
असम-बांग्लादेश सीमा आज भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं, आखिर क्या है वजह?
बीजेपी के सीमा सील करने के दावों के बावजूद असम-बांग्लादेश सीमा के कई हिस्से अब भी संवेदनशील हैं और घुसपैठ की घटनाएं जारी हैं।
बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का मुद्दा दशकों से असम की राजनीति का सबसे संवेदनशील विषय रहा है। चुनावी रैलियों से लेकर विधानसभा तक, बीजेपी नेता लगातार यह दावा करते रहे हैं कि भारत-बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह सील कर दिया जाएगा और राज्य में अवैध घुसपैठ पर रोक लगाई जाएगी। पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कई बार कह चुके हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में पूर्वी सीमा पर बाड़बंदी का अधिकांश काम पूरा हो चुका है। उन्होंने शेष अधूरे हिस्सों के लिए ममता बनर्जी सरकार के कथित असहयोग को जिम्मेदार ठहराया।
चुनाव में घुसपैठ का मुद्दा छाया रहा
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी चुनाव प्रचार में घुसपैठ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। उन्होंने दावा किया था कि सुरक्षा एजेंसियां जरूरत के हिसाब से बांग्लादेश सीमा पर पुशबैक ऑपरेशन भी चलाती हैं, जो सीमा पर तैनात बांग्लादेशी जवानों की गतिविधियों को देखकर तय किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। बीजेपी के केंद्र में 10 साल से ज्यादा और असम में करीब एक दशक से सत्ता में रहने के बावजूद असम-बांग्लादेश सीमा के कई संवेदनशील हिस्से अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सके हैं।वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्व बल्लव गोस्वामी का कहना है कि बीजेपी ने असम में अपनी राजनीति का बड़ा हिस्सा सीमा सील करने के वादे पर खड़ा किया था।उनके मुताबिक, “2014 से पहले बीजेपी खुद को ऐसी राजनीतिक ताकत के रूप में पेश करती थी जो बांग्लादेशी घुसपैठ को हमेशा के लिए रोक देगी। पार्टी कहती थी कि असम की एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ी जाएगी और सीमा पूरी तरह बंद कर दी जाएगी।”
गोस्वामी कहते हैं कि सत्ता में आने के बाद केंद्र सरकार ने बाड़बंदी, फ्लडलाइट, निगरानी सिस्टम और तकनीकी मॉनिटरिंग जैसे कदम जरूर उठाए, लेकिन इतने वर्षों बाद भी सीमा पूरी तरह सील नहीं हो पाई है।
कुशियारा नदी वाला हिस्सा सबसे बड़ी चुनौती
सबसे बड़ी समस्या श्रीभूमि जिले (पहले करीमगंज) में कुशियारा नदी के किनारे मौजूद 4.35 किलोमीटर का खुला हिस्सा है, जहां अब तक बाड़ नहीं लग पाई है।अंतरराष्ट्रीय “जीरो लाइन” नदी के बीच से गुजरती है, जिससे वहां बाड़बंदी करना बेहद मुश्किल हो जाता है। सीमा नियमों के मुताबिक, बाड़ आमतौर पर जीरो लाइन से 150 गज दूर बनाई जाती है, हालांकि कुछ जगह स्थानीय परिस्थितियों के कारण इसमें बदलाव भी किया गया।
अधिकारियों का कहना है कि नदी के तेज बहाव और कटाव से बचाने के लिए वहां सुरक्षात्मक दीवार जरूरी है। लेकिन बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) ने दीवार की ऊंचाई और डिजाइन पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे नदी का प्राकृतिक बहाव बाधित होगा और मानसून में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा।भारत ने सुरक्षा कारणों से दीवार की ऊंचाई कम करने से इनकार किया है। दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद मामला अब तक अटका हुआ है।
कुशियारा नदी के कटाव ने आसपास की कई बाड़ों को भी नुकसान पहुंचाया है।इस इलाके में 2009 में एनबीसीसी के तहत बाड़बंदी शुरू हुई थी, लेकिन करीब 17 साल बाद भी यह हिस्सा अधूरा है। सुरक्षा एजेंसियां आज भी इसे बराक घाटी में घुसपैठ का संवेदनशील रास्ता मानती हैं।
असम सीमा के तीन सेक्टर
असम-बांग्लादेश सीमा को तीन हिस्सों में बांटा गया है:
धुबरी-कुरीग्राम सेक्टर — 134 किमी
कछार-सिलहट सेक्टर — 33.6 किमी
श्रीभूमि-सिलहट-मौलवीबाजार सेक्टर — 95.4 किमी
हाईटेक निगरानी, लेकिन घुसपैठ जारी
अधिकारियों का दावा है कि असम में अब बांग्लादेश सीमा की निगरानी सबसे आधुनिक तकनीक से की जा रही है।धुबरी जिले समेत कई नदी वाले इलाकों में पारंपरिक बाड़ की जगह तकनीकी निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल हो रहा है। ब्रह्मपुत्र और चार क्षेत्रों में CIBMS और BOLD-QIT जैसी तकनीकों के जरिए सेंसर, थर्मल कैमरे, फ्लडलाइट और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की व्यवस्था की गई है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, तकनीकी रूप से जहां संभव था, वहां लगभग पूरी बाड़बंदी हो चुकी है।
एक वरिष्ठ बीएसएफ अधिकारी ने बताया कि श्रीभूमि जिले में कुशियारा नदी के 4.35 किलोमीटर हिस्से को छोड़कर बाकी बाड़बंदी लगभग पूरी हो चुकी है। बाकी नदी क्षेत्रों की निगरानी तकनीकी सिस्टम से की जा रही है।
इन सबके बावजूद घुसपैठ की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं।कुछ दिन पहले ही बीएसएफ ने दक्षिण सलमारा जिले में करीब 150 संदिग्ध बांग्लादेशियों की घुसपैठ की कोशिश को नाकाम किया था। इससे पहले इसी जिले से 14 संदिग्ध बांग्लादेशियों को वापस भेजे जाने के बाद इलाके में तनाव भी पैदा हो गया था।सीमा पर मवेशी तस्करी, अवैध आवाजाही और नदी किनारे फायरिंग की घटनाएं भी समय-समय पर सामने आती रहती हैं।
'घुसपैठ सिर्फ चुनावी मुद्दा बन गया'
वरिष्ठ पत्रकार सुदीप सरमा चौधरी का आरोप है कि राजनीतिक दल घुसपैठ को गंभीर सुरक्षा मुद्दे की बजाय सिर्फ चुनावी मुद्दे की तरह इस्तेमाल करते हैं।उनके मुताबिक, “ये सिर्फ चुनावी जुमले हैं। सीमा सील करने को लेकर गंभीरता नहीं है। राजनीतिक फायदे के लिए इस मुद्दे को जिंदा रखा जाता है। सिर्फ कांटेदार तार लगाने से सीमा पूरी तरह बंद नहीं हो जाती।” उन्होंने कहा कि श्रीभूमि जिले में कई बार बाड़ तोड़ी गई और हिंसा की घटनाएं भी हुईं। कुछ इलाकों में पर्याप्त सुरक्षा बल भी मौजूद नहीं थे। चौधरी का दावा है कि त्रिपुरा सीमा की स्थिति तो पश्चिम बंगाल से भी ज्यादा गंभीर है और पिछले साल बड़ी संख्या में अवैध घुसपैठिए वहां से आए।
छात्र संगठनों ने भी उठाए सवाल
असम छात्र संघ (AASU) के अध्यक्ष उत्पल शर्मा ने भी सरकार के दावों पर सवाल उठाए हैं।उन्होंने कहा, “सरकार एक तरफ कहती है कि घुसपैठियों को वापस धकेला जा रहा है, दूसरी तरफ यह भी कहती है कि घुसपैठ जारी है। अगर सीमा पूरी तरह सील है, तो लोग अंदर कैसे आ रहे हैं?” उन्होंने बताया कि धुबरी और श्रीभूमि के नदी वाले इलाके अब भी बेहद संवेदनशील हैं क्योंकि नदी के बीच बाड़ लगाना संभव नहीं है।
AASU ने सरकार को 24 घंटे तैरते बीओपी, फ्लडलाइट और स्थानीय युवाओं को शामिल कर दूसरी सुरक्षा लाइन बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
41 साल बाद भी अधूरी सुरक्षा
असम समझौते के 41 साल बाद और 2016 से “डबल इंजन” सरकार होने के बावजूद धुबरी और श्रीभूमि जैसे संवेदनशील सीमा क्षेत्र अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाए हैं। फिलहाल असम-बांग्लादेश सीमा बाड़बंदी, तकनीकी निगरानी, कूटनीति, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और राजनीति का जटिल घालमेल है पहले से ज्यादा सख्त जरूर, लेकिन अब भी पूरी तरह बंद नहीं।

