
बंगाल में BJP की जीत के बाद ‘पुशबैक’ और घुसपैठ पर विवाद गहराया
विदेश मंत्रालय के 2,862 लंबित डिपोर्टेशन मामलों के खुलासे के बाद भाजपा के बांग्लादेशी घुसपैठ दावों और बंगाल की राजनीति पर बहस तेज हो गई है।
भारत सरकार द्वारा यह स्वीकार किए जाने के बाद कि बांग्लादेश अब तक 2,862 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की पुष्टि नहीं कर पाया है, भाजपा के लंबे समय से किए जा रहे “बड़े पैमाने पर घुसपैठ” के दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं। इनमें से कई मामलों में पांच साल से अधिक समय से सत्यापन लंबित है।
विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से गुरुवार को दी गई यह जानकारी ऐसे समय आई है, जब भारत और बांग्लादेश के बीच अवैध प्रवासियों और सीमा पर कथित “पुशबैक” कार्रवाई को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है।
भाजपा का पुराना चुनावी मुद्दा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता वर्षों से पश्चिम बंगाल और असम जैसे सीमावर्ती राज्यों में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाते रहे हैं। भाजपा अक्सर इसे जनसंख्या संतुलन में बदलाव और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती रही है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को कोलकाता में भाजपा नेताओं और नवनिर्वाचित विधायकों को संबोधित करते हुए फिर जनसंख्या परिवर्तन का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ नहीं होने दी जाएगी।
आंकड़ों ने दावों पर खड़े किए सवाल
हालांकि, औपचारिक रूप से निर्वासन (डिपोर्टेशन) के लिए लंबित मामलों की अपेक्षाकृत कम संख्या ने राजनीतिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर उजागर कर दिया है।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (APDR) के रणजीत सुर ने कहा कि यदि चुनावी भाषणों में बताए गए स्तर पर घुसपैठ हो रही होती, तो सवाल उठता है कि केंद्र में भाजपा के एक दशक से अधिक शासन के बावजूद निर्वासन के लिए केवल कुछ हजार मामले ही लंबित क्यों हैं।
जनसांख्यिकीय बदलाव के दावों पर भी बहस
2024 में प्रकाशित एक विश्लेषण में पाया गया कि उपलब्ध जनसांख्यिकीय आंकड़े भाजपा नेताओं द्वारा प्रचारित बड़े पैमाने की अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ को निर्णायक रूप से साबित नहीं करते।
जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, सीमावर्ती राज्यों में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर दशकों से लगातार घट रही है और यह राष्ट्रीय रुझानों के समान है। इसके अलावा, भारत सरकार ने अब तक देशभर में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या पर कोई हालिया आधिकारिक सर्वेक्षण नहीं किया है।
विपक्ष ने भाजपा पर साधा निशाना
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि भारत ने बांग्लादेश से बार-बार नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया तेज करने का आग्रह किया है ताकि निर्वासन “सुचारु रूप से” हो सके। उन्होंने कहा कि कई सत्यापन अनुरोध पांच वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं।
कोलकाता के भू-राजनीतिक विश्लेषक निर्मल्या बनर्जी ने कहा कि यह आंकड़ा दर्शाता है कि गृह मंत्रालय द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी अभियान के नतीजे भाजपा के दावों के अनुरूप नहीं हैं।
कांग्रेस नेता रणजीत मुखर्जी ने आरोप लगाया कि घुसपैठ का मुद्दा बंगाल और असम में ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि वास्तविक निर्वासन आंकड़े राजनीतिक दावों के आसपास भी नहीं पहुंचते।
गिरफ्तारियां और मानवाधिकार चिंताएं
हाल के वर्षों में पुलिस ने कई बार कथित बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार करने का दावा किया है, खासकर भाजपा शासित राज्यों में। इन लोगों पर फर्जी आधार कार्ड और नकली दस्तावेज रखने के आरोप लगाए गए।
लेकिन मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि बंगाली भाषी मुसलमानों को मनमाने ढंग से निशाना बनाया जा रहा है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ा तनाव
यह मुद्दा अब भारत-बांग्लादेश संबंधों से भी जुड़ गया है। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के संकेत दिखाई दिए हैं।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने बांग्लादेश से राष्ट्रीयता सत्यापन प्रक्रिया तेज करने का अनुरोध किया है। यह बयान बांग्लादेशी अधिकारियों की उन टिप्पणियों के जवाब में आया, जिनमें भारत पर कथित “पुश-इन” अभियान चलाने का आरोप लगाया गया था।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत के बाद अवैध घुसपैठ और मतदाता सूची की जांच प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे।
बांग्लादेश की बढ़ती चिंता
बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने आशंका जताई कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सत्ता आने के बाद सीमा पर “पुशबैक” अभियान तेज हो सकते हैं। वहीं विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने चेतावनी दी कि यदि लोगों को जबरन बांग्लादेश भेजा गया, तो ढाका प्रतिक्रिया देगा।
बांग्लादेश में कई लोगों ने पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर चिंता जताई है।
मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के पूर्व सूचना सलाहकार और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के संयोजक नाहिद इस्लाम ने कहा कि बंगाल में भाजपा की जीत से बांग्लादेश पर सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में मुस्लिम और मतुआ समुदाय के मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया और चुनाव बाद अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने की घटनाएं हुईं। हालांकि उन्होंने बांग्लादेशियों से सांप्रदायिक प्रतिक्रिया से बचने की अपील की और कहा कि ढाका को हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई सभी समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
चुनावी राजनीति और कूटनीतिक जोखिम
विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद “अवैध घुसपैठ” का मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान “घुसपैठियों” की पहचान, सीमा नियंत्रण सख्त करने और मतदाता सूची की समीक्षा का वादा किया था।
SIR प्रक्रिया के दौरान हजारों मुस्लिम मतदाताओं और अन्य हाशिए के समुदायों के नाम हटाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ। भाजपा ने इसे फर्जी मतदाताओं को हटाने के लिए जरूरी कदम बताया।
कोलकाता के राजनीतिक वैज्ञानिक देबाशीष चक्रवर्ती का कहना है कि घुसपैठ का मुद्दा अब घरेलू राजनीति के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव का माध्यम भी बन गया है। उनके अनुसार, चुनावी बयानबाजी का असर दोनों देशों के संबंधों पर भी पड़ सकता है।

