
कभी थी तमिलनाडु की सबसे ताकतवर पार्टी, अब पहचान के संकट में AIADMK
एआईएडीएमके (AIADMK) में नेताओं के पलायन और लगातार चुनावी हार के बीच EPS के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। टीवीके (TVK) के उभार ने पार्टी की चुनौतियां और बढ़ा दी हैं।
कभी तमिलनाडु की राजनीति की सबसे मजबूत ताकतों में गिनी जाने वाली अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) आज गहरे आंतरिक संकट से जूझती दिखाई दे रही है। एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) द्वारा स्थापित और बाद में जे. जयललिता के नेतृत्व में मजबूत हुई इस पार्टी ने दशकों तक अपने समर्थकों के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाए रखा। लेकिन अब पार्टी के भीतर बढ़ती असहजता, नेताओं का पलायन और संगठनात्मक कमजोरी नई बहस को जन्म दे रही है।
भावनात्मक जुड़ाव से बनी थी AIADMK की ताकत
AIADMK सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं थी, बल्कि एक आंदोलन थी। एमजीआर और जयललिता ने अपने समर्थकों के साथ ऐसा भावनात्मक संबंध बनाया, जो भारतीय राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है। पार्टी के समर्थक अपने शरीर पर पार्टी का चुनाव चिह्न “दो पत्तियां” गुदवाते थे। कई कार्यकर्ताओं ने पार्टी के लिए अपनी जमा-पूंजी और यहां तक कि पारिवारिक संपत्ति तक दान कर दी थी।
एमजीआर और जयललिता के निधन के बाद भी समर्थकों ने अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए असाधारण कदम उठाए। लाखों लोगों के लिए AIADMK एक राजनीतिक दल से बढ़कर उनकी पहचान बन गई थी।
नेताओं के पलायन से बढ़ी चिंता
हाल के वर्षों में कई वरिष्ठ नेता और निर्वाचित प्रतिनिधि AIADMK छोड़ चुके हैं। कुछ अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) में शामिल हुए, जबकि कुछ ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का रुख किया, जिसे AIADMK का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है।एक समय तमिलनाडु की राजनीति पर दबदबा रखने वाली पार्टी के लिए यह सिर्फ संख्यात्मक नुकसान नहीं, बल्कि संगठन के भीतर घटते भरोसे का संकेत माना जा रहा है। कई कार्यकर्ता निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि पार्टी का मनोबल दशकों में सबसे कमजोर स्तर पर है।
EPS की नेतृत्व क्षमता पर सवाल
AIADMK के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पडी के. पलानीस्वामी (EPS) के नेतृत्व पर आलोचना इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि पार्टी को विधानसभा, लोकसभा, स्थानीय निकाय और उपचुनावों में लगातार झटके लगे हैं।
आलोचकों का आरोप
जयललिता की मृत्यु के बाद पार्टी का पुनर्निर्माण करने में EPS सफल नहीं रहे।
समर्थकों का तर्क
EPS ने एक विभाजित संगठन की कमान संभाली और भारी दबाव के बावजूद पार्टी को टूटने से बचाए रखा। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक नेतृत्व का आकलन चुनावी नतीजों से करते हैं, और लगातार हार ने जमीनी स्तर पर भरोसा कमजोर किया है।
TVK का उभार नई चुनौती
विजय की पार्टी TVK AIADMK के लिए नई चुनौती बनकर उभरी है। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि TVK उसी राजनीतिक स्थान पर कब्जा करने की कोशिश कर रही है, जिस पर कभी लगभग पूरी तरह AIADMK का अधिकार था — करिश्माई नेतृत्व, युवाओं की भागीदारी और भावनात्मक अपील।
TVK सरकार में मंत्री और पूर्व AIADMK नेता निर्मल कुमार ने EPS की आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी और नेतृत्व दोनों पर भरोसा कम होता दिखाई दे रहा है। वहीं पूर्व मंत्री उदुमलाई के. राधाकृष्णन और एन. आर. शिवापति जैसे नेताओं ने TVK में युवाओं के आकर्षण और नई संभावनाओं का हवाला दिया।
AIADMK का भावनात्मक इतिहास
समर्थकों की चिंता को समझने के लिए पार्टी के इतिहास को देखना जरूरी है। 1987 में एमजीआर की मृत्यु पर तमिलनाडु में व्यापक जनशोक देखने को मिला था। उनके समर्थक उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा मानते थे।जयललिता के दौर में यह भावनात्मक रिश्ता और गहरा हुआ। समर्थक उन्हें “अम्मा” कहते थे। महिला कार्यकर्ताओं ने पार्टी को मजबूत करने के लिए गहने और बचत तक दान की। 2011 में AIADMK की जीत के बाद एक महिला समर्थक द्वारा खुशी में अपनी जीभ काटकर भगवान को अर्पित करने की खबर भी सामने आई थी। ये घटनाएं पार्टी और समर्थकों के बीच गहरे भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती हैं।
पहचान का संकट
AIADMK के भीतर चिंता सिर्फ चुनावी हार तक सीमित नहीं है। कई समर्थकों को डर है कि पार्टी धीरे-धीरे अपनी वह पहचान खो रही है जो एमजीआर और जयललिता के दौर में बनी थी।एमजीआर के समय पार्टी जनकल्याण, लोकप्रियता और करिश्मे का मिश्रण थी। जयललिता के दौर में यह एक केंद्रीय नेतृत्व वाली पार्टी बन गई, जहां उनका अधिकार निर्विवाद था।
जयललिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार की लंबी लड़ाई शुरू हुई। गुटबाजी बढ़ी, वरिष्ठ नेताओं में नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा हुई और कार्यकर्ता आधार बिखरता गया। EPS ने अंततः खुद को प्रमुख नेता के रूप में स्थापित किया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि वे अभी तक वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं बना पाए हैं जो एमजीआर और जयललिता को हासिल था।
भविष्य की लड़ाई
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या EPS अगले बड़े चुनावों से पहले AIADMK को नई दिशा दे पाएंगे। दशकों तक तमिलनाडु पर शासन करने वाली यह पार्टी आज अपनी प्रासंगिकता को लेकर सवालों के घेरे में है।यदि पार्टी की कमजोरी जारी रही, तो तमिलनाडु की विपक्षी राजनीति का स्वरूप बदल सकता है। यह सिर्फ एक दल का संकट नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को प्रभावित करने वाला मुद्दा बनता जा रहा है।

