
डीके शिवकुमार का पहला बड़ा इम्तिहान; अडानी के टेंडर पर फंसा पेच
कर्नाटक के मनोनीत सीएम डीके शिवकुमार के सामने बेंगलुरु टनल प्रोजेक्ट की बड़ी चुनौती। अडानी समूह की एल-1 बोली सरकार के अनुमान से 28% अधिक, राहुल गांधी की मंजूरी होगी अहम।
DK Shivkumar's Dilemma Over Adani: कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में बुधवार (3 जून 2026) को शपथ लेने जा रहे डीके शिवकुमार के सामने सत्ता संभालते ही पहला और सबसे बड़ा राजनीतिक इम्तिहान आने वाला है। शिवकुमार को बेंगलुरु के अपने ड्रीम प्रोजेक्ट यानी 'ट्विन टनल रोड प्रोजेक्ट' के लिए अडाणी समूह की बोली को मंजूरी देने या न देने पर एक बेहद कड़ा और संवेदनशील फैसला करना होगा।
इस 17,698 करोड़ रुपये की महापरियोजना का नागरिक समूहों और भाजपा द्वारा लगातार विरोध किया जा रहा है। इसके बावजूद, सिद्धारमैया सरकार में बेंगलुरु विकास के प्रभारी रहे डीके शिवकुमार का हमेशा से मानना रहा है कि सिल्क बोर्ड जंक्शन से हेब्बाल तक बनने वाली यह टनल रोड बेंगलुरु की ट्रैफिक समस्या को पूरी तरह बदल कर रख देगी।
लेकिन कांग्रेस पार्टी के लिए यह मामला भारी राजनीतिक विडंबना और धर्मसंकट लेकर आया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित कांग्रेस के तमाम शीर्ष नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ गौतम अडाणी पर लगातार तीखे हमले करते रहे हैं। ऐसे में अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस शासित राज्य में खुद राहुल गांधी इस प्रोजेक्ट को गौतम अडाणी की कंपनी को सौंपने की हरी झंडी देंगे या नहीं?
25 ट्रैफिक जाम से मिलेगी मुक्ति, पर सरकार के अनुमान से 28% महंगी है अडाणी की बोली
बेंगलुरु स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा हेब्बाल के एस्टीम मॉल से सिल्क बोर्ड तक बनने वाली इस टनल रोड के लिए टेंडर जारी किए गए थे। इस 16.75 किलोमीटर लंबी सिग्नल-फ्री टनल के बनने से वाहन चालकों को 25 से अधिक ट्रैफिक जाम से मुक्ति मिलेगी और रोजाना यात्रा का करीब 45 मिनट का समय बचेगा, जिससे शहर के आईटी कॉरिडोर तक सीधी पहुंच आसान हो जाएगी.
अडाणी समूह ने टनल प्रोजेक्ट के दोनों पैकेजों के लिए सबसे कम बोली (Lowest Bid) लगाई है। लेकिन पेंच यह है कि अडाणी समूह द्वारा कोट की गई यह रकम सरकार की अनुमानित लागत से 24 से 28 फीसदी तक अधिक है। इस बढ़ी हुई लागत (Cost Escalation) के कारण ही कॉन्ट्रैक्ट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया अटकी हुई है और अब इस पर अंतिम फैसला नवगठित कैबिनेट को ही लेना होगा।
'अडाणी' के निशाने पर रहते हैं राहुल गांधी, पर कर्नाटक में है उनका 20,000 करोड़ का निवेश
राहुल गांधी लगातार पीएम मोदी पर गौतम अडाणी को फायदा पहुंचाने और दोनों के बीच कथित 'सांठगांठ' होने का आरोप लगाते रहे हैं। पिछले महीने ही राहुल गांधी ने दावा किया था कि अमेरिका में लंबित अडाणी के मामले को रफा-दफा कराने के लिए मोदी ने भारत को अमेरिका के हाथों 'बेच' दिया है और जल्द ही डोनाल्ड ट्रंप इस मामले को खारिज कर देंगे।
राजनीतिक मोर्चे पर जारी इस तीखी बयानबाजी के बीच जमीनी हकीकत यह है कि कर्नाटक में अडाणी समूह ने पहले ही विभिन्न क्षेत्रों में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर रखा है। इतना ही नहीं, समूह ने साल 2022 से 2029 के बीच राज्य में 1 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश की योजना बनाई है। अडाणी समूह कर्नाटक में रिन्यूएबल एनर्जी, सीमेंट, एयरपोर्ट, पोर्ट डेवलपमेंट, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन और ट्रांसपोर्टेशन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है.
क्या अडाणी को टेंडर देना मजबूरी है? जानें सुप्रीम कोर्ट के नियम
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अडाणी समूह के भारी निवेश को देखते हुए डीके शिवकुमार इस टेंडर को हरी झंडी दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए राहुल गांधी की सहमति बेहद जरूरी होगी। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, अडाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) भले ही सबसे कम बोली लगाने वाली (L1) कंपनी बन गई है और उसने प्रोजेक्ट साइट पर सॉयल टेस्टिंग (मिट्टी की जांच) भी शुरू कर दी है, लेकिन सरकार के लिए उसे कॉन्ट्रैक्ट देना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने 'टाटा सेल्युलर बनाम भारत संघ (1994)' और 'जगदीश मंडल बनाम ओडिशा राज्य (2007)' जैसे ऐतिहासिक फैसलों में साफ किया है कि टेंडर प्रक्रिया में कॉन्ट्रैक्ट देने या न देने का विवेकाधिकार पूरी तरह सरकार के पास होता है और अदालतें सामान्यतः ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती हैं। ऐसे में अब गेंद पूरी तरह कांग्रेस आलाकमान और डीके शिवकुमार के पाले में है।
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