंदरूनी समीक्षा में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि कई प्रत्याशी टिकट तो ले लेते थे, पार्टी से चुनाव लड़ने का पैसा भी लेते थे, लेकिन जमीन पर मुकाबला उतनी मजबूती से नहीं करते थे. आरोप यह भी रहा कि कुछ उम्मीदवार चुनाव अभियान पर पूरा पैसा खर्च करने के बजाय पार्टी से मिले फंड को बचाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते थे. नतीजा ये रहा कि कई सीटों पर कांग्रेस का चुनाव लड़ना मुकाबले से ज्यादा औपचारिकता बनकर रह गया. यही वजह है कि अब कांग्रेस इसका उल्टा मॉडल अपनाने जा रही है. पहले अपना पैसा लगाओ... चुनाव जीतकर दिखाओ. फिर पार्टी पैसा लौटाएगी.
राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह कांग्रेस का एक तरह का ‘प्रदर्शन आधारित फंडिंग मॉडल’ है.... लेकिन सवाल फिर वही है राजनीतिक प्रदर्शन का पैमाना सिर्फ चुनाव जीत होगी या पार्टी के लिए वोट और संगठन खड़ा करना भी होगा?
अब सवाल उठता है कि 20 लाख रुपये का ही बैंक बैलेंस टिकट दावेदार के खाते में क्यों होना चाहिए? इस रकम के पीछे भी कांग्रेस का अपना चुनावी गणित दिखाई देता है. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 395 उम्मीदवार उतारे थे. इनमें केवल दो उम्मीदवार जीत पाए. जीतने वाले दोनों उम्मीदवारों का औसत चुनावी खर्च करीब 22.61 लाख रुपए था, जबकि हारने वाले 393 उम्मीदवारों का औसत घोषित खर्च करीब 18.88 लाख रुपए रहा था. यही वजह है कि पार्टी 20 लाख रुपये को बेंचमार्क मानकर चल रही है. हालांकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक उम्मीदवार के चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा 40 लाख रुपए है.
तो क्या गरीब कार्यकर्ता टिकट की दौड़ से बाहर? यहीं कांग्रेस के इस प्रयोग पर सबसे गंभीर राजनीतिक सवाल खड़ा होता है. मान लीजिए किसी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का कोई कार्यकर्ता पिछले 15-20 साल से पार्टी के लिए काम कर रहा है. उसकी जातीय-सामाजिक पकड़ मजबूत है, संगठन के कार्यकर्ता उसके साथ हैं और जनता में भी उसकी स्वीकार्यता है. लेकिन उसके बैंक खाते में 20 लाख रुपए नहीं हैं. दूसरी तरफ कोई आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस में आता है. उसके पास पैसा भी है, गाड़ियां भी हैं और चुनावी तंत्र खड़ा करने की क्षमता भी. तो दोनों में टिकट किसे मिलेगा? कांग्रेस कह रही है कि पैसा अकेला पैमाना नहीं होगा. उम्मीदवार की आर्थिक क्षमता, सामाजिक आधार और राजनीतिक स्वीकार्यता तीनों देखे जाएंगे. फिर भी बैंक बैलेंस को स्क्रीनिंग का हिस्सा बनाना कांग्रेस के लिए वैचारिक सवाल जरूर पैदा करता है. क्योंकि राहुल गांधी जिस राजनीति में सामाजिक न्याय, हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व की बात कर रहे हैं, उसी राजनीति में अगर चुनाव लड़ने की शुरुआती शर्त आर्थिक क्षमता बनती है तो सवाल उठेगा जिसकी जितनी भागीदारी की बात हो रही है, क्या उसकी उतनी आर्थिक क्षमता भी जरूरी होगी?

