
सत्ता बदलते ही बंगाल में बवाल, 1946 जैसे हालात की चर्चा तेज
पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद बढ़ती हिंसा ने सांप्रदायिक तनाव को गहरा कर दिया है, जिससे 1946 जैसे हालात की आशंका जताई जा रही है।
पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक और चुनावी हिंसा का गवाह रहा है। 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार बनने के बाद से राज्य में प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव आम बात रही है। लेकिन इस बार 4 मई को आए विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद जो हालात बने हैं, उन्हें कई राजनीतिक विश्लेषक पहले से कहीं अधिक गंभीर और सांप्रदायिक स्वरूप वाला मान रहे हैं।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गौतम लाहिड़ी ने द फेडरल से बातचीत में कहा कि मौजूदा हिंसा केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ग्रामीण इलाकों में फैलने की भी आशंका है। उन्होंने कहा, “यह स्थिति 1977 या 2011 जैसी नहीं है, जब चुनावों के जरिए सत्ता परिवर्तन हुआ था। यह 1946 की याद दिलाती है, जिसने आखिरकार बंगाल के विभाजन का रास्ता तैयार किया था।” लाहिड़ी ने दावा किया कि इस बार मुस्लिम समुदाय की दुकानों और घरों पर बुलडोजर चलाए जाने की घटनाएं हिंसा के सांप्रदायिक स्वरूप को साफ तौर पर दिखाती हैं।
राजनीतिक, वैचारिक और सांप्रदायिक संघर्ष
विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हिंसा केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैचारिक और सांप्रदायिक टकराव भी शामिल हो चुके हैं।उनके मुताबिक चुनावी माहौल का फायदा उठाकर आपराधिक तत्व भी सक्रिय हो गए हैं।पश्चिम बंगाल में लंबे अंतराल के बाद सत्ता परिवर्तन होने के कारण राजनीतिक तनाव और असुरक्षा की भावना बढ़ी है। हालांकि पहले भी चुनाव बाद हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं होती रही हैं, लेकिन इस बार भीड़ द्वारा हमले और निशाना बनाकर की जा रही हत्याओं ने स्थिति को ज्यादा गंभीर बना दिया है।
कपिल सिब्बल ने गिनाईं हिंसा प्रभावित जगहें
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने 6 मई को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा से प्रभावित कई इलाकों की सूची जारी की। इन घटनाओं में कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मौत होने की बात भी सामने आई। शुभेंदु अधिकारी के करीबी चंद्रनाथ रथ की हत्या। हिंसा में मारे गए लोगों में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी चंद्रनाथ रथ भी शामिल हैं। पूर्व भारतीय वायुसेना अधिकारी चंद्रनाथ रथ 6 मई की रात शुभेंदु अधिकारी के कार्यालय से घर लौट रहे थे। उनकी कार पर पश्चिम बंगाल विधानसभा का स्टिकर लगा था। इसी दौरान मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उनकी गाड़ी को रोककर ताबड़तोड़ गोलीबारी की, जिसमें उनकी मौत हो गई, जबकि ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हो गया। यह हमला ऐसे समय हुआ जब राज्य पुलिस लोगों को केवल जरूरी काम होने पर ही बाहर निकलने की सलाह दे रही थी।
बंगाल और विभाजन का ऐतिहासिक संदर्भ
विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल का इतिहास विभाजन और सांप्रदायिक तनाव से गहराई से जुड़ा रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान 1905 में बंगाल का पहला विभाजन किया गया था, जिसमें मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल और हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल बनाया गया। हालांकि 1911 में इसे वापस ले लिया गया, लेकिन 1947 में फिर बंगाल का विभाजन हुआ और पूर्वी बंगाल पूर्वी पाकिस्तान बना, जो बाद में 1971 में बांग्लादेश बना।
1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान लाखों शरणार्थी भारत आए थे। इसके बाद भी समय-समय पर सीमा पार से पलायन और घुसपैठ को लेकर पश्चिम बंगाल और असम में राजनीतिक बहस होती रही है।
SIR और वोटर लिस्ट विवाद
इस चुनाव में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया भी विवाद का बड़ा कारण बनी। टीएमसी ने आरोप लगाया कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। वहीं भाजपा ने अपनी जीत को ममता बनर्जी सरकार के 15 साल के “कुशासन” का परिणाम बताया।
मतगणना के बाद अचानक बढ़ी हिंसा
गौर करने वाली बात यह है कि 29 अप्रैल तक मतदान शांतिपूर्ण रहा और बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई। हिंसा मुख्य रूप से मतगणना के दिन और उसके बाद शुरू हुई। इससे पहले केवल कांग्रेस कार्यकर्ता देबदीप चटर्जी की आसनसोल में हत्या की घटना सामने आई थी। विश्लेषकों का सवाल है कि जब चुनाव आयोग के नियंत्रण में प्रशासन मतदान तक शांति बनाए रखने में सफल रहा, तो नतीजों के बाद हालात क्यों बिगड़ गए?
‘घुसपैठिया’ नैरेटिव और बांग्लादेश का जिक्र
पूरे चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने सीमा पार से “घुसपैठियों” के आने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। इस पर बांग्लादेश ने आपत्ति जताई थी और ढाका में भारतीय उच्चायुक्त से विरोध दर्ज कराया गया था। हालांकि चुनाव के बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भाजपा और शुभेंदु अधिकारी को जीत की बधाई भी दी। उन्होंने उम्मीद जताई कि नई भाजपा सरकार के आने के बाद तीस्ता जल बंटवारा समझौते पर प्रगति हो सकती है, जिसे लेकर ममता बनर्जी पहले आपत्ति जताती रही थीं।
सीमा राज्य होने की संवेदनशीलता नजरअंदाज?
विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील सीमा राज्य में चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों ने हालात की गंभीरता को नजरअंदाज किया।चुनाव के बीच ही भारत सरकार ने ढाका में नए उच्चायुक्त की नियुक्ति का संकेत भी दिया, जिससे साफ था कि भारत-बांग्लादेश संबंधों पर चुनावी माहौल का असर पड़ सकता है।अब चुनाव बाद बढ़ती हिंसा और अनिश्चितता ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है।

