
महिलाओं ने लाठियां खाईं, पुरुषों ये झेला.., यूं ही नहीं मिली 'भोजशाला'
मध्यप्रदेश स्थित भोजशाला, राजा भोज द्वारा स्थापित मां सरस्वती का मंदिर और भोजशाला है। जो लंबे समय से विवाद में भी लेकिन अब हिंदुओं को इसका पूर्ण अधिकार मिला है।
धार की भोजशाला भले ही हिंदू पक्ष को मिल गई है लेकिन उन लोगों का संघर्ष अतुलनीय है, जिन्होंने धार स्थित प्राचीन भोजशाला को वाग्देवी (मां सरस्वती) का मूल मंदिर सिद्ध करने के लिए अपना पूरा जीवन इस आंदोलन को समर्पित कर दिया। इस पूरे ऐतिहासिक संघर्ष में 'भोज उत्सव समिति' ने भी बढ़-चढ़कर अपनी बेहद सक्रिय भूमिका निभाई।
इसी समिति के संरक्षक अशोक कुमार जैन ने ही सबसे पहले भोजशाला परिसर के भीतर सामूहिक हनुमान चालीसा के पाठ की शुरुआत कराई थी। उल्लेखनीय है कि 16 मई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने एक युगांतकारी फैसले में भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर स्वीकार किया है। इस ऐतिहासिक अदालती फैसले के तुरंत बाद दैनिक भास्कर की टीम ने इस जमीनी आंदोलन से दशकों से जुड़े उन प्रमुख चेहरों से खास बातचीत की, जिन्होंने इस संघर्ष की खट्टी-मीठी और बेहद चुनौतीपूर्ण यादें साझा कीं। इस फैसले के आते ही भोजशाला परिसर के बाहर विभिन्न हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने एकत्र होकर जमकर खुशियां मनाईं और विजय उत्सव मनाया।
"मेरे जीते-जी अदालत का यह ऐतिहासिक फैसला आया है। यह मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। भोजशाला को मां वाग्देवी का पावन मंदिर साबित करने के लिए मैंने और मेरे तमाम साथियों ने अपने जीवन में बहुत लंबा और कड़ा संघर्ष किया है।" यह बात कहते हुए 95 वर्ष के बुजुर्ग विमल गोधा की आंखें एक विशेष चमक और संतोष से भर जाती हैं।
दिग्विजय सरकार में सियासत और दमन का दौर
आंदोलन के पुराने दिनों को याद करते हुए विमल गोधा बताते हैं कि साल 1993 से लेकर 2003 के बीच का समय सबसे कठिन था। उस दौरान मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का शासन था, जिसमें आंदोलनकारियों और स्थानीय प्रशासन के बीच हमेशा सीधा और तीखा टकराव देखने को मिलता था। उस दमनकारी दौर में धार क्षेत्र में धारा 144 लागू रहना, आंदोलनकारियों की एहतियाती गिरफ्तारियां होना और बाहर से आने वाले संतों के धार शहर में प्रवेश पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया जाना बेहद आम बात बन चुकी थी।
उस समय विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल के सैकड़ों कार्यकर्ताओं पर प्रशासन द्वारा 'शांति भंग' करने के गंभीर आरोप लगाते हुए कई पुलिस मुकदमे दर्ज किए गए थे। आंदोलन से जुड़े लोगों का सीधा आरोप था कि तत्कालीन राज्य सरकार हिंदुओं के धार्मिक और पूजा के अधिकारों को जबरन नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी। जबकि दूसरी ओर सरकारी प्रशासन इन कड़े कदमों को इलाके में सांप्रदायिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की एक जरूरी कवायद करार देता था।
साल 2003 का वो खौफनाक मंजर और महिलाओं का साहस
विमल गोधा भावुक होकर बताते हैं कि यह धार्मिक संघर्ष केवल पुरुषों तक ही सीमित नहीं था। इसमें क्षेत्र की महिलाओं ने भी कदम-कदम पर अभूतपूर्व साहस और वीरता का परिचय दिया था। साल 2003 में हुए भीषण पुलिस लाठीचार्ज के उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए वे कहते हैं कि उस दिन वसंत पंचमी का पावन पर्व था।
हम सभी श्रद्धालु हर हाल में भोजशाला के भीतर प्रवेश करके मां सरस्वती की पूजा-अर्चना करना चाहते थे। लेकिन तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने हमें वहां जाने से रोकने के लिए चारों तरफ भारी पुलिस बल और सुरक्षा घेरा तैनात कर रखा था। पुलिस को चकमा देने और रणनीति के तहत हमने आंदोलनकारियों के चार अलग-अलग समूह बनाए थे। ताकि अलग-अलग रास्तों और गलियों से होते हुए किसी भी तरह भोजशाला परिसर तक सीधे पहुंचा जा सके। उस दौरान विमल गोधा स्वयं पुलिस प्रशासन को चकमा देकर बड़ी तेजी से भोजशाला की तरफ दौड़े थे।
आंदोलन के बाद ही मिली थी हर मंगलवार पूजा की अनुमति
गोधा आगे बताते हैं कि उस दौर में पुलिसिया कार्रवाई इतनी सख्त थी कि आंदोलन कर रही महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया और उन पर भी बल प्रयोग किया गया। हालांकि, इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन और कड़े संघर्ष के दबाव के बाद ही अंततः हिंदुओं को हर मंगलवार के दिन भोजशाला के भीतर जाकर धार्मिक आरती करने की आधिकारिक अनुमति (परमिशन) प्राप्त हो सकी थी। अपने बचपन में पांचवीं कक्षा से ही नियमित रूप से भोजशाला जा रहे विमल गोधा आज 95 वर्ष की उम्र में भी पूरी निष्ठा के साथ हर मंगलवार को होने वाली इस आरती में शामिल होते हैं। यही कारण है कि आज उनके लिए अपने जीते-जी कोर्ट का यह अनुकूल फैसला देखना किसी बड़े सौभाग्य से कम नहीं है।
बचपन के बस्ते से लेकर सत्याग्रह तक का लंबा सफर
भोज उत्सव समिति के वरिष्ठ संरक्षक अशोक कुमार जैन की जीवन यात्रा भी इस मंदिर आंदोलन से पूरी तरह एकाकार रही है। वर्ष 1965 से ही इस पूरे आंदोलन से बेहद सक्रिय रूप से जुड़े अशोक कुमार जैन बताते हैं कि बचपन के दिनों में वे स्कूल की छुट्टी होते ही अपने बस्ते के साथ सीधे धार की भोजशाला पहुंच जाया करते थे। वे पुरानी यादों को साझा करते हुए कहते हैं, "हम सभी वहां शांतिपूर्वक वसंत पंचमी मनाना और मां की पूजा करना चाहते थे। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के समय हमें हमेशा बलपूर्वक परिसर से बाहर धकेल दिया जाता था और हमारे खिलाफ पुलिस में झूठे केस दर्ज कर दिए जाते थे।"
इसके बाद साल 1992 में प्रखर चेतना की प्रतीक साध्वी ऋतंभरा के एक देशव्यापी आह्वान के बाद यहां प्रति मंगलवार को सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया गया। जब दिग्विजय सिंह सरकार के शासनकाल में इस साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ पर भी प्रतिबंध लगाने की कोशिश हुई तो स्थानीय हिंदुओं का यह आंदोलन और अधिक उग्र तथा व्यापक हो गया। इस निरंतर संघर्ष के परिणामस्वरूप अंततः 4 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के एक आधिकारिक आदेश के बाद यहां हिंदुओं के लिए नियमित पूजा-अर्चना और दर्शन का मार्ग पूरी तरह से प्रशस्त हुआ।
राजा भोज के विद्या केंद्र से लेकर ब्रिटिश म्यूजियम तक
इस ऐतिहासिक स्थल के विवाद की जड़ें सदियों पुरानी हैं। भोजशाला का गौरवशाली इतिहास 11वीं सदी के महान और प्रतापी परमार वंश के राजा भोज से सीधा जुड़ा हुआ है। राजा भोज ने इस पावन स्थान को देश में संस्कृत शिक्षा, दर्शन, साहित्य और कला के एक भव्य तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां विद्या की देवी मां सरस्वती (वाग्देवी) का एक अत्यंत सुंदर और भव्य मंदिर स्थापित था। बाद के कालखंडों में विदेशी आक्रमणों के दौरान यहां कमाल मौला मस्जिद का निर्माण कराया गया, जिसके कारण यह ऐतिहासिक स्थल लंबे समय के लिए दो समुदायों के बीच अपने-अपने धार्मिक दावों और कानूनी विवाद का मुख्य केंद्र बन गया।
लंदन से मां वाग्देवी की 'घर वापसी' का भावुक इंतजार
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील और भावुक पहलू मां वाग्देवी की वह मूल प्रतिमा है, जिसे ब्रिटिश शासनकाल के दौरान साल 1875 से 1880 के आसपास एक ब्रिटिश अधिकारी भारत से चोरी-छिपे लंदन ले गया था। उत्कृष्ट शिल्पशास्त्र से निर्मित काले पत्थर की यह अत्यंत अलौकिक और सुंदर प्राचीन प्रतिमा वर्तमान समय में लंदन के 'ब्रिटिश म्यूजियम' (ग्रेट रसेल स्ट्रीट) में सुरक्षित रखी हुई है। धार के तमाम हिंदू संगठनों और आंदोलनकारियों का यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक लंदन से मां वाग्देवी की वह मूल प्रतिमा सम्मान सहित भारत वापस नहीं आ जाती, तब तक उनका यह सांस्कृतिक संघर्ष पूरी तरह अधूरा है।
वर्तमान स्थिति को देखते हुए, हिंदू पक्ष द्वारा उत्तर प्रदेश के ग्वालियर में मां वाग्देवी की बिल्कुल वैसी ही एक नई भव्य प्रतिमा विशेष रूप से तैयार कराई गई है, जिसे भविष्य में प्रतीक स्वरूप भोजशाला परिसर में स्थापित करने की एक विस्तृत योजना बनाई गई है।
ऐसे क्रमिक रूप से चला अदालत में यह कानूनी मामला
अदालत में इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत साल 2022 में हुई थी, जब रंजना अग्निहोत्री और उनके अन्य सहयोगियों ने 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' संस्था की ओर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका के माध्यम से अदालत से मांग की गई थी कि भोजशाला परिसर का वास्तविक धार्मिक स्वरूप पूरी तरह तय किया जाए और हिंदू समाज को वहां पूजा-अर्चना के पूर्ण और निर्बाध अधिकार सौंपे जाएं। इसी कानूनी प्रकरण की सुनवाई के दौरान कोर्ट के आदेश पर साल 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग की एक विशेषज्ञ टीम ने भोजशाला परिसर के भीतर पूरे 98 दिनों तक आधुनिक उपकरणों से एक विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण (Scientific Survey) किया था।
इसके बाद, इसी साल 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी के पावन अवसर पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने हिंदुओं को भोजशाला में दिनभर बिना किसी रोक-टोक के निर्बाध रूप से पूजा-अर्चना करने की विशेष अनुमति प्रदान की थी। इसके उपरांत, 6 अप्रैल 2026 से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में इस मामले पर नियमित और अंतिम सुनवाई का दौर शुरू हुआ, जो लगातार चलते हुए 12 मई 2026 को पूरी तरह संपन्न हुआ।
हिंदू पक्ष ने अदालत में पेश किए मंदिर होने के ये पुख्ता तर्क
6 अप्रैल से लेकर 9 अप्रैल 2026 तक चली बहस के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से देश के प्रसिद्ध सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और मामले के मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला के मूल रूप से मंदिर होने के पक्ष में कई ऐतिहासिक और अकाट्य तर्क अदालत के समक्ष रखे। याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत में कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य और ऐतिहासिक दस्तावेज भी सबूत के तौर पर पेश किए। इनमें एएसआई (ASI) द्वारा समय-समय पर किए गए पूर्व सर्वेक्षणों, ऐतिहासिक शाही अभिलेखों, परिसर के प्राचीन स्तंभों, शिलालेखों और दीवारों पर उत्कीर्ण देवी सरस्वती से जुड़े विभिन्न पवित्र धार्मिक प्रतीकों का विस्तृत उल्लेख शामिल था।

