
माछ-भात से फिश पॉलिटिक्स तक, बंगाल में BJP का नया सियासी दांव
बंगाल में BJP ने मछली और माछ-भात संस्कृति को लेकर TMC के आरोपों का जवाब फिश फेस्ट और राजनीतिक संदेशों के जरिए देना शुरू किया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों पूरी तरह माछ-मय हो चुकी है। चुनावी रैलियों में हाथों में मछली लेकर प्रचार करना हो या मंच से मछली दिखाकर बंगाली अस्मिता की बात करना — 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में मछली अब सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक बन चुकी है।
चुनाव जीतने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) बंगाल में अपने मछली प्रेम को खुलकर दिखाने में जुट गई है। यह साफ तौर पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उस आरोप का जवाब है, जिसमें कहा गया था कि अगर BJP सत्ता में आई तो बंगाल की खान-पान संस्कृति, खासकर ‘माछ-भात’ यानी मछली-भात की परंपरा खतरे में पड़ जाएगी।
बंगाल में ‘माछ-भात’ सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि पहचान का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में TMC के इस प्रचार ने चुनाव के दौरान कई बंगालियों को असहज कर दिया था। लेकिन BJP, जो किसी भी कीमत पर चुनावी जीत चाहती थी, उसने कमल के साथ-साथ अब कतला मछली को भी बंगाल में अपना नया सांस्कृतिक प्रतीक बना लिया है।
मछली उत्सव से दिया राजनीतिक संदेश
नई सरकार में मंत्री बने दिलीप घोष ने रविवार (10 मई) को मणिकतला में आयोजित मछली उत्सव में हिस्सा लिया। उनके साथ BJP के नवनिर्वाचित विधायक तपस रॉय भी मौजूद थे। इस आयोजन का मकसद साफ था — ममता बनर्जी के उस नैरेटिव को गलत साबित करना कि BJP की जीत का मतलब बंगाल में मछली खाने की परंपरा का अंत होगा।
अगर चुनाव प्रचार के दौरान TMC लगातार यह कह रही थी कि BJP बंगाल को शाकाहारी राज्य बना देगी, तो अब भगवा पार्टी हर मौके पर सार्वजनिक रूप से मछली खाकर उस दावे को कमजोर करने में लगी है।
झूठ और डर की राजनीति कर रही थी TMC
मछली उत्सव में दिलीप घोष ने ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, दीदी का पूरा चुनाव प्रचार झूठ और भ्रामक बातों पर आधारित था। उन्होंने लोगों को डराने की कोशिश की कि BJP बंगालियों की थाली से मछली हटा देगी। लेकिन जनता ने उनकी बातों पर भरोसा नहीं किया।
उन्होंने आगे कहा, आज पूरा बंगाल देख रहा है कि उसकी संस्कृति का जश्न वास्तव में कौन मना रहा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या BJP सरकार लोगों के खान-पान पर कोई रोक लगाएगी, तो घोष ने जवाब दिया, क्या चुनाव परिणाम आने के बाद आपने कहीं ऐसा देखा? बाजारों में जाइए, हर जगह मछलियां बिक रही हैं।
अब BJP का नया नारा — आत्मनिर्भर मछली
मणिकतला से BJP विधायक बने तपस रॉय ने भी इस मुद्दे को सिर्फ संस्कृति नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि TMC सरकार ने बंगाल के मत्स्य पालन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कोई गंभीर काम नहीं किया।
रॉय का कहना है कि कभी मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर रहा बंगाल आज दूसरे राज्यों पर निर्भर हो गया है। उन्होंने खास तौर पर आंध्र प्रदेश का जिक्र करते हुए कहा कि बंगाल को अब वहां के तालाबों की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।उन्होंने भरोसा दिलाया कि नई BJP सरकार बंगाल को फिर से आत्मनिर्भर मछली उत्पादन की दिशा में ले जाएगी।
जीत के जश्न में भी फिश पॉलिटिक्स
BJP की फिश पावर सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रही। कांथी में करीब 3,000 समर्थकों के लिए सामूहिक भोज आयोजित किया गया, जबकि दासपुर में हजारों लोग मछली भोज में शामिल हुए।इन आयोजनों के जरिए BJP सिर्फ जीत का जश्न नहीं मना रही, बल्कि TMC के उस आरोप का जवाब भी दे रही है जिसमें पार्टी को बंगाल विरोधी बताया गया था।
चुनाव परिणामों के दौरान भी BJP कार्यकर्ता पार्टी दफ्तरों में पारंपरिक बंगाली व्यंजन बनाते नजर आए। मछली करी, मछली के सिर वाली दाल और भात जैसे व्यंजन जीत के जश्न का हिस्सा बने। चुनावों में झालमुड़ी से लेकर माछ-भात तक, खाने-पीने की चीजें राजनीति का अहम हिस्सा बन गईं। BJP अब यह संदेश देने में लगी है कि बंगाल का मेन्यू अब भी पूरी तरह नॉन-वेज ही रहेगा।
बाहर से भगवा, अंदर से रुई-कतला
नई सरकार बनने के बाद BJP जनता को यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी भले ही बाहर से भगवा दिखे, लेकिन अंदर से वह पूरी तरह रुई-कतला यानी बंगाल की मछली संस्कृति से जुड़ी हुई है।अब यह देखना दिलचस्प होगा कि BJP की यह मछली कूटनीति वोटरों को कितने समय तक अपनी ओर बांधे रख पाती है। फिलहाल तो पार्टी बंगाल की राजनीतिक धारा में मछली के साथ तैरती नजर आ रही है।
बंगाली और मछली का रिश्ता सिर्फ खाने तक सीमित नहीं
बंगाल में मछली सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान का हिस्सा है। माछे-भाते बांगाली कहावत इसी रिश्ते को दर्शाती है, जिसका मतलब है — मछली और भात ही बंगाली की असली पहचान हैं।मछली यहां शुभता, समृद्धि और परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। शादी-ब्याह में बिना सजी हुई मछली के तत्त्व यानी उपहार अधूरा माना जाता है। दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहारों में भी देवी-देवताओं को मछली अर्पित की जाती है।सुबह के स्थानीय बाजार से लेकर रात के खाने तक, मछली बंगाली जीवन का ऐसा हिस्सा है जो हर दिन, हर घर और हर भावना में मौजूद है।

