कुम्हारटोली से कोलकाता तक, दुर्गा पूजा पर असर जमाने की होड़ तेज
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कुम्हारटोली से कोलकाता तक, दुर्गा पूजा पर असर जमाने की होड़ तेज

बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद दुर्गा पूजा समितियों में राजनीतिक बदलाव तेज हैं, जबकि अनुदान और कुम्हारटोली संकट नई सरकार की परीक्षा बन गए हैं।


पश्चिम बंगाल इस अक्टूबर भाजपा सरकार के तहत अपनी पहली दुर्गा पूजा की तैयारी कर रहा है। ऐसे में भाजपा अपनी चुनावी जीत को सांस्कृतिक प्रभुत्व में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी अब उस दुर्गा पूजा तंत्र में प्रवेश करना चाहती है, जिस पर लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का प्रभाव रहा है।एक दशक से अधिक समय तक कोलकाता की कई बड़ी और प्रभावशाली दुर्गा पूजा समितियां टीएमसी नेताओं से जुड़ी रहीं। इन नेताओं ने पूजा के माध्यम से स्थानीय प्रभाव, धार्मिक पहचान और राजनीतिक नेटवर्क को मजबूत किया।

दुर्गा पूजा और राजनीति का गहरा संबंध

2011 में टीएमसी के सत्ता में आने से पहले भी पार्टी के कई नेता भव्य सामुदायिक दुर्गा पूजा आयोजित करने के लिए जाने जाते थे। सत्ता में आने के बाद सरकारी संरक्षण, कॉरपोरेट प्रायोजन और प्रशासनिक सहयोग के जरिए ये नेटवर्क और मजबूत हो गए।आज बंगाल की कई चर्चित दुर्गा पूजाएं धार्मिक आयोजनों से अधिक राजनीतिक पहचान के रूप में देखी जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर, श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब पूर्व मंत्री सुजीत बोस से जुड़ा माना जाता है। चेतला अग्रणी कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम से जुड़ा रहा। सुरुचि संघा पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास की पहचान बन गया, जबकि भवानीपुर 75 पल्ली को ममता बनर्जी के भाई कार्तिक बनर्जी से जोड़ा जाता है।कोलकाता और जिलों की कई अन्य बड़ी पूजा समितियों की भी ऐसी ही राजनीतिक पहचान रही है। स्थानीय क्लब, जो दुर्गा पूजा आयोजित करते हैं, अक्सर मोहल्ला कल्याण केंद्र, चुनावी अभियान केंद्र और राजनीतिक संरक्षण बांटने के माध्यम के रूप में भी काम करते रहे।ममता बनर्जी सरकार के दौरान शुरू और विस्तारित की गई वार्षिक सरकारी अनुदान योजनाओं ने इन नेटवर्कों को और मजबूत किया।

भाजपा की नई रणनीति

अब भाजपा इसी राजनीतिक-सांस्कृतिक ढांचे में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी ने टीएमसी की “संरक्षण आधारित क्लब संस्कृति” को खत्म करने का वादा किया था।लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा को एहसास हुआ कि बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि राज्य की सबसे महत्वपूर्ण अनौपचारिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में से एक है।

वामपंथी दल भी रहे सक्रिय

टीएमसी से पहले 34 वर्षों तक सत्ता में रही वाम मोर्चा सरकार ने पूजा समितियों पर सीधा नियंत्रण कम रखा। लेकिन सीपीएम और अन्य वाम दल दुर्गा पूजा के दौरान विचारधारा और साहित्य के प्रचार के लिए पूजा पंडालों के पास पुस्तक स्टॉल लगाते थे।लाल बैनरों से सजे ये स्टॉल बंगाल की पूजा संस्कृति का अहम हिस्सा बन गए थे, जहां मार्क्सवादी साहित्य, राजनीतिक पत्रिकाएं और कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ी किताबें बेची जाती थीं।

भाजपा की सीमित सफलता

2019 लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा बंगाल में बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी। इसके बाद से पार्टी दुर्गा पूजा समितियों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही, ताकि टीएमसी के प्रभाव को चुनौती दी जा सके।हालांकि कोलकाता की प्रतिष्ठित पूजा समितियों में भाजपा को सीमित सफलता ही मिली।

2021 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने साल्ट लेक के ईस्टर्न जोनल कल्चरल सेंटर में अपनी दुर्गा पूजा भी आयोजित की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका वर्चुअल उद्घाटन किया था।लेकिन भाजपा विधायक साजल घोष, जो संतोष मित्रा स्क्वायर दुर्गा पूजा से जुड़े हैं, को छोड़कर पार्टी के बहुत कम बड़े नेता प्रमुख पूजा समितियों से मजबूत संबंध बना पाए।

पूजा समितियों में राजनीतिक बदलाव

अब भाजपा के सत्ता में आने के बाद पूजा समितियों में राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं।टीएमसी शासन के दौरान कोलकाता की कई बड़ी पूजाएं लगभग सरकार के विस्तार की तरह काम करती थीं। ममता बनर्जी हर साल कई प्रमुख पूजा पंडालों का उद्घाटन करती थीं और कुछ दिनों में दर्जनों पंडालों का दौरा करती थीं।लेकिन बदले राजनीतिक माहौल में कई पूजा समितियां अब भाजपा नेतृत्व से संपर्क बनाने की कोशिश कर रही हैं।

भाजपा सूत्रों के अनुसार कई समितियां इस साल के उद्घाटन के लिए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं से संपर्क कर रही हैं।कुछ आयोजक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी आमंत्रित करना चाहते हैं, ताकि वे नए राजनीतिक सत्ता केंद्र से खुद को जोड़ सकें।

आजीविका का सवाल

उत्तर कोलकाता की प्रमुख पूजा समिति ताला प्रत्यय के आयोजक शांतनु घोष ने कहा कि दुर्गा पूजा केवल आस्था और संस्कृति से नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी है। इसलिए सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, उसे समर्थन जारी रखना चाहिए।कई पूजा समितियों और क्लबों में पूर्व सरकार के करीबी पदाधिकारी धीरे-धीरे हट रहे हैं, जबकि नई सरकार के करीब माने जाने वाले लोग नेतृत्व संभाल रहे हैं।बताया जा रहा है कि कई वर्षों बाद कुछ समितियों में आंतरिक चुनाव भी कराए जा रहे हैं।एक प्रमुख पूजा आयोजक ने निजी तौर पर कहा, “अब समीकरण बदल चुके हैं। जो लोग पहले फैसले लेते थे, वे अब नियंत्रण में नहीं हैं।”

सरकारी अनुदान पर अनिश्चितता

इस बदलाव के बीच पूजा समितियों में यह चिंता भी बढ़ गई है कि क्या भाजपा सरकार ममता सरकार की तरह आर्थिक सहायता जारी रखेगी।राज्य की लगभग 45 हजार पूजा समितियों को पहले 1.10 लाख रुपये का सरकारी अनुदान मिलता था। इसके अलावा कई समितियों को पुरस्कार राशि, सरकारी विज्ञापन, 80 प्रतिशत बिजली छूट और फायर लाइसेंस शुल्क में पूरी छूट भी मिलती थी।भाजपा सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि ये अनुदान जारी रहेंगे या नहीं।

आयोजकों का कहना है कि सरकारी सहायता के बिना बड़े स्तर की दुर्गा पूजा आयोजित करना मुश्किल होगा, क्योंकि यह उत्सव कारीगरों, सजावट कर्मियों, बिजली कर्मचारियों, परिवहन कामगारों और छोटे व्यापारियों सहित एक विशाल मौसमी अर्थव्यवस्था को सहारा देता है।

भाजपा के लिए बड़ी परीक्षा

त्रिधारा सम्मिलनी के देबाशीष कुमार ने कहा कि सामुदायिक दुर्गा पूजा अब एक बड़े आर्थिक तंत्र में बदल चुकी है और उम्मीद जताई कि नई सरकार भी सहायता जारी रखेगी।यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान कई प्रभावशाली आयोजकों ने खुलकर टीएमसी का समर्थन किया था।कई समितियों ने सोशल मीडिया पर “एई बांग्ला दुर्गार” जैसे नारे चलाए थे और कई आयोजक टीएमसी के लिए प्रचार करते दिखाई दिए थे।लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसे पोस्ट तेजी से गायब हो गए और आयोजकों ने नई सरकार का स्वागत करना शुरू कर दिया।

भाजपा की सावधानीपूर्ण रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती टीएमसी के प्रभाव को कमजोर करना है, लेकिन ऐसा करते समय दुर्गा पूजा से जुड़ी विशाल अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।भाजपा नेता साजल घोष ने कहा कि टीएमसी से जुड़े आयोजकों को “बिना डर” पूजा आयोजित करनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि दुर्गा पूजा “पैसा कमाने का जरिया” नहीं बननी चाहिए।

राजनीतिक टिप्पणीकार अमल सरकार के अनुसार भाजपा के लिए सबसे व्यावहारिक रणनीति सीधा टकराव नहीं, बल्कि धीरे-धीरे सांस्कृतिक प्रभाव स्थापित करना हो सकता है।नई सरकार के कुछ प्रशासनिक फैसलों — जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों पर अधिक जोर और टीएमसी दौर की कुछ ब्रांडिंग हटाने — से यह अटकलें भी तेज हो गई हैं कि आने वाले वर्षों में पूजा थीमों में हिंदू सभ्यता, राष्ट्रवाद और भाजपा समर्थित ऐतिहासिक प्रतीकों पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है।

कुम्हारटोली में मिट्टी संकट

इसी बीच भाजपा सरकार के सामने एक तात्कालिक चुनौती कुम्हारटोली के मूर्ति निर्माताओं की समस्या है।कारीगरों का कहना है कि नदी किनारों और पारंपरिक स्रोतों से मिट्टी लेने पर लगी पाबंदियों के कारण पूजा से पहले मिट्टी की भारी कमी हो गई है।कुम्हारटोली मृत्शिल्पी सांस्कृतिक समिति ने हाल ही में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। समिति ने चेतावनी दी कि मिट्टी की कमी से मूर्ति निर्माण गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।समिति का कहना है कि यह केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि बड़ा आर्थिक मुद्दा भी है, क्योंकि हजारों परिवार मूर्ति निर्माण उद्योग पर निर्भर हैं।

कारीगरों ने चेतावनी दी कि यदि समय पर पर्याप्त मिट्टी उपलब्ध नहीं कराई गई तो कोलकाता और अन्य जिलों की बड़ी पूजाओं के लिए मूर्तियां समय पर तैयार नहीं हो पाएंगी।मिट्टी की कमी के साथ-साथ इसकी कीमतों में भी हाल के सप्ताहों में भारी वृद्धि हुई है, जिससे पहले से आर्थिक दबाव झेल रही कार्यशालाओं की लागत और बढ़ गई है।यह संकट अब भाजपा सरकार के लिए दुर्गा पूजा से जुड़ी अर्थव्यवस्था को संभालने की पहली बड़ी परीक्षा बन गया है।

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