हरियाणा के बालाली में फीकी पड़ी दंगल की गूंज, फिर भी जिंदा है फोगाट नाम
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हरियाणा के बालाली में फीकी पड़ी दंगल की गूंज, फिर भी जिंदा है फोगाट नाम

महावीर फोगाट ने बेटियों को पहलवान बनाकर समाज की सोच बदली। आज फोगाट बहनें अलग राहों पर हैं, जबकि बालाली का ऐतिहासिक अखाड़ा भी बदल रहा है।


हरियाणा के चरखी दादरी जिले के बालाली गांव में एक समय ऐसा मिट्टी का अखाड़ा हुआ करता था, जिसने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई महिला पहलवानों को जन्म दिया। आज उस अखाड़े की जगह एक नया मकान बन रहा है। इस बदलाव की निगरानी कर रहे हैं वही शख्स महावीर सिंह फोगाट, जिन्होंने उस दौर में परंपराओं को चुनौती दी थी जब गांव में लड़कियों के कुश्ती खेलने की कल्पना भी नहीं की जाती थी ।

महावीर फोगाट स्वयं एक शौकिया पहलवान रहे हैं। 1990 के दशक में उन्होंने अपने घर पर मिट्टी का अखाड़ा बनाकर अपनी बेटियों और भतीजियों—गीता, बबीता, रितु, संगीता, विनेश और प्रियंका फोगाट—को कुश्ती की ट्रेनिंग देना शुरू किया। आज उम्र के साठवें दशक के उत्तरार्ध में पहुंच चुके महावीर अपना अधिकांश समय उसी पुराने अखाड़े की जगह बन रहे नए घर के निर्माण कार्य को देखते हुए बिताते हैं।

हालांकि अब वह भीड़ नहीं जुटती जो कभी भारत के सबसे चर्चित कुश्ती परिवार की एक झलक पाने के लिए यहां पहुंचती थी। परिवार के भीतर मतभेदों की चर्चाएं भी होती रहती हैं, लेकिन फोगाट परिवार लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। हाल ही में ओलंपियन पहलवान और जुलाना से कांग्रेस विधायक विनेश फोगाट एशियन गेम्स 2026 चयन ट्रायल में भागीदारी को लेकर कानूनी और खेल विवाद में फंस गईं। अंततः वह ट्रायल हार गईं, लेकिन एक बार फिर पूरा फोगाट परिवार चर्चा में आ गया।

विनेश के समर्थन में महावीर

जहां बबीता फोगाट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश का स्वागत किया जिसमें विनेश को चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी गई थी, वहीं महावीर फोगाट ने भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) की आलोचना की। महासंघ ने पहले विनेश को ट्रायल में हिस्सा लेने से रोक दिया था और तर्क दिया था कि संन्यास से लौटने वाले खिलाड़ियों के लिए निर्धारित नोटिस अवधि का पालन जरूरी है। विनेश मातृत्व अवकाश के बाद वापसी कर रही थीं।

महावीर का कहना है कि किसी भी पहलवान को चयन ट्रायल की तैयारी के दौरान पूरी तरह प्रशिक्षण पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन विनेश को लगातार कानूनी लड़ाइयों और अनावश्यक विवादों में उलझना पड़ा।

बेटे का सपना, बेटियों ने किया पूरा

महावीर फोगाट ने दिल्ली के प्रसिद्ध चंदगी राम अखाड़े में प्रशिक्षण लिया था। उनका सपना था कि उनके बच्चे पहलवान बनें और उनमें से कम से कम एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करे। शुरुआत में यह सपना बेटे के लिए देखा गया था, लेकिन जब उनके घर चार बेटियां पैदा हुईं और बेटा नहीं हुआ, तो उन्होंने अपने सपने की दिशा बदल दी। यही कहानी आगे चलकर इतिहास बन गई और इसी संघर्ष ने 2016 की सुपरहिट फिल्म Dangal को प्रेरणा दी।

जब गांव में लड़कियों की कुश्ती अकल्पनीय थी

महावीर फोगाट उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि उस समय गांव में केवल लड़के ही कुश्ती करते थे। लड़कियों को घर की चारदीवारी और घरेलू कामकाज तक सीमित रखा जाता था। खेलों में करियर बनाना तो दूर, कुश्ती लड़कियों के लिए कल्पना से भी परे था।उन्होंने बताया कि गांव के अखाड़े में लड़कियों को प्रवेश नहीं मिलता था, इसलिए उन्हें अपने खेत में मिट्टी का अखाड़ा बनाना पड़ा। गीता और बबीता के छोटे बालों का मजाक उड़ाया जाता था और सलवार-कमीज पहनकर खेतों में दौड़ते हुए देखकर लोग उनका उपहास करते थे।

गीता की जीत ने बदल दी तस्वीर

विरोध के बावजूद फोगाट बहनों ने हार नहीं मानी। बबीता फोगाट कहती हैं कि वास्तविक जीवन में उन्हें जितना विरोध झेलना पड़ा, वह फिल्म ‘दंगल’ में दिखाए गए संघर्ष से कहीं अधिक था। उन्होंने और उनकी बहनों ने लड़कों के साथ अभ्यास कर खुद को मजबूत बनाया।साल 2010 में बड़ा मोड़ तब आया जब गीता फोगाट ने दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं। इसके बाद बबीता ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की।

महावीर कहते हैं कि इस पदक ने न सिर्फ उनकी सोच को सही साबित किया, बल्कि जो लोग पहले उनका मजाक उड़ाते थे, वे अपनी बेटियों को प्रशिक्षण दिलाने के लिए उनके घर के बाहर कतार लगाने लगे। इससे गांव की लड़कियों के लिए नए अवसर खुले और पुरुष प्रधान समाज की सोच भी बदली।

मां ने निभाई अहम भूमिका

महावीर की पत्नी दया कौर का कहना है कि उनकी जिम्मेदारी बेटियों को सही खान-पान उपलब्ध कराना था। उन्होंने कभी लड़कियों को घरेलू कामों में नहीं लगाया ताकि उनका पूरा ध्यान केवल प्रशिक्षण पर रहे। घी और दूध की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता थी।

फोगाट बहनों ने बदली हरियाणा की पहचान

फोगाट बहनों की सफलता ने बालाली गांव को खेल मानचित्र पर स्थापित कर दिया। पहले हरियाणा की पहचान अक्सर घटते लिंगानुपात जैसी खबरों से जुड़ी रहती थी, लेकिन फोगाट बहनों के पदकों ने लड़कियों के प्रति समाज की सोच बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।ओलंपिक स्तर के रेफरी प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद गर्ग का मानना है कि गीता फोगाट की 2010 की जीत ने हरियाणा में महिला कुश्ती को नई पहचान दिलाई और मीडिया ने महावीर फोगाट की प्रेरणादायक कहानी को पूरे देश तक पहुंचाया।

परिवार में बिखराव की चर्चाएं

समय के साथ फोगाट परिवार के सदस्य अलग-अलग रास्तों पर बढ़ गए। महावीर के भाई राजपाल फोगाट के निधन के बाद उन्होंने विनेश और प्रियंका को भी अपनी बेटियों की तरह प्रशिक्षित किया। इनमें से विनेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे सफल पहलवानों में शामिल रहीं और कई ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

हालांकि 2023 के पहलवान आंदोलन के बाद परिवार के भीतर मतभेदों की चर्चा तेज हो गई। विनेश फोगाट और Bajrang Punia आंदोलन के प्रमुख चेहरे बने, जबकि बाद में बबीता फोगाट ने कांग्रेस पर आंदोलन का राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया।इसके बाद विनेश ने कांग्रेस के टिकट पर 2024 हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वहीं बबीता भाजपा से जुड़ी रहीं।

अब अलग-अलग राहों पर हैं फोगाट बहनें

आज फोगाट बहनें अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं। विनेश विधायक हैं, बबीता राजनीति में सक्रिय हैं, गीता हरियाणा पुलिस में डीएसपी हैं, संगीता की शादी बजरंग पूनिया से हुई है, रितु ने मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स का रुख कर लिया है और प्रियंका चोटों के कारण प्रतिस्पर्धी कुश्ती से दूर हो चुकी हैं।

विरासत का भविष्य अनिश्चित

बालाली में अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं दिखती। गांव में सरकारी सहायता से संचालित एक कुश्ती अकादमी है, लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि वहां बिजली, पेयजल और अच्छे मैट जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी बेहतर प्रशिक्षण के लिए गांव छोड़ देते हैं।महावीर फोगाट भी अब सक्रिय कोचिंग से काफी हद तक दूर हो चुके हैं। उनका कहना है कि आज के अधिकांश खिलाड़ी केवल सरकारी नौकरी पाने के उद्देश्य से कुश्ती करते हैं, जबकि उनका लक्ष्य हमेशा ओलंपिक स्वर्ण पदक रहा है।

फिलहाल बालाली में फोगाट परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने वाला कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नजर नहीं आता। कभी महिला कुश्ती की क्रांति का केंद्र रहा यह गांव आज शांत है, लेकिन फोगाट परिवार की कहानी भारतीय खेल इतिहास में हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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