93 की उम्र में देवेगौड़ा को झटका, संसद में वापसी की राह बंद?
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93 की उम्र में देवेगौड़ा को झटका, संसद में वापसी की राह बंद?

भाजपा द्वारा एचडी देवेगौड़ा को राज्यसभा टिकट न देने से जेडीएस में नाराजगी बढ़ी है। गठबंधन बरकरार है, लेकिन कार्यकर्ताओं में असंतोष साफ दिख रहा है।


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) [जेडी(एस)] के संस्थापक नेता एच.डी. देवेगौड़ा को राज्यसभा का टिकट नहीं दिए जाने के निर्णय ने पार्टी के भीतर निराशा पैदा कर दी है और कर्नाटक में भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

93 वर्ष की आयु में देवेगौड़ा देश के सबसे वरिष्ठ सक्रिय राजनेताओं में से एक हैं। यदि भाजपा उनके एक और राज्यसभा कार्यकाल का समर्थन करती, तो वे अगले छह वर्षों तक संसद सदस्य बने रह सकते थे और संभवतः 99 वर्ष की आयु तक सांसद रहते। कर्नाटक की राजनीति में अब भी सक्रिय भूमिका निभा रहे इस नेता के लिए संसद में बने रहना राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था।

देवेगौड़ा की राज्यसभा उम्मीदों को झटका

देवेगौड़ा परिवार के करीबी सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ नेता राज्यसभा में अपना कार्यकाल जारी रखना चाहते थे। जेडी(एस) कार्यकर्ताओं को भी उम्मीद थी कि एनडीए का सहयोगी दल भाजपा पार्टी के सबसे बड़े नेता के लिए स्थान बनाएगी।हालांकि, अब इन उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

विडंबना यह है कि देवेगौड़ा का वर्तमान राज्यसभा कार्यकाल वर्ष 2020 में कांग्रेस के समर्थन से संभव हुआ था। उस समय जेडी(एस) और कांग्रेस राजनीतिक सहयोगी थे। आज, जबकि जेडी(एस) एनडीए का हिस्सा है और भाजपा के साथ उसका घनिष्ठ गठबंधन है, फिर भी अनुभवी नेता की एक और राज्यसभा पारी की उम्मीद समाप्त होती दिखाई दे रही है।

फिलहाल भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन बरकरार है। राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए दोनों पक्षों द्वारा सार्वजनिक रूप से गठबंधन पर सवाल उठाने की संभावना नहीं है। फिर भी, देवेगौड़ा को राज्यसभा टिकट न मिलना जेडी(एस) के भीतर एक गहरी निराशा छोड़ गया है।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा के साथ गठबंधन से जेडी(एस) को काफी लाभ मिला है। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को कर्नाटक में केवल दो सीटें मिलीं, लेकिन गठबंधन के कारण एच.डी. कुमारस्वामी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिला। इसी वजह से पार्टी के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि भाजपा देवेगौड़ा को राज्यसभा के लिए समर्थन देगी।

इसके विपरीत, भाजपा के इस निर्णय को जेडी(एस) के कुछ वर्गों ने इस संकेत के रूप में देखा है कि राष्ट्रीय पार्टी अपने राजनीतिक हितों से समझौता करने को तैयार नहीं है, चाहे मामला उसके सहयोगी दल के सबसे सम्मानित नेता का ही क्यों न हो।

गठबंधन पर नई नजर से चर्चा

निराशा केवल देवेगौड़ा परिवार तक सीमित नहीं है। विशेष रूप से पुराने मैसूर क्षेत्र (ओल्ड मैसूर रीजन) में जेडी(एस) कार्यकर्ताओं ने इस फैसले पर असंतोष व्यक्त किया है। कई कार्यकर्ताओं के लिए देवेगौड़ा केवल एक वरिष्ठ नेता नहीं, बल्कि पार्टी की भावनात्मक और वैचारिक आधारशिला हैं।

भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन भी राजनीतिक आवश्यकता से जन्मा था। 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा वोक्कालिगा समुदाय में बड़ी पैठ बनाने में सफल नहीं हो सकी थी। ऐसे में उसने पुराने मैसूर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए जेडी(एस) को रणनीतिक सहयोगी बनाया।

वोक्कालिगा समुदाय जेडी(एस) का मुख्य समर्थन आधार रहा है, जिससे दक्षिणी कर्नाटक में विस्तार की भाजपा की योजनाओं के लिए यह पार्टी महत्वपूर्ण बन गई।जेडी(एस) के लिए भी यह गठबंधन लाभकारी था। विधानसभा में उसकी ताकत घटकर केवल 19 विधायकों तक रह गई थी, जबकि कांग्रेस नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार वोक्कालिगा मतदाताओं के बीच अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहे थे।

भाजपा के साथ हाथ मिलाकर जेडी(एस) वोक्कालिगा और अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित) वोटों के कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होने को रोकना चाहती थी।हालांकि, नाम न बताने की शर्त पर एक जेडी(एस) नेता ने कहा कि यह गठबंधन जमीनी स्तर पर कभी पूरी तरह सहज साझेदारी में नहीं बदल पाया। मंड्या, हासन, रामनगर, मैसूरु, तुमकुरु और बेंगलुरु ग्रामीण जैसे वोक्कालिगा-बहुल जिलों में भाजपा और जेडी(एस) कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग अक्सर चुनौतीपूर्ण रहा है। नेतृत्व द्वारा एकता दिखाने के प्रयासों के बावजूद स्थानीय प्रतिद्वंद्विता और अविश्वास कायम रहे।

विश्वास की कमी और बढ़ सकती है

जेडी(एस) के संस्थापक नेता को राज्यसभा सीट न मिलने से पार्टी के भीतर मौजूद असहजता और बढ़ सकती है।कई जेडी(एस) कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि भाजपा देवेगौड़ा जैसे कद के नेता को समायोजित नहीं कर सकी, तो इससे यह सवाल उठता है कि वह अपने सहयोगी दल का वास्तव में कितना सम्मान करती है।

पार्टी के कई अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि इस फैसले से भाजपा और जेडी(एस) के कार्यकर्ताओं के बीच पहले से मौजूद विश्वास की कमी और गहरी हो सकती है।देवेगौड़ा परिवार के एक करीबी सहयोगी के अनुसार, यह निराशा पूर्व प्रधानमंत्री के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने तथा हाल के वर्षों में एनडीए के करीब आने के बावजूद, अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में सक्रिय सांसद बने रहने की उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

कांग्रेस को मिल सकता है अप्रत्यक्ष लाभ

जेडी(एस) के भीतर बढ़ता असंतोष कांग्रेस के लिए लाभदायक साबित हो सकता है, विशेषकर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के लिए, जो देवेगौड़ा परिवार के बाहर सबसे प्रभावशाली वोक्कालिगा नेता के रूप में उभरे हैं।यदि जेडी(एस) कार्यकर्ताओं का एक वर्ग भाजपा के साथ गठबंधन के महत्व पर सवाल उठाना शुरू करता है, तो इससे कांग्रेस को पुराने मैसूर क्षेत्र में अपना प्रभाव और बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

छह दशकों से अधिक लंबा राजनीतिक सफर

93 वर्षीय एच.डी. देवेगौड़ा का राजनीतिक जीवन छह दशकों से अधिक लंबा रहा है। इस दौरान वे कई बार विधायक चुने गए, छह बार लोकसभा सदस्य बने और दो बार राज्यसभा में कर्नाटक का प्रतिनिधित्व किया।लगभग तीन दशकों तक वे कभी भी राजनीति के केंद्र से पूरी तरह बाहर नहीं रहे। 1994 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने के बाद वे 1996 में देश के प्रधानमंत्री बने। बाद में लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय रहे और चुनावी हार के बाद राज्यसभा के माध्यम से फिर संसद में लौटे।

1999 में हासन लोकसभा चुनाव और 2019 में तुमकुरु चुनाव हारने के बावजूद उनकी राष्ट्रीय राजनीति से दूरी अस्थायी ही रही। 2019 की हार के बाद वे 2020 में कांग्रेस के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे, जबकि उस समय जेडी(एस) के पास पर्याप्त संख्या नहीं थी।

कुछ संक्षिप्त अंतरालों को छोड़ दें तो देवेगौड़ा लगातार किसी न किसी प्रभावशाली पद पर रहे—विधायक, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद या राष्ट्रीय दल के नेता के रूप में। यही कारण है कि उन्हें कर्नाटक और भारत की राजनीति के सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले नेताओं में गिना जाता है।लेकिन इस बार ऐसा लगता है कि सत्ता के गलियारों में उनकी सक्रिय भूमिका समाप्ति की ओर बढ़ रही है।

कुमारस्वामी ने संभाला मोर्चा

दिलचस्प बात यह है कि देवेगौड़ा को राज्यसभा टिकट न मिलने से उत्पन्न निराशा के बावजूद केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुमारस्वामी, जो एनडीए के समर्थन से तीसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं, गठबंधन में किसी प्रकार की दरार नहीं आने देना चाहते।

सूत्रों के अनुसार, जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि देवेगौड़ा को राज्यसभा में स्थान नहीं मिलेगा, कुमारस्वामी ने एक अप्रत्याशित राजनीतिक कदम उठाते हुए कर्नाटक विधान परिषद चुनाव के लिए जेडी(एस) उम्मीदवार की घोषणा कर दी।इस फैसले ने उस चुनाव को, जिसे पहले निर्विरोध माना जा रहा था, प्रतिस्पर्धी बना दिया है। कांग्रेस ने चार और भाजपा ने दो उम्मीदवार उतारे हैं। दोनों दलों के पास प्रारंभिक गणित के अनुसार जीत के लिए पर्याप्त संख्या थी। लेकिन जेडी(एस) उम्मीदवार के मैदान में उतरने से समीकरण बदल गए हैं।

भाजपा के समर्थन पर भरोसा करते हुए जेडी(एस) उम्मीदवार अतिरिक्त वोट जुटाने की कोशिश करेगा, जिससे क्रॉस-वोटिंग की संभावना भी बढ़ सकती है। कांग्रेस भी अपने अतिरिक्त उम्मीदवार के लिए अन्य खेमों से समर्थन तलाश सकती है।

सूत्रों का कहना है कि घोषणा से पहले कुमारस्वामी ने दिल्ली में भाजपा नेतृत्व की सहमति प्राप्त कर ली थी, जिससे संकेत मिलता है कि हालिया झटकों के बावजूद गठबंधन राजनीतिक रूप से जीवित और सक्रिय है।

अंतिम अध्याय की ओर?

एच.डी. देवेगौड़ा ने 1960 के दशक की शुरुआत में चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था। वे 1962 में पहली बार होलेनारसिपुरा से कर्नाटक विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे।वर्ष 2026 तक उनका राजनीतिक जीवन लगभग 64 वर्षों का हो चुका है। यानी वे छह दशक से अधिक समय तक सक्रिय चुनावी राजनीति में बने रहे हैं।

अब, भाजपा द्वारा उन्हें एक और राज्यसभा कार्यकाल न दिए जाने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी यह असाधारण राजनीतिक यात्रा अपने अंतिम अध्याय के करीब पहुंच रही है।फिलहाल भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन कायम है, लेकिन देवेगौड़ा को राज्यसभा टिकट न मिलना जेडी(एस) के भीतर एक गहरी छाप छोड़ गया है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि क्या यह घटना देवेगौड़ा के संसदीय जीवन का अंतिम अध्याय साबित होगी या फिर कर्नाटक की वोक्कालिगा राजनीति में किसी बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन की शुरुआत बनेगी।

एक बात स्पष्ट है—भाजपा के इस निर्णय ने केवल 93 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री को ही नहीं, बल्कि उन हजारों जेडी(एस) कार्यकर्ताओं को भी निराश किया है, जो मानते थे कि पार्टी के संस्थापक को संसद में एक अंतिम कार्यकाल अवश्य मिलना चाहिए था।

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