
भाषणों में एम्स, बजट में सन्नाटा, केरल बनाम केंद्र की नई लड़ाई
केंद्रीय बजट में एम्स की अनुपस्थिति ने केरल में सियासी बहस तेज कर दी है। सुरेश गोपी के बयान, राज्य-केंद्र टकराव और स्वास्थ्य दबाव ने इसे भरोसे की परीक्षा बना दिया है।
मलयालम फ़िल्म अभिनेता से राजनेता बने सुरेश गोपी का नाम शायद ही कभी संयम के साथ जोड़ा गया हो। हाल ही में जब केंद्रीय मंत्री और त्रिशूर से सांसद सुरेश गोपी ने केरल में एम्स (AIIMS) अस्पताल की बहस को दोबारा हवा दी, तो पर्यवेक्षकों को यह कदम नाटकीय और टकरावपूर्ण लगा। केरल को हर हाल में एम्स मिलना चाहिए।इस पर ज़ोर देते हुए उन्होंने पहले अलाप्पुझा को संभावित स्थान बताया और फिर जल्दी ही त्रिशूर को वैकल्पिक विकल्प के रूप में जोड़ दिया।
केंद्रीय बजट से ठीक पहले उन्होंने एक बार फिर इस मुद्दे को उठाया, इस बार भाषा और तीखी थी। विरोधियों पर सीधे हमले किए गए और एक आपत्तिजनक शब्दावली का इस्तेमाल हुआ, जिसकी कड़ी आलोचना हुई। इससे यह साफ़ हो गया कि एम्स पर बहस अब नीति-चर्चा से फिसलकर राजनीतिक तमाशे में बदल चुकी है। यह तमाशा चर्चा का केंद्र ज़रूर बना और राज्य में एम्स एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गया।
असली ट्रिगर: बजट की चुप्पी
हालांकि, ताज़ा विवाद की असली वजह मंच से कही गई बातें नहीं थीं, बल्कि वह था जो केंद्रीय बजट में नहीं कहा गया। एक बार फिर न तो कोई घोषणा हुई, न कोई बजटीय आवंटन और न ही केरल में एम्स के लिए कोई समय-सीमा तय की गई। राज्य में जिस बजट पर पैनी नज़र थी, उसमें यह चुप्पी ही सबसे बड़ी ख़बर बन गई। यह इसलिए भी अहम हो गई क्योंकि विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और औपचारिक स्तर पर पहले ही उम्मीदें जगाई जा चुकी थीं।
2024 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज को राज्य में एम्स स्थापित करने के प्रस्ताव पर पत्र लिखा था। उन्होंने बताया था कि प्रस्ताव की जाँच हो चुकी है और प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) के तहत संस्थान की स्थापना के लिए वित्त मंत्रालय की मंज़ूरी मांगी गई है। केरल सरकार के लिए यह पत्र इस संकेत की तरह था कि प्रस्ताव शुरुआती चरण से आगे बढ़कर बजटीय स्वीकृति के चरण में पहुँच चुका है।
राज्य बनाम केंद्र
इसी पत्राचार के बाद लगातार केंद्रीय बजट पेश हुए। शुरुआत में एम्स-केरल का न होना देरी माना गया, लेकिन जब ताज़ा बजट में भी इसका कोई ज़िक्र नहीं आया, तो यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन गया। आलोचना बढ़ते ही भाजपा ने तेज़ी से ज़िम्मेदारी केरल की पिनराई विजयन सरकार पर डाल दी। पार्टी का तर्क था कि केरल अनिवार्य मानकों को पूरा करने में विफल रहा है और अपनी प्रशासनिक कमियों को छिपाने के लिए केंद्र पर आरोप लगा रहा है। भाजपा के अनुसार, राज्यों से तीन-चार संभावित स्थान सुझाने की अपेक्षा होती है, जबकि केरल ने केवल किणालूर का प्रस्ताव दिया। पार्टी ने यह भी दावा किया कि एम्स के लिए लगभग 200 एकड़ भूमि चाहिए, जबकि केरल ने सिर्फ़ 151.58 एकड़ ज़मीन उपलब्ध कराई। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि प्रस्तावित स्थल पर चार-लेन हाईवे की कनेक्टिविटी नहीं है और स्थानीय विरोध भी मौजूद है। भाजपा नेता इन्हीं दलीलों के आधार पर लगातार बजटों में एम्स की अनुपस्थिति को सही ठहराते रहे हैं।
केरल सरकार का प्रतिवाद
राज्य सरकार ने इन दावों का कड़ा विरोध किया है। उसका कहना है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य स्वास्थ्य विभाग के बीच हुए संवाद से स्पष्ट था कि केवल एक ही स्थान मांगा गया था, कई नहीं। केरल का यह भी तर्क है कि ज़मीन की शर्तें और स्थल संबंधी मानक देश भर में समान रूप से लागू नहीं किए गए हैं। कई राज्यों में, जहाँ एम्स को मंज़ूरी दी गई, वहाँ स्वीकृति के समय 200 एकड़ की शर्त पूरी नहीं थी। इसके बावजूद परियोजनाएँ मंज़ूर हुईं और बाद में चरणबद्ध विस्तार या संशोधित योजना के ज़रिये समायोजन किया गया। केरल के अनुसार, भूमि और साइट की संख्या पर ज़ोर चयनात्मक लगता है।
स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज ने कहा कि केरल ने केंद्र के बदलते दिशा-निर्देशों के अनुरूप अपने प्रस्तावों में संशोधन किया, न कि किसी अनिर्णय के कारण।
विधानसभा में प्रस्ताव
जॉर्ज के मुताबिक, प्रक्रियागत अनुपालन को केंद्र स्तर पर स्वीकार किया गया था, तभी मामला वित्त मंत्रालय तक भेजा गया। “इसके बाद दो और केंद्रीय बजट आ चुके हैं, लेकिन एम्स अब तक नहीं,” उन्होंने द फेडरल से कहा। “जेपी नड्डा के साथ हमारी कई बार बातचीत हुई। अक्टूबर 2024 में उन्होंने पत्र लिखकर बताया कि प्रस्ताव को मंज़ूरी मिल चुकी है और उसे वित्त मंत्रालय भेज दिया गया है। उस संवाद से साफ़ था कि केवल एक स्थान की आवश्यकता थी, जो हमने दे दिया था।
यह टिप्पणी नई अपील के रूप में नहीं, बल्कि जवाबदेही के सवाल के तौर पर रखी गई। अगर प्रस्ताव की जाँच हो चुकी थी और वह वित्तीय चरण में पहुँच गया था, तो बजट में उसका प्रतिबिंब क्यों नहीं दिखा?
मंगलवार (3 फ़रवरी) को विधानसभा में नियम 118 के तहत एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें केंद्र द्वारा केरल की लगातार उपेक्षा पर चिंता और कड़ा विरोध दर्ज किया गया। प्रस्ताव पेश करते हुए मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि केरल की एम्स की माँग लगभग दो दशकों से लंबित है। राज्य सरकार ने ज़मीन चिन्हित कर ली है और अधिग्रहण से जुड़ी अधिकांश औपचारिकताएँ पूरी कर ली हैं, फिर भी केंद्र सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। प्रस्ताव में केंद्र से राज्य के लिए एम्स को स्वीकृति देने का ज़ोरदार आग्रह किया गया।
स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव
राजनीतिक बयानबाज़ी से परे, इसके पीछे एक गहरी स्वास्थ्य चिंता भी है। केरल की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था प्राथमिक स्तर पर मज़बूत है, लेकिन तृतीयक स्तर पर उस पर भारी दबाव है।सरकारी मेडिकल कॉलेज और विशेष अस्पताल अपनी क्षमता से कहीं अधिक मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं। जटिल उपचारों के लिए लंबा इंतज़ार या निजी क्षेत्र में रेफ़रल आम बात है, जिससे परिवारों पर आर्थिक और मानसिक बोझ पड़ता है। एम्स को उन्नत उपचार, चिकित्सा शिक्षा और शोध को मज़बूत करने के लिए बेहद अहम माना जाता है।
लगातार बजटों में एम्स की अनुपस्थिति के वास्तविक नतीजे सामने आ रहे हैं। इससे मरीज़ों और स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए अनिश्चितता बनी हुई है और केंद्र की ओर से मिले आश्वासनों पर भरोसा कमज़ोर पड़ा है।
राजनीतिक प्रतीक बनता एम्स
सुरेश गोपी का नाटकीय हस्तक्षेप स्पष्टता देने के बजाय भाजपा के भीतर के अंतर्विरोधों को उजागर करता है। सार्वजनिक मंचों से वे तात्कालिकता दिखाते रहे, जबकि राज्य के पार्टी नेता उनके बयानों से दूरी बनाते दिखे और कहते रहे कि ये व्यक्तिगत राय है, अंतिम फ़ैसला केंद्र सरकार तय मानकों के आधार पर करेगी। इससे यह धारणा और मज़बूत हुई कि एम्स अब प्रशासनिक प्राथमिकता से ज़्यादा राजनीतिक प्रतीक बन चुका है।
जन प्रतिक्रिया में भी थकान झलकती है। बिना फंडिंग के बार-बार होने वाली घोषणाओं के लिए धैर्य सीमित होता जा रहा है। 2024 में नड्डा का पत्र वह पल था जब आशावाद वाजिब लगा, लेकिन उसके बाद के बजटों की चुप्पी ने उस उम्मीद को संदेह में बदल दिया।
बजट की विश्वसनीयता की परीक्षा
केरल में एम्स अब सिर्फ़ एक अस्पताल की माँग नहीं रह गया है। यह बजट की विश्वसनीयता और संघीय भरोसे की कसौटी बन चुका है। हर वह बजट जो बिना घोषणा के निकल जाता है, विवाद को और तेज़ करता है और मंशा पर सवाल खड़े करता है। जब तक एम्स को भाषणों या सफ़ाइयों में नहीं, बल्कि केंद्रीय बजट में ठोस जगह नहीं मिलती, यह बहस खत्म नहीं होगी। केरल के लिए यह मुद्दा अब इंतज़ार का नहीं, बल्कि इस बात की परीक्षा है कि स्वीकृत प्रस्तावों के पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति वास्तव में मौजूद है या नहीं।

