INDIA ब्लॉक में अंदरूनी तनाव? अखिलेश यादव के बयान से नई बहस
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INDIA ब्लॉक में अंदरूनी तनाव? अखिलेश यादव के बयान से नई बहस

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के ट्वीट से इंडिया गठबंन की अंदरुनी कलह सामने आ गई है। कांग्रेस द्वारा टीवीके को समर्थन उन्हें रास नहीं आ रही।


समाजवादी पार्टी (एसपी) प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि “हम वे लोग नहीं हैं जो मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ छोड़ देते हैं।” यह टिप्पणी उस समय आई जब कांग्रेस ने तमिलनाडु में डीएमके की हार के बाद अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) का समर्थन करने का फैसला किया। अखिलेश यादव की इस पोस्ट के साथ ममता बनर्जी और एम. के. स्टालिन की तस्वीरें भी साझा की गईं, जिसके बाद यह बहस तेज हो गई कि क्या INDIA गठबंधन के भीतर दरारें गहरी होती जा रही हैं।

इस मुद्दे पर द फेडरल ने “कैपिटल बीट” कार्यक्रम में शाहिरा नईम, शरत प्रधान और टी. के. राजलक्ष्मी से बातचीत की। चर्चा का केंद्र अखिलेश यादव की टिप्पणी, कांग्रेस का तमिलनाडु में लिया गया फैसला और अगले वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी एकता पर उसके प्रभाव को लेकर था।

अखिलेश यादव का संदेश

शाहिरा नईम का मानना था कि अखिलेश यादव का संदेश पूरी तरह सोचा-समझा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। उनके अनुसार, अखिलेश यादव ने कोलकाता में ममता बनर्जी के साथ अपनी मुलाकात को जानबूझकर सार्वजनिक बनाया। उन्होंने कैमरा टीम साथ रखी ताकि उसकी तस्वीरें और दृश्य टीवी चैनलों तक पहुंचें।

नईम के अनुसार, संदेश स्पष्ट था कि जब क्षेत्रीय सहयोगी राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे थे, तब कांग्रेस उनके साथ मजबूती से खड़ी होने के बजाय दूरी बनाती दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव ने केवल ममता बनर्जी से मुलाकात ही नहीं की, बल्कि अपने सोशल मीडिया पोस्ट में एम. के. स्टालिन की तस्वीर भी शामिल की ताकि दबाव झेल रहे सहयोगियों के प्रति एकजुटता दिखाई जा सके।

नईम ने विपक्षी राजनीति में कांग्रेस के “दोहरे रवैये” की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पार्टियां विधानसभा चुनावों में एक-दूसरे पर हमला करें और फिर लोकसभा चुनावों में सहज एकता की उम्मीद करें, यह संभव नहीं है। उनके अनुसार, गठबंधन को टिकाऊ बनाए रखने के लिए वैचारिक स्पष्टता और निरंतरता बेहद जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि अखिलेश यादव की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं, जहां विपक्षी एकता की फिर परीक्षा होगी।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की निर्भरता

शाहिरा नईम ने यह भी कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पुनरुत्थान काफी हद तक समाजवादी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर निर्भर था। उन्होंने अपने चुनावी ग्राउंड रिपोर्टिंग अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि जहां-जहां कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया, वहां एसपी का संगठनात्मक नेटवर्क सक्रिय रूप से काम कर रहा था।

उनके अनुसार, कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में अपने दम पर मजबूत चुनावी चुनौती पेश करने लायक जमीनी ताकत नहीं है। हालांकि, उन्होंने एसपी और कांग्रेस के बीच तत्काल टूट की संभावना से इनकार किया। उन्होंने कहा कि अभी “तलाक” की बात करना जल्दबाजी होगी। यदि कांग्रेस गठबंधन राजनीति के प्रति गंभीर नहीं हुई और लगातार असंगत व्यवहार करती रही, तो भविष्य में अखिलेश यादव के पास अकेले चुनाव लड़ने के अलावा विकल्प कम बचेंगे। नईम ने कहा कि ऐसी स्थिति का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को होगा क्योंकि इससे धर्मनिरपेक्ष वोटों का बंटवारा होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि जब अखिलेश यादव PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और संविधान से जुड़े मुद्दों के आधार पर राजनीति खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं, तब वैचारिक एकरूपता और भी जरूरी हो जाती है।

“रणनीतिक ट्वीट”

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान ने अखिलेश यादव की टिप्पणी को अधिक सतर्क नजरिए से देखा। उन्होंने इस ट्वीट को “सोच-समझकर दिया गया राजनीतिक संकेत” बताया, जिसका उद्देश्य मुख्य रूप से डीएमके को संतुष्ट रखना था, न कि कांग्रेस से अलग होने का वास्तविक संकेत देना।प्रधान ने कहा कि अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से दूरी बनाने के राजनीतिक जोखिमों को अच्छी तरह समझते हैं। उन्होंने बताया कि 2024 में एसपी के मजबूत प्रदर्शन में दलित वोटों की बड़ी भूमिका रही, जो उनके अनुसार राहुल गांधी के संविधान और आरक्षण बचाने के अभियान से प्रभावित हुए थे।

प्रधान का मानना था कि राहुल गांधी का संविधान पर कथित खतरे वाला संदेश दलित समुदायों में गहराई से असरदार साबित हुआ और इसने भाजपा विरोधी मतों को एकजुट करने में मदद की।

उनके अनुसार, अखिलेश यादव जानते हैं कि कांग्रेस और राहुल गांधी के बिना उस सामाजिक गठबंधन को दोहराना मुश्किल होगा। इसलिए उन्होंने इस संभावना को खारिज किया कि अखिलेश यादव फिलहाल तीसरे मोर्चे की ओर बढ़ेंगे या INDIA गठबंधन छोड़ देंगे।

विपक्ष पर बढ़ता दबाव

शरत प्रधान ने यह भी कहा कि भाजपा लगातार चुनावी मोड में रहती है और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को आक्रामक तरीके से चुनौती देती रहेगी। उनके अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में अखिलेश यादव राजनीतिक प्रयोग करने का जोखिम नहीं उठा सकते।उन्होंने मतदाता सूची संशोधन विवादों और संस्थागत दबावों का भी उल्लेख किया और कहा कि अगले चुनावों से पहले ही विपक्षी दलों के सामने बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।

जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या उत्तर प्रदेश में एसपी और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ सकते हैं, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसा कदम अखिलेश यादव के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक होगा। उन्होंने ट्वीट को केवल “राजनीतिक मुद्रा” बताया, न कि किसी आसन्न टूट का संकेत।

कांग्रेस के फैसले पर सवाल

टी. के. राजलक्ष्मी ने कांग्रेस द्वारा तमिलनाडु में TVK का समर्थन करने के फैसले और उसके गठबंधन राजनीति पर असर पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि INDIA गठबंधन के “अंत” की घोषणा करना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन तमिलनाडु की घटनाओं ने विपक्षी समीकरणों को जटिल जरूर बना दिया है।

राजलक्ष्मी ने कहा कि कांग्रेस को TVK को समर्थन देने से पहले INDIA गठबंधन के सहयोगियों से चर्चा करनी चाहिए थी। उन्होंने याद दिलाया कि 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और अन्य सहयोगियों ने डीएमके के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस के तहत चुनाव लड़ा था और उससे उन्हें बड़ा फायदा हुआ था।

उनके अनुसार, तमिलनाडु में कांग्रेस की कई सीटों पर जीत डीएमके के समर्थन के बिना संभव नहीं थी। उन्होंने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि एकतरफा फैसले से अन्य विपक्षी दल असहज हुए और विरोधियों को गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठाने का मौका मिला।

गठबंधन की आंतरिक चुनौतियां

चर्चा के दौरान INDIA गठबंधन के भीतर मौजूद विरोधाभासों पर भी बात हुई। राजलक्ष्मी ने कहा कि कई बैठकों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के बावजूद गठबंधन के पास अब तक कोई ठोस संस्थागत ढांचा, साझा कार्यक्रम या समन्वित निर्णय प्रणाली नहीं है।

शाहिरा नईम ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कांग्रेस नेतृत्व में अब भी “अधिकार भावना” दिखाई देती है, जो गठबंधन प्रबंधन को कमजोर करती है। उनके अनुसार, यदि विपक्ष भाजपा को प्रभावी चुनौती देना चाहता है, तो उसे नियमित समन्वय, साझा राजनीतिक संदेश और वैचारिक स्पष्टता की आवश्यकता होगी।

पैनलिस्टों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि विपक्ष के भीतर सार्वजनिक मतभेद और विरोधाभास अंततः भाजपा को राजनीतिक रूप से मजबूत करते हैं। हालांकि, राजलक्ष्मी और शरत प्रधान दोनों ने माना कि विपक्षी दल भी विभाजन के खतरों को समझते हैं, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में।

भविष्य को लेकर सवाल

क्या INDIA गठबंधन मजबूत आंतरिक समन्वय और आपसी भरोसे के बिना टिक पाएगा।हालांकि किसी भी पैनलिस्ट ने गठबंधन के तत्काल टूटने की भविष्यवाणी नहीं की, लेकिन तीनों ने माना कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की हालिया घटनाओं ने गठबंधन के भीतर गंभीर मतभेदों को उजागर कर दिया है। फिलहाल, अखिलेश यादव का ट्वीट कई तरह से देखा जा रहा है — एक चेतावनी, एक राजनीतिक संदेश और एक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में। यह ऐसे नाजुक विपक्षी गठबंधन की तस्वीर पेश करता है, जो अगले बड़े चुनावी मुकाबले से पहले अपनी पहचान और दिशा तय करने की कोशिश कर रहा है।

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