CCTV में सबूत फिर भी FIR क्यों नहीं? क्या राम मंदिर चंदा चोरी छुपाई?
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CCTV में सबूत फिर भी FIR क्यों नहीं? क्या राम मंदिर चंदा चोरी छुपाई?

अयोध्या राम मंदिर चंदा चोरी मामले में ट्रस्ट पर उठे गंभीर सवाल। सीसीटीवी में सबूत होने के बाद भी एफआईआर क्यों नहीं हुई? क्या मामले को दबाने की कोशिश थी?


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Ayodhya Ram Mandir: अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब आस्था के अपमान के साथ-साथ एक बड़े प्रशासनिक घोटाले में तब्दील होता जा रहा है। मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में यह कबूल कर हड़कंप मचा दिया है कि सीसीटीवी (CCTV) फुटेज में एक कर्मचारी नोटों की गड्डियां बॉक्स में डालने के बजाय अपने पास छुपाते हुए रंगे हाथों दिखा है।


लेकिन नृपेंद्र मिश्र के इस खुलासे ने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की भूमिका और नीयत पर बेहद गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब देश का हर राम भक्त जानना चाहता है।

बड़े सवाल: जब सबूत सामने था, तो पर्दा क्यों डाला जा रहा था?
नृपेंद्र मिश्र के बयानों और एसआईटी (SIT) की जांच के बीच कुछ ऐसे बुनियादी सवाल उठ रहे हैं जो सीधे तौर पर ट्रस्ट के कर्ता-धर्ताओं को कटघरे में खड़ा करते हैं:

खुद चोर को क्यों नहीं पकड़ा? जब काउंटिंग रूम की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद थी और कर्मचारी की यह करतूत सीसीटीवी कैमरे में साफ-साफ रिकॉर्ड हो चुकी थी, तो ट्रस्ट की आंतरिक सुरक्षा या अधिकारियों ने उस चोर को रंगे हाथों पकड़कर तुरंत बाहर क्यों नहीं किया?

तुरंत FIR दर्ज क्यों नहीं की गई? भगवान के दरबार में इतनी बड़ी बेईमानी होने के बावजूद ट्रस्ट ने तत्काल पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं कराई? कानूनी कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाकर रखने की कोशिश क्यों की गई?

विपक्ष के आरोपों का इंतजार क्यों? सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यह है कि क्या ट्रस्ट इस पूरे मामले पर पर्दा डालना चाहता था? जब विपक्ष ने संसद से लेकर सड़क तक 'चंदा चोरी' के गंभीर आरोप लगाए और चौतरफा दबाव बढ़ा, तब जाकर ही जांच की बात क्यों स्वीकार की गई? क्या विपक्ष के हंगामे के बिना भक्तों को कभी यह सच पता चल पाता?

45 दिन का 'डेटा डिलीट' चक्रव्यूह: क्या सबूत मिटाने की साजिश हुई?
नृपेंद्र मिश्र ने एक और चौंकाने वाली बात बताई कि काउंटिंग रूम के सीसीटीवी कैमरों का रिकॉर्डिंग बैकअप केवल 45 दिनों तक ही सुरक्षित रहता है और उसके बाद डेटा खुद-ब-खुद डिलीट हो जाता है।

इस खुलासे ने संदेह को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या जानबूझकर मामले को 45 दिनों से ज्यादा समय तक दबाए रखा गया ताकि सीसीटीवी का मुख्य डिजिटल सबूत अपने आप नष्ट हो जाए? डेटा डिलीट होने की वजह से अब एसआईटी को यह पता लगाने में भारी कठिनाई आ रही है कि यह खेल कितने महीनों या सालों से चल रहा था।

केरल से लौटते ही डॉ. अनिल मिश्र से मैराथन पूछताछ
एसआईटी की जांच शुक्रवार को लगातार चौथे दिन भी मंदिर परिसर में जारी रही। इस दौरान जांच टीम ने ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारी और चंदा काउंटिंग व्यवस्था के प्रभारी डॉ. अनिल मिश्र समेत करीब 24 लोगों से गहन पूछताछ की।

बयानों का क्रॉस-चेक: सूत्रों के मुताबिक, डॉ. अनिल मिश्र अपनी आंखों का इलाज कराने केरल गए थे और बुधवार को ही लौटे हैं। एसआईटी ने उनसे काउंटिंग रूम के लूपहोल्स और कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर सवाल दागे। साथ ही उनके और ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के बयानों को भी क्रॉस-चेक किया गया।

नृपेंद्र मिश्र की दोटूक: '7 वंशों तक लगेगा श्राप'
71 एकड़ में फैले भव्य राम मंदिर निर्माण की देखरेख करने वाले नृपेंद्र मिश्र ने इस पूरे मामले पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि "चढ़ावे में बेईमानी करने वालों को 7 वंशों तक श्राप लगेगा।"

उन्होंने माना कि चंपत राय की निष्ठा पर वह सवाल नहीं उठाएंगे, लेकिन उनके प्रबंधन और निगरानी (Oversight) में भारी कमी रही है। उन्होंने यह भी कहा कि गाइडलाइन के मुताबिक काउंटिंग में लगे लोगों को बिना जेब (Pocketless) वाले कपड़े पहनने चाहिए थे, लेकिन चर्चा है कि लोग अपनी जेबों में नोटों की गड्डियां भरकर बाहर ले गए। इसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता, क्योंकि समझौते के तहत नोटों की गिनती का सीधा जिम्मा बैंक का ही था।


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