डबल इंजन सरकार की अग्निपरीक्षा, बंगाल का खजाना कितना संभालेगा बोझ?
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डबल इंजन सरकार की अग्निपरीक्षा, बंगाल का खजाना कितना संभालेगा बोझ?

पश्चिम बंगाल की नई BJP सरकार पर चुनावी वादे निभाने का दबाव बढ़ा है। भारी कर्ज और घाटे के बीच DA, वेलफेयर और इंफ्रा खर्च चुनौती बने हैं।


पश्चिम बंगाल में पहली बार बनी भाजपा सरकार अब विपक्ष की राजनीति से निकलकर प्रशासनिक और आर्थिक जिम्मेदारियों की कठिन परीक्षा का सामना कर रही है। चुनाव प्रचार के दौरान किए गए बड़े-बड़े वादों को पूरा करना अब नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है, खासकर ऐसे राज्य में जो पहले से ही भारी कर्ज और बढ़ते राजकोषीय घाटे से जूझ रहा है।

सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर भाजपा सरकार ने साफ कर दिया कि वह पिछली सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को बंद नहीं करेगी। बल्कि कुछ योजनाओं में आर्थिक सहायता की राशि बढ़ाने का भी संकेत दिया गया है। इसके अलावा राज्य सरकार ने सातवें वेतन आयोग को लागू करने और राज्य कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर लाने पर चर्चा शुरू करने के संकेत दिए हैं।इसी के साथ सरकार ने 2026-27 के लिए पूर्ण बजट तैयार करने का निर्देश भी दिया है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर और पूंजीगत खर्च पर विशेष जोर देने की बात कही गई है। सरकार का लक्ष्य औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को भी तेज करना है।

बढ़ते खर्च और वित्तीय दबाव की चुनौती

हालांकि, कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार, वेतन संशोधन, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और औद्योगिक पुनरुद्धार—इन सभी को एक साथ लागू करने की योजना ने अर्थशास्त्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच चिंता बढ़ा दी है। सवाल उठ रहा है कि भारी कर्ज में डूबा राज्य इन वादों के लिए पैसा कहां से लाएगा।पिछली सरकार द्वारा चुनाव से पहले पेश किए गए अंतरिम बजट के अनुसार, 2026-27 के अंत तक पश्चिम बंगाल का कुल कर्ज बढ़कर 8.15 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है।

बजट में लगभग 62,423 करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे का अनुमान लगाया गया था, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का करीब 3 प्रतिशत है। इसके अलावा करीब 21,759 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा भी अनुमानित किया गया था।FRBM (Fiscal Responsibility and Budget Management) नियमों के तहत राज्यों को आमतौर पर अपना राजकोषीय घाटा GSDP के 3 प्रतिशत के आसपास रखना होता है।

DA और सातवें वेतन आयोग से बढ़ेगा बोझ

सरकारी कर्मचारियों के लिए DA समानता लागू करने से राज्य पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ सकता है। पिछली सरकार का अनुमान था कि केवल 4 प्रतिशत DA बढ़ाने पर ही करीब 750 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा।अगर केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर DA दिया जाता है और सातवां वेतन आयोग लागू किया जाता है, तो राज्य का वेतन खर्च कई गुना बढ़ सकता है।

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने राज्य कर्मचारियों को DA समानता, सातवें वेतन आयोग, महिलाओं और युवाओं के लिए बढ़ी हुई आर्थिक सहायता, बड़े पैमाने पर भर्ती और इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च बढ़ाने का वादा किया था।पार्टी ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ के तहत महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये देने का भी वादा किया था। अब सरकार के सामने इन वादों को लागू करने और उनके लिए फंड जुटाने की चुनौती है।

अर्थशास्त्रियों की चिंता

अर्थशास्त्री और कांग्रेस नेता प्रसेनजीत बोस का कहना है कि जब तक केंद्र सरकार से बड़ा वित्तीय सहयोग नहीं मिलता, तब तक भाजपा सरकार के लिए अपने वादे पूरे करना बेहद मुश्किल होगा।उन्होंने कहा, “अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन अगर राज्य की वित्तीय स्थिति में बड़ा सुधार नहीं होता, तो भाजपा सरकार अपने अधिकांश वादे पूरे नहीं कर पाएगी।”उन्होंने यह भी कहा कि राज्य का बड़ा हिस्सा पहले से ही कल्याणकारी योजनाओं और कर्ज चुकाने में खर्च हो रहा है।

अंतरिम बजट में लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये, यानी कुल खर्च का करीब 46 प्रतिशत हिस्सा, सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं के लिए रखा गया था। भाजपा सरकार अगर इन योजनाओं में सहायता राशि बढ़ाती है, तो यह बोझ और बढ़ जाएगा।

कर्ज चुकाने में ही जा रहा बड़ा पैसा

2026-27 में राज्य को करीब 98 हजार करोड़ रुपये कर्ज चुकाने में खर्च करने होंगे। इससे सरकार के पास विकास योजनाओं पर खर्च करने की क्षमता सीमित हो जाती है।एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर सरकार एक साथ कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करती है, DA समानता लागू करती है, भर्ती बढ़ाती है और इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च बढ़ाती है, तो राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ सकता है।”

टैक्स बढ़ाने की भी सीमाएं

GST लागू होने के बाद राज्यों के पास प्रत्यक्ष कर बढ़ाने की सीमित शक्ति रह गई है। गैर-GST राजस्व स्रोतों की बात करें तो पश्चिम बंगाल पहले से ही पेट्रोल, डीजल, शराब, स्टांप ड्यूटी और वाहन करों पर देश के सबसे अधिक टैक्स वाले राज्यों में शामिल है।उदाहरण के तौर पर राज्य में पेट्रोल-डीजल पर 24.21 प्रतिशत VAT लगाया जाता है। ऐसे में टैक्स और बढ़ाना आम जनता में नाराजगी पैदा कर सकता है।

निवेश लाने के लिए नई भूमि नीति की तैयारी

भाजपा सरकार राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए भूमि अधिग्रहण नीति में बदलाव की तैयारी कर रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने बंगाल नेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की बैठक में संकेत दिया कि सरकार पंजाब और हरियाणा मॉडल की तर्ज पर नई भूमि नीति ला सकती है।सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के बाद पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण बेहद संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।

2011 में सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस सरकार ने निजी उद्योगों के लिए सीधे सरकारी भूमि अधिग्रहण से दूरी बनाए रखी थी। कंपनियों को किसानों से सीधे समझौते के जरिए जमीन खरीदने के लिए कहा जाता था।

अब भाजपा सरकार छह महीने के भीतर नई भूमि नीति लाने की तैयारी में है, जिसमें मुआवजे के साथ प्रभावित परिवारों को दीर्घकालिक आय के अवसर देने की बात कही जा रही है।

क्या “डबल इंजन सरकार” सफल होगी?

उद्योग जगत के कुछ लोग मानते हैं कि केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने से निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है और केंद्र से इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग भी आसान हो सकती है।हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक विकास तुरंत नहीं होगा और इससे तत्काल वित्तीय संकट दूर नहीं किया जा सकता। भाजपा के अंदर भी यह स्वीकार किया जा रहा है कि केंद्र से बड़े आर्थिक पैकेज के बिना राज्य सरकार के लिए अपने वादे पूरे करना मुश्किल होगा।

केंद्र सरकार पर पश्चिम बंगाल का ग्रामीण रोजगार और आवास योजनाओं के तहत हजारों करोड़ रुपये बकाया भी बताया जा रहा है। पिछली राज्य सरकार का दावा था कि विभिन्न योजनाओं के तहत केंद्र पर राज्य का कुल बकाया करीब 2 लाख करोड़ रुपये तक है।ऐसे में अब भाजपा सरकार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यह साबित करने की है कि उसका “डबल इंजन सरकार” का नारा वास्तव में राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने में कितना कारगर साबित होता है।

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