बंगाल में मिड-डे मील बना सियासी मुद्दा, ISKCON मॉडल पर बहस
x

बंगाल में मिड-डे मील बना सियासी मुद्दा, ISKCON मॉडल पर बहस

पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील योजना ISKCON को सौंपने और अंडा हटाने के फैसले पर विवाद गहरा गया है। विपक्ष इसे राजनीति बता रहा है, जबकि सरकार इसे बेहतर पोषण का कदम कह रही है।


पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मिड-डे मील योजना की जिम्मेदारी इस्कॉन (ISKCON) को सौंपने और इसके साथ स्कूलों के भोजन से अंडे हटाए जाने के फैसले ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषक तौसीफ अहमद खान ने इसे "सिर्फ छोटी राजनीति" करार देते हुए कहा कि भाजपा अपने वोट बैंक को साधने के लिए इस्कॉन को एक "बलि का बकरा" बना रही है।

यह विवाद भाजपा सरकार के पहले बजट के कुछ ही सप्ताह बाद सामने आया है। इससे राज्य में पोषण, विचारधारा और चुनावी वादों को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है।

'एआई विद संकेत' में हुई चर्चा

The Federal के कार्यक्रम AI With Sanket में वरिष्ठ पत्रकार तमाल साहा और राजनीतिक विश्लेषक तौसीफ अहमद खान ने इस फैसले पर विस्तार से चर्चा की। दोनों ने सवाल उठाया कि क्या यह वास्तव में बच्चों के बेहतर पोषण के लिए किया गया सुधार है या फिर सरकारी स्कूलों में धीरे-धीरे शाकाहार को बढ़ावा देने की राजनीतिक कोशिश।


चुनाव से पहले और चुनाव के बाद

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बजट के बाद मीडिया से बातचीत में घोषणा की कि कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर मिड-डे मील बनाने और वितरित करने की जिम्मेदारी इस्कॉन को दी जाएगी।मुख्यमंत्री ने कहा, "आपको अच्छा और शुद्ध भोजन मिलेगा। किसी को 'हरे कृष्ण' का जाप करने के लिए नहीं कहा जा रहा है।"हालांकि इस फैसले का समय राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

2026 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा नेताओं की तस्वीरें लगातार सामने आई थीं, जिनमें वे बंगाली संस्कृति से जुड़ाव दिखाने के लिए मछली खाते नजर आए थे। तमाल साहा ने कहा, "चुनाव से पहले भाजपा पूरे बंगाल में हाथ में मछली लेकर घूम रही थी और चुनाव के बाद सबसे पहले अंडा हटाने का फैसला सामने आ गया।"

उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि जैसे दुनिया में BC (Before Christ) और AD (Anno Domini) होता है, वैसे ही बंगाल की राजनीति अब BE (Before Election) और AR (After Result) में बंटती नजर आ रही है।

क्या होगा नए मेन्यू में?

इस्कॉन पूरी तरह शाकाहारी संस्था है। उसके रसोईघर में अंडा, प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं होता। पायलट प्रोजेक्ट के तहत बच्चों को चावल, दाल, खिचड़ी, सब्जियां, सोया बड़ी और अन्य दालें परोसी जाएंगी।इस्कॉन के तत्कालीन प्रवक्ता राधारमण दास ने दावा किया था कि शाकाहारी भोजन से भी बच्चों की प्रोटीन संबंधी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। हालांकि बाद में इस्कॉन ने उन्हें अनिवार्य अवकाश पर भेज दिया और मीडिया या सरकार के सामने संगठन का प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया।

सरकार के रुख पर उठे सवाल

तमाल साहा ने सरकार के फैसले में विरोधाभास की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि एक ओर स्कूलों में इस्कॉन के जरिए शाकाहारी भोजन दिया जाएगा, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार की 'मां आहार' योजना में सप्ताह में कम से कम दो दिन पांच रुपये की थाली में मछली परोसी जा रही है।उन्होंने कहा, "अगर इस्कॉन का भोजन इतना ही पौष्टिक और स्वादिष्ट है, तो इसकी शुरुआत राज्य सचिवालय, विधानसभा और विधायकों के हॉस्टल से क्यों नहीं की जाती?"

'यह सिर्फ छोटी राजनीति है'

राजनीतिक विश्लेषक तौसीफ अहमद खान ने कहा, "मिड-डे मील से अंडा हटाना भाजपा की छोटी राजनीति का हिस्सा है। पार्टी अपने वोट बैंक को खुश करने की कोशिश कर रही है और इस्कॉन को एक माध्यम बनाया गया है।"उनका कहना था कि चूंकि इस्कॉन धार्मिक कारणों से अंडा परोस ही नहीं सकता, इसलिए उसे जिम्मेदारी देना अपने आप में अंडे को हटाने का एक अप्रत्यक्ष तरीका था।

टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल

खान ने पूछा कि इस परियोजना के लिए कोई खुली निविदा (टेंडर) क्यों नहीं निकाली गई।उन्होंने कहा, "गुरुद्वारों समेत कई धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं भी मुफ्त भोजन वितरित करती हैं। फिर सिर्फ इस्कॉन को ही क्यों चुना गया?"उनके मुताबिक बिना प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के एक संस्था को जिम्मेदारी देना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है।उन्होंने कहा, "दसवीं कक्षा का छात्र भी समझ सकता है कि इस्कॉन को यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे कोई छिपा हुआ राजनीतिक उद्देश्य है।"

पोषण सबसे बड़ा मुद्दा

दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल बच्चों का पोषण होना चाहिए।तौसीफ अहमद खान ने कहा, "बच्चों के भोजन का मूल्यांकन सिर्फ पोषण के आधार पर होना चाहिए, किसी विचारधारा के आधार पर नहीं।"तमाल साहा ने भी कहा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। उनके लिए स्कूल का भोजन सिर्फ पोषण ही नहीं बल्कि स्कूल आने का एक बड़ा कारण भी होता है।उन्होंने कहा, "इन बच्चों के पास शाकाहारी या मांसाहारी भोजन चुनने की सुविधा नहीं होती। उनकी पहली जरूरत भोजन है।"

अंडा क्यों महत्वपूर्ण?

सरकार प्रति बच्चे लगभग 10 रुपये खर्च करती है। साहा का कहना है कि इस बजट में अंडा सबसे सस्ता और उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन उपलब्ध कराता है।उन्होंने भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली के शाकाहारी आहार का उदाहरण देते हुए कहा, "विराट कोहली वीगन बन सकते हैं क्योंकि उनके पास महंगा और संतुलित भोजन खरीदने की क्षमता है। लेकिन गरीब बच्चों के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं है।"

विकल्प देने की मांग

तमाल साहा का सुझाव था कि इस्कॉन चाहे तो सरकार की योजना के समानांतर एक अतिरिक्त सेवा चला सकता है, लेकिन सरकारी योजना का पूरी तरह स्थान नहीं लेना चाहिए।उन्होंने कहा, "बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, किसी धार्मिक संस्था की नहीं। सरकार जिस संस्था को यह जिम्मेदारी देती है, वही उसकी मंशा को भी दर्शाता है।"

तौसीफ अहमद खान ने भी सवाल उठाया कि भाजपा जिस तरह मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर भोजन के जरिए प्रभाव डालने के आरोप लगाती रही है, उसी सरकार ने बिना टेंडर के एक धार्मिक संस्था को विशेष अधिकार क्यों दे दिए?

समाधान क्या हो सकता है?

दोनों विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि यदि सरकार आउटसोर्सिंग करना चाहती है तो उसे कई संस्थाओं और कैटरिंग एजेंसियों के लिए खुला रखा जाए। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विकल्प उपलब्ध कराए जाएं ताकि बच्चों को अपनी जरूरत और पसंद के अनुसार भोजन मिल सके।

कार्यक्रम के अंत में तमाल साहा ने कहा, "मुद्दा सिर्फ भोजन का नहीं बल्कि उस विचारधारा का भी है जिसे इस्कॉन अपने साथ लेकर आता है। जब मुख्यमंत्री कहते हैं कि 'हरे कृष्ण' बोलने की जरूरत नहीं है, सिर्फ भोजन खाइए, तब भी इस्कॉन की पहचान उस भोजन के साथ जुड़ जाती है। कई लोग इसे प्रसाद के रूप में भी देख सकते हैं। जबकि मिड-डे मील सिर्फ हिंदू बच्चों के लिए नहीं बल्कि सभी समुदायों के बच्चों के लिए है।"

Read More
Next Story