आदिवासी संस्कृति बचाने या धार्मिक आजादी पर चोट? अरुणाचल में APFRA पर विवाद
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आदिवासी संस्कृति बचाने या धार्मिक आजादी पर चोट? अरुणाचल में APFRA पर विवाद

अरुणाचल प्रदेश में APFRA लागू करने की तैयारी से धार्मिक स्वतंत्रता और आदिवासी पहचान को लेकर विवाद गहरा गया है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका है।


अरुणाचल प्रदेश में करीब पांच दशक पुराना एक कानून अचानक फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। यह बहस अब सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि इससे धार्मिक पहचान, आदिवासी परंपराओं और सामाजिक संतुलन को लेकर गहरी चिंताएं पैदा हो गई हैं। वर्षों से साथ रहने वाले समुदायों के बीच अब अविश्वास और बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है।

दरअसल, मामला अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट (APFRA) का है। यह कानून 1978 में बनाया गया था, लेकिन इसके नियम तय नहीं होने की वजह से इसे कभी लागू नहीं किया गया। अब गौहाटी हाई कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार इस कानून को लागू करने के लिए नियम बनाने की प्रक्रिया में जुट गई है। यहीं से पूरे विवाद ने फिर जोर पकड़ लिया है।

यह कानून बलपूर्वक, लालच देकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराने पर रोक लगाता है। इसमें दोषी पाए जाने पर दो साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर धार्मिक स्वतंत्रता और आदिवासी संस्कृति की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।जब यह कानून बना था, तब अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी बहुत कम थी। 1978 में राज्य में ईसाइयों की संख्या पांच प्रतिशत से भी कम मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ राज्य का धार्मिक स्वरूप तेजी से बदला। 2011 की जनगणना के मुताबिक ईसाई आबादी 30 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई थी, जबकि स्थानीय अनुमानों के अनुसार अब कुछ इलाकों में यह 40 प्रतिशत से भी अधिक हो चुकी है।

यही बदलाव इस कानून को राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना देता है। लंबे समय तक कांग्रेस सरकारों और बाद में बीजेपी-पीपीए गठबंधन ने भी इस कानून को लागू करने से दूरी बनाए रखी, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और ईसाई समुदाय नाराज हो सकता है, जो आज राज्य की राजनीति और समाज में बड़ा प्रभाव रखता है।लेकिन मामला तब फिर सामने आया जब गौहाटी हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। सितंबर 2024 में कोर्ट ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर कानून के नियम तैयार करने का निर्देश दिया।

इसी दौरान खबरें आईं कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इंडिजिनस फेथ एंड कल्चरल सोसाइटी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (IFCSAP) के प्रतिनिधियों को भरोसा दिलाया कि केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने के पक्ष में है। इसके बाद मुख्यमंत्री पेमा खांडू की सरकार खुद को बेहद मुश्किल राजनीतिक और सामाजिक संतुलन के बीच पाती नजर आई।मुख्यमंत्री पेमा खांडू लगातार यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। उनका कहना है कि इसका उद्देश्य सिर्फ आदिवासी समुदायों की परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना है। सरकार ने इस मुद्दे पर समितियां बनाई हैं और अलग-अलग समुदायों से बातचीत भी शुरू की है, लेकिन इसके बावजूद चिंता कम नहीं हुई है।

विशेष रूप से ईसाई समुदाय के भीतर इस कानून को लेकर डर और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। कई लोगों को आशंका है कि भविष्य में इस कानून का इस्तेमाल चुनिंदा समुदायों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) इस कानून के खिलाफ सबसे मुखर संगठन बनकर सामने आया है। संगठन के अध्यक्ष तारह मिरी ने साफ कहा है कि यह कानून पूरी तरह भेदभावपूर्ण है और इसे खत्म कर देना चाहिए। उनका कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में दखल देता है और ईसाई समुदाय को निशाना बनाता है।

ACF ने राज्यभर में प्रदर्शन किए हैं और हाई पावर कमेटी की बैठकों का बहिष्कार भी किया है। संगठन का कहना है कि सरकार उनकी मूल चिंताओं को सुने बिना आगे बढ़ रही है।वहीं दूसरी ओर, आदिवासी आस्था से जुड़े संगठन इस कानून को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने का जरूरी हथियार मानते हैं। डोनी-पोलो और अन्य पारंपरिक जनजातीय आस्थाओं से जुड़े समूहों का कहना है कि यह कानून ईसाई विरोधी नहीं, बल्कि जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ है।

IFCSAP के अध्यक्ष एमी रूमी का कहना है कि आदिवासी परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। उनके मुताबिक अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट सकती हैं।रूमी ने यह भी कहा कि अगर किसी को लगता है कि यह कानून असंवैधानिक है, तो उसे अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए, सिर्फ विरोध प्रदर्शन करने से समस्या हल नहीं होगी।

दरअसल, यह विवाद सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का सवाल बन चुका है। अरुणाचल प्रदेश में कई आदिवासी समुदाय अपनी परंपराओं, लोक मान्यताओं और प्रकृति आधारित आस्थाओं को बचाने की लड़ाई मान रहे हैं।

राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा बेहद जटिल हो गया है। बीजेपी के पास विधानसभा में भारी बहुमत है, लेकिन पार्टी का समर्थन आधार कई अलग-अलग समुदायों में फैला हुआ है, जिनमें आदिवासी आस्था मानने वाले, बौद्ध और बड़ी संख्या में ईसाई जनजातियां भी शामिल हैं। राज्य के कई ईसाई विधायक, जिनमें बीजेपी के नेता भी शामिल हैं, इस कानून को लेकर असहजता जता चुके हैं।

इसके बावजूद बीजेपी नेतृत्व फिलहाल कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह रुख देशभर में बीजेपी की उस व्यापक सोच से जुड़ा है, जिसमें पारंपरिक और स्थानीय पहचान की रक्षा पर जोर दिया जाता है और कथित जबरन धर्मांतरण के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाता है।हालांकि पार्टी यह भी समझती है कि अगर ईसाई समुदाय पूरी तरह नाराज हो गया तो भविष्य में इसका चुनावी असर पड़ सकता है। 2018 में इस कानून को खत्म करने पर चर्चा भी हुई थी, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका।

पिछले कुछ वर्षों में अरुणाचल प्रदेश में डोनी-पोलो जैसी पारंपरिक आस्थाओं को फिर से मजबूत करने की कोशिशें तेज हुई हैं। कई जिलों में प्रार्थना केंद्र, सांस्कृतिक अभियान और सामुदायिक आयोजन बढ़े हैं। आदिवासी समूह इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण मानते हैं, जबकि आलोचकों को डर है कि अगर इसे राजनीति से जोड़ा गया तो सामाजिक विभाजन और गहरा सकता है।

फिलहाल विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे हैं, लेकिन आम लोगों में चिंता साफ दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि अरुणाचल हमेशा से अलग-अलग समुदायों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का उदाहरण रहा है और अब वही संतुलन कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।राज्य सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ एक पुराने कानून को लागू करना नहीं, बल्कि समाज के भीतर भरोसा और संतुलन बनाए रखना है। नियम तैयार हो चुके हैं, लेकिन अभी उन्हें आधिकारिक तौर पर लागू नहीं किया गया है। लेकिन इतना तय है कि इस बहस ने अरुणाचल प्रदेश में पहचान, धर्म, राजनीति और सह-अस्तित्व को लेकर एक नई और कठिन चर्चा शुरू कर दी है, जिसका असर आने वाले वर्षों तक महसूस किया जा सकता है।

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