ओवैसी की रणनीति सपा पर पड़ सकती है भारी,आंकड़े दे रहे संकेत
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ओवैसी की रणनीति सपा पर पड़ सकती है भारी,आंकड़े दे रहे संकेत

पश्चिम बंगाल में असदुद्दीन ओवैसी को कामयाबी नहीं मिली। लेकिन अब उनकी नजर यूपी पर है। BSP या आजाद समाज पार्टी से गठबंधन सपा की मुश्किलें बढ़ा सकता है।


एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि बंगाल में उन्हें दूसरी बार भी निराशा हाथ लगी और यूपी में भी अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है, लेकिन बिहार और महाराष्ट्र में मिली सीमित कामयाबी ने उनके राष्ट्रीय विस्तार के इरादों को कमजोर नहीं होने दिया।

सवाल यह है कि अगर ओवैसी एक बार फिर उत्तर प्रदेश में आक्रामक तरीके से चुनावी मैदान में उतरते हैं और किसी मजबूत दलित राजनीतिक दल के साथ गठबंधन कर लेते हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे होगा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की मुस्लिम वोट राजनीति पर पड़ सकता है।

बंगाल में हुमायूं कबीर के साथ शुरू हुई थी रणनीति

इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव में ओवैसी ने पूर्व टीएमसी नेता हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन करके चुनावी शुरुआत की थी। लेकिन एक स्टिंग ऑपरेशन सामने आने के बाद एआईएमआईएम ने उनसे दूरी बना ली। इसके बावजूद हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा और दो सीटों पर जीत हासिल कर ली। दूसरी ओर ओवैसी की पार्टी अकेले मैदान में उतरी और उसके सभी 11 उम्मीदवार हार गए। पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 0.09 प्रतिशत वोट मिले।राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर ओवैसी ने हुमायूं कबीर का साथ नहीं छोड़ा होता, तो शायद बंगाल में उनकी स्थिति इतनी कमजोर नहीं होती।

यूपी में बीएसपी या भीम आर्मी बन सकती है गेमचेंजर?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल के घटनाक्रमों ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है।बीएसपी के पूर्व मुस्लिम चेहरा नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में जाने को कई राजनीतिक विश्लेषकों ने “ओवैसी फैक्टर” से जोड़कर देखा। माना गया कि सपा मुस्लिम वोट बैंक में किसी भी संभावित सेंध को लेकर सतर्क है।इसी बीच पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद ओवैसी ने मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को लेकर जो बयान दिया, उसने अटकलों को और हवा दे दी।उन्होंने कहा “मुसलमानों को अपनी खुद की राजनीतिक लीडरशिप तैयार करनी चाहिए। तथाकथित सेक्युलर पार्टियां बीजेपी को रोकने में नाकाम रही हैं।”

इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि अगर ओवैसी उत्तर प्रदेश में मायावती की बीएसपी या चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ गठबंधन करते हैं, तो मुस्लिम-दलित समीकरण नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर सकता है।

यूपी में ओवैसी का पिछला प्रदर्शन कैसा रहा?

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन लगभग सभी सीटों पर जमानत जब्त हो गई।इसके बाद 2022 में पार्टी ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन तब भी कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली।हालांकि, इसके बावजूद ओवैसी लगातार मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को उठाकर अपनी जमीन तैयार करने में लगे हुए हैं।

बंगाल चुनाव के नतीजे क्यों बढ़ा सकते हैं अखिलेश की चिंता?

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बंगाल चुनाव के नतीजों ने यह दिखाया है कि मुस्लिम वोट अगर बंटता है, तो उसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है।मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिला। जहां पहले टीएमसी का दबदबा था, वहां बीजेपी ने कई सीटों पर बढ़त बनाई। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह रहा कि बंगाल की 142 मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों में बीजेपी ने 72 सीटें जीत लीं, जबकि टीएमसी को 64 सीटें मिलीं।

मुर्शिदाबाद जैसी सीट, जहां मुस्लिम आबादी दो-तिहाई से अधिक मानी जाती है, वहां भी बीजेपी ने 31 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की।इन नतीजों ने विपक्षी दलों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगर मुस्लिम वोटों में बिखराव हुआ तो राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकते हैं।

यूपी में मुस्लिम वोट किस दिशा में जाएगा?

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत है। राज्य की 403 विधानसभा सीटों में लगभग 85 सीटों पर मुस्लिम आबादी 25 से 50 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। करीब 60 सीटों पर यह संख्या 20 से 25 प्रतिशत तक है। 57 सीटों को मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें माना जाता है। 2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें से 34 जीतकर विधानसभा पहुंचे।

सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार 2017 में लगभग 55 प्रतिशत मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी को मिले थे, जबकि कांग्रेस को 33 प्रतिशत और बीएसपी को 14 प्रतिशत वोट मिले थे।ऐसे में अगर भविष्य में ओवैसी की पार्टी बीएसपी या आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर लेती है, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोटों का नया बंटवारा देखने को मिल सकता है।

क्या ओवैसी यूपी में बदल पाएंगे सियासी समीकरण?

फिलहाल ओवैसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे खुद को केवल वोटकटवा नेता की छवि से बाहर निकालें और कोई मजबूत सामाजिक गठबंधन तैयार करें।बंगाल में मिली असफलता ने यह जरूर दिखाया है कि अकेले मुस्लिम राजनीति के सहारे बड़ी सफलता हासिल करना आसान नहीं है। लेकिन अगर दलित-मुस्लिम गठजोड़ की कोई नई राजनीतिक धुरी बनती है, तो उसका असर सीधे समाजवादी पार्टी की राजनीति पर पड़ सकता है। यूपी की राजनीति में आने वाले समय में ओवैसी का अगला कदम इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है।

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