
'कठपुतली' वाले बयान से मचा बवाल, एएमएमए में गहराया नेतृत्व संकट
एएमएमए अध्यक्ष श्वेता मेनन के इस्तीफे और कार्यकारी समिति के भंग होने से संगठन की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और सुधारों पर सवाल खड़े हो गए हैं।
मलयालम फिल्म कलाकारों के संगठन एएमएमए (Association of Malayalam Movie Artists-AMMA) में एक बार फिर आंतरिक संकट गहरा गया है। संगठन की अध्यक्ष श्वेता मेनन के इस्तीफे और कार्यकारी समिति के भंग होने के बाद एएमएमए की संरचना, जवाबदेही और सुधार की क्षमता को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
श्वेता मेनन ने 2025 में एएमएमए की पहली महिला अध्यक्ष बनकर इतिहास रचा था, लेकिन एक साल से भी कम समय में उनका पद छोड़ना संगठन के भीतर चल रहे विवादों को उजागर करता है। इस्तीफा देते समय उनका यह बयान कि "इस संगठन को चलाने के लिए कठपुतली बनना पड़ता है और मैंने कठपुतली बनने से इनकार कर दिया" बहस का केंद्र बन गया है।आलोचकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक ताजा विवाद नहीं, बल्कि संगठन में वर्षों से चले आ रहे गहरे संकट का संकेत है।
पुराने आरोप और चेतावनियां
मौजूदा विवाद से बहुत पहले दिग्गज अभिनेता थिलकन ने एएमएमए पर उन्हें हाशिए पर धकेलने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि उन्हें काम के अवसरों से वंचित किया गया, प्रभावशाली समूहों से दूर रखा गया और अनौपचारिक रूप से उद्योग से अलग-थलग कर दिया गया।उस समय इन आरोपों को व्यक्तिगत विवाद मानकर खारिज कर दिया गया था। हालांकि, वर्षों बाद कई लोग इन्हें ऐसे सिस्टम के शुरुआती संकेत के रूप में देखते हैं, जहां असहमति को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता था।
दिलीप विवाद ने हिला दी थी इंडस्ट्री
एएमएमए से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद वर्ष 2017 में सामने आया, जब एक अभिनेत्री के साथ हुए कथित हमले के मामले ने मलयालम फिल्म उद्योग को झकझोर दिया। इस मामले में अभिनेता दिलीप की गिरफ्तारी के बाद एएमएमए ने उन्हें संगठन से निष्कासित कर दिया था।लेकिन 2018 में अभिनेता मोहनलाल के नेतृत्व में एएमएमए ने लंबित मुकदमे के बावजूद दिलीप की सदस्यता बहाल कर दी। इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई।
महिला संगठन ‘वूमेन इन सिनेमा कलेक्टिव’ (WCC) से जुड़ी कई महिला कलाकारों ने इसका विरोध किया और एएमएमए से दूरी बना ली। उनका सवाल था कि क्या संगठन वास्तव में सभी कलाकारों के हितों का समान रूप से प्रतिनिधित्व करता है।
सत्ता, प्रभाव और चुप्पी का आरोप
फिल्म उद्योग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाली कई महिला कलाकारों ने आरोप लगाया कि उन्हें "समस्या पैदा करने वाली" के रूप में देखा जाता है। उनका कहना था कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ बोलने पर करियर प्रभावित हो सकता है।सुधारवादी विचारों और डब्ल्यूसीसी से जुड़े कई सदस्यों ने खुद को हाशिए पर धकेले जाने की शिकायत की। उद्योग में अनौपचारिक बहिष्कार और काम के अवसरों में कमी के आरोप बार-बार सामने आते रहे, भले ही इन्हें औपचारिक रूप से साबित करना कठिन रहा हो।
हेमा समिति रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
बाद में न्यायमूर्ति हेमा समिति की रिपोर्ट ने इन चिंताओं को संस्थागत स्तर पर महत्व दिया। रिपोर्ट केवल उत्पीड़न के आरोपों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने मलयालम फिल्म उद्योग की संरचनात्मक समस्याओं की ओर भी इशारा किया।रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे कुछ प्रभावशाली नेटवर्क कलाकारों के करियर, अवसरों और उद्योग तक पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं। इसमें यह भी रेखांकित किया गया कि अनौपचारिक शक्ति संरचनाएं बिना किसी आधिकारिक अधिकार के भी प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं।इस परिप्रेक्ष्य में थिलकन के आरोप, दिलीप विवाद और महिला कलाकारों द्वारा उठाई गई चिंताओं को कई आलोचक अलग-अलग घटनाओं के बजाय एक ही समस्या की कड़ियों के रूप में देखते हैं।
बार-बार विवादों में घिरता एएमएमए
पिछले कुछ वर्षों में एएमएमए लगातार विवादों में रहा है। संगठन के अंदरूनी मतभेद कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं और सदस्यों के बीच आरोप-प्रत्यारोप पुलिस शिकायतों और कानूनी लड़ाइयों तक पहुंच गए हैं।आलोचकों का कहना है कि कलाकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन में पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली और जवाबदेही तंत्र की कमी एक बड़ी समस्या है।
उनके अनुसार, एएमएमए के कई फैसले संस्थागत प्रक्रिया के बजाय व्यक्तियों के प्रभाव से संचालित होते दिखाई देते हैं, जिसके कारण इसे अक्सर प्रभावशाली लोगों के विशेष क्लब के रूप में देखा जाता है।
बदलाव की उम्मीद और फिर निराशा
श्वेता मेनन का अध्यक्ष चुना जाना बदलाव की उम्मीद के रूप में देखा गया था। हेमा समिति की रिपोर्ट के बाद माना जा रहा था कि उनके नेतृत्व में संगठन नई दिशा में आगे बढ़ेगा।लेकिन कुछ ही महीनों में आंतरिक मतभेद फिर सामने आ गए। असहमति, सहमति की कमी और सुधारों के प्रति प्रतिरोध जैसे मुद्दे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए।श्वेता मेनन का यह कहना कि उन्होंने संगठन चलाने के लिए "कठपुतली" बनने से इनकार कर दिया, अब इस व्यापक बहस का प्रतीक बन गया है।
अब एएमएमए के सामने क्या चुनौती?
हालांकि एक अंतरिम समिति के गठन से संगठन को अस्थायी स्थिरता मिल सकती है, लेकिन इससे उन बड़े सवालों के जवाब नहीं मिलते जो लंबे समय से एएमएमए के सामने खड़े हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज एएमएमए वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व करता है? क्या यह ऐसा पेशेवर संगठन है जो सभी कलाकारों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करता है, या फिर यह अब भी पदानुक्रम, निष्ठा और अनौपचारिक शक्ति नेटवर्कों से प्रभावित है?
एएमएमए ने खुद को कभी ट्रेड यूनियन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उसने हमेशा एक सामाजिक और कल्याणकारी संगठन की छवि बनाए रखी है। हालांकि आलोचक लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि क्या यह वास्तव में फिल्म उद्योग के प्रभावशाली वर्ग का एक विशिष्ट समूह बनकर रह गया है।
थिलकन के आरोपों से लेकर दिलीप विवाद तक, महिला सदस्यों के संगठन छोड़ने से लेकर हेमा समिति की रिपोर्ट तक, वर्षों से उठ रही चिंताओं में एक समानता दिखाई देती है।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एएमएमए इन मुद्दों का स्थायी समाधान तलाशेगा या फिर एक बार फिर वही पुराना चक्र दोहराया जाएगा।

