
बंगाल में PAC की जंग बनी प्रतिष्ठा का सवाल, ममता बनाम रितब्रत आमने-सामने
पश्चिम बंगाल में PAC चेयरमैन पद के लिए चुनाव होने जा रहा है। TMC में विभाजन के बाद यह मुकाबला असली विपक्ष की पहचान की लड़ाई बन गया है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में पहली बार लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee-PAC) के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होने जा रहा है। आमतौर पर यह प्रक्रिया सर्वसम्मति से पूरी हो जाती है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुए विभाजन ने इस बार एक साधारण संसदीय प्रक्रिया को राजनीतिक वैधता की बड़ी लड़ाई में बदल दिया है।
5 जुलाई को होने वाला यह चुनाव केवल PAC चेयरमैन चुनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि विधानसभा में वास्तविक विपक्ष का प्रतिनिधित्व किस गुट के पास है।
PAC अध्यक्ष पद पर चुनाव क्यों है असाधारण?
भारतीय संसद और अधिकांश राज्य विधानसभाओं में PAC अध्यक्ष का पद परंपरागत रूप से विपक्ष को दिया जाता है। सामान्यतः राजनीतिक दल आपसी सहमति से उम्मीदवार तय कर लेते हैं और चुनाव की नौबत नहीं आती।लेकिन पश्चिम बंगाल में TMC के दो गुटों—एक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला और दूसरा बागी नेता रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला—ने खुद को मुख्य विपक्षी शक्ति बताना शुरू कर दिया है। इसी वजह से विधानसभा ने PAC समेत चार महत्वपूर्ण समितियों के अध्यक्ष पदों के लिए चुनाव कराने की घोषणा की है।इस चुनाव में केवल विपक्षी विधायक मतदान करेंगे, जिससे यह विपक्षी खेमे के भीतर शक्ति परीक्षण जैसा बन गया है।
रितब्रत गुट को मिला विपक्षी नेतृत्व का दर्जा
रितब्रत बनर्जी गुट ने दावा किया है कि उसे विधानसभा में अधिकांश विपक्षी विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इसी आधार पर विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने इस गुट को विपक्षी नेतृत्व के रूप में मान्यता दी है।हालांकि ममता बनर्जी खेमे ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है और यह विवाद अभी न्यायिक प्रक्रिया में है। ऐसे में PAC चुनाव का नतीजा दोनों गुटों के राजनीतिक दावों को मजबूती या कमजोरी दे सकता है।
क्या है PAC की अहमियत?
लोक लेखा समिति (PAC) को विधानसभा का सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय निगरानी तंत्र माना जाता है। यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों के आधार पर सरकारी खर्चों की जांच करती है और सरकार की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने का काम करती है।संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि PAC का अध्यक्ष विपक्ष से होने की परंपरा का उद्देश्य सरकार की निष्पक्ष निगरानी सुनिश्चित करना है।
पहले भी विवादों में रहा है PAC पद
पश्चिम बंगाल में PAC अध्यक्ष पद को लेकर पहले भी कई विवाद हो चुके हैं।
2016 का मामला
2016 में जब TMC सत्ता में थी, तब तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने कांग्रेस विधायक दल की आपत्तियों के बावजूद पूर्व कांग्रेस नेता मानस भूनिया को PAC अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था।उस समय भूनिया TMC के करीब माने जा रहे थे। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि उन्हें राजनीतिक नजदीकी के कारण यह पद दिया गया और इससे विपक्ष को मिलने वाले अधिकारों की भावना कमजोर हुई।
2021 का विवाद
2021 में भी विवाद तब खड़ा हुआ जब TMC सरकार ने भाजपा छोड़कर वापस पार्टी में आए मुकुल रॉय को PAC अध्यक्ष बना दिया।भाजपा ने इस पद के लिए पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अशोक लाहिड़ी का नाम प्रस्तावित किया था। पार्टी का आरोप था कि मुकुल रॉय भले ही तकनीकी रूप से भाजपा विधायक थे, लेकिन राजनीतिक रूप से वे पहले ही TMC में लौट चुके थे। विरोध स्वरूप भाजपा विधायकों ने कई विधानसभा समितियों से इस्तीफा तक दे दिया था।
इस बार विवाद अलग है
पिछले विवादों में सवाल यह था कि विपक्ष की ओर से किस व्यक्ति को PAC अध्यक्ष बनाया जाए। लेकिन इस बार सवाल व्यक्ति का नहीं बल्कि यह है कि असली विपक्ष कौन है।पिछले महीने हुए विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद पार्टी के भीतर बड़ा विद्रोह शुरू हो गया। पार्टी के कई विधायक ममता बनर्जी का साथ छोड़कर रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट में शामिल हो गए।रितब्रत गुट का दावा है कि उसके पास विपक्षी विधायकों का बहुमत समर्थन है, जबकि ममता खेमे का कहना है कि वही असली TMC और वास्तविक विपक्ष है।
उम्मीदवारों पर नजर
विधानसभा की अधिसूचना के अनुसार PAC समेत विभिन्न समितियों के अध्यक्ष पदों के लिए नामांकन 30 जून तक दाखिल किए जा सकेंगे। 1 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 2 जुलाई तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे।सूत्रों के मुताबिक रितब्रत गुट PAC अध्यक्ष पद के लिए पूर्व कोलकाता मेयर फिरहाद हकीम का समर्थन कर सकता है। हालांकि ममता बनर्जी गुट ने अभी तक अपने उम्मीदवार की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
राजनीतिक वैधता की लड़ाई
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि समिति अध्यक्ष पदों के लिए चुनाव बेहद दुर्लभ होते हैं, क्योंकि आमतौर पर ऐसे पद सहमति से तय किए जाते हैं।वरिष्ठ अधिवक्ता अरिंदम दास के अनुसार, यह चुनाव केवल विधानसभा की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय निगरानी समिति के प्रमुख को चुनने का मामला नहीं है, बल्कि विपक्षी राजनीति के भीतर मान्यता और नेतृत्व की लड़ाई भी है।
नतीजे के दूरगामी असर
यदि रितब्रत बनर्जी गुट जीत हासिल करता है तो उसका यह दावा और मजबूत होगा कि वही विपक्षी विधायकों का बहुमत प्रतिनिधित्व करता है। इससे TMC के भविष्य को लेकर चल रही कानूनी और राजनीतिक लड़ाइयों में उसे बढ़त मिल सकती है।वहीं यदि ममता बनर्जी का गुट जीतता है, तो यह साबित होगा कि बगावत के बावजूद उनकी राजनीतिक पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है। कुल मिलाकर 5 जुलाई को होने वाला यह चुनाव केवल PAC अध्यक्ष के चयन का मामला नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की विपक्षी राजनीति के भविष्य और TMC के भीतर नेतृत्व की लड़ाई की दिशा भी तय कर सकता है।

