
कर्नाटक की राजनीति में उबाल, क्या सिद्धारमैया करेंगे शक्ति प्रदर्शन?
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कांग्रेस में मंथन तेज है। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की दिल्ली बैठक से अटकलें बढ़ गई हैं।
कर्नाटक की सियासत में लंबे समय से चल रहा सत्ता संघर्ष इस हफ्ते निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को नई दिल्ली तलब किया। माना जा रहा है कि यह बैठक नेतृत्व परिवर्तन को लेकर अंतिम दौर की बातचीत थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब कर्नाटक में सत्ता संतुलन को नए तरीके से साधने की कोशिश कर रही है।
चुनाव विश्लेषक संदीप शास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक चंदन गौड़ा और ‘द फेडरल’ के राजनीतिक संपादक पुनीत निकोलस यादव ने इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा की। उनका कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व इस बदलाव को बेहद सावधानी से संभाल रहा है।
देर से लेकिन सोच-समझकर लिया गया फैसला
संदीप शास्त्री ने कहा कि नेतृत्व परिवर्तन काफी समय से तय माना जा रहा था, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने इसे लगातार टालने की कोशिश की। राजस्थान और छत्तीसगढ़ के अनुभवों से कांग्रेस ने सीखा है कि किसी भी बदलाव से पहले मौजूदा मुख्यमंत्री को पूरी तरह विश्वास में लेना जरूरी होता है।उनके मुताबिक, कांग्रेस चाहती थी कि सिद्धारमैया सिर्फ बदलाव को स्वीकार न करें, बल्कि ऐसा लगे कि यह फैसला उनकी सहमति से हो रहा है।
क्या सिद्धारमैया की होगी राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री?
चंदन गौड़ा ने कहा कि पहली नजर में यह मामला बीजेपी के ‘नीतीश कुमार मॉडल’ जैसा लग सकता है, जहां नेता को राज्यसभा भेजकर सत्ता परिवर्तन किया जाता है। लेकिन सिद्धारमैया का मामला अलग हो सकता है।उन्होंने कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे दलितों की आवाज हैं, जबकि सिद्धारमैया राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ा वर्ग (OBC) का बड़ा चेहरा बन सकते हैं। गौड़ा के मुताबिक, मुख्यमंत्री रहते हुए भी सिद्धारमैया नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय नेता की तरह चुनौती देते रहे हैं।
दिल्ली में क्या हुआ?
पुनीत निकोलस यादव ने बताया कि राहुल गांधी और सिद्धारमैया के बीच करीब 40-45 मिनट तक अकेले में बातचीत हुई। हालांकि इस बैठक की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।बैठक के बाद सिद्धारमैया ने दिल्ली आए अपने करीबी मंत्रियों — केजे जॉर्ज, एचसी महादेवप्पा और बायराठी सुरेश — से चर्चा की। इसी दौरान समझौते की रूपरेखा सामने आने लगी। खबर है कि कांग्रेस ने सिद्धारमैया को राज्यसभा सीट की पेशकश की है।
हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व उन्हें जल्दबाजी में फैसला लेने के लिए मजबूर नहीं कर रहा था। सूत्रों के मुताबिक उनसे कहा गया कि वे एक हफ्ता या दस दिन सोच सकते हैं कि उन्हें राज्यसभा जाना है या कर्नाटक की राजनीति में बने रहना है।लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सिद्धारमैया खुद कांग्रेस की अपेक्षा से ज्यादा तेजी से इस्तीफा देने को तैयार दिखे।
सिद्धारमैया की शर्तें
सिद्धारमैया पद छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन बिना शर्त नहीं। उन्होंने साफ किया है कि नई सरकार में ‘अहिंदा’ गठबंधन — यानी अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित समुदाय — का प्रतिनिधित्व कमजोर नहीं होना चाहिए। सिद्धारमैया को इस सामाजिक गठबंधन का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। उन्होंने यह भी इच्छा जताई कि अगला मुख्यमंत्री भी अहिंदा वर्ग से हो। इसके लिए उन्होंने गृह मंत्री जी परमेश्वर का नाम आगे बढ़ाया, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया।यादव के मुताबिक, मुख्यमंत्री चुनने के फैसले में सिद्धारमैया को कोई भूमिका नहीं दी गई।
100 विधायकों के समर्थन का दावा
संदीप शास्त्री ने एक अहम खुलासा करते हुए कहा कि राहुल गांधी के साथ बैठक में सिद्धारमैया ने एक पत्र भी दिखाया, जिसमें कथित तौर पर 100 से ज्यादा कांग्रेस विधायकों का समर्थन उनके पक्ष में बताया गया था। यह कांग्रेस विधायक दल में उनकी मजबूत पकड़ का संकेत माना जा रहा है।
डीके शिवकुमार का लक्ष्य
विश्लेषकों के मुताबिक, डीके शिवकुमार का पूरा फोकस मुख्यमंत्री बनने पर है। उन्हें इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि कितने उपमुख्यमंत्री होंगे, जब तक मुख्यमंत्री पद उनके पास हो। बताया जा रहा है कि समझौते के तहत शिवकुमार कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिए भी तैयार हो गए हैं।
आसान नहीं होगा शिवकुमार का रास्ता
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी शिवकुमार की राह आसान नहीं होगी। यादव का मानना है कि सिद्धारमैया के मौजूदा कार्यकाल में जो मुश्किलें आईं, उनमें शिवकुमार की पर्दे के पीछे की राजनीति की बड़ी भूमिका रही।उनके मुताबिक, भविष्य में सिद्धारमैया भी उसी तरह राजनीतिक दबाव बना सकते हैं, जैसा उन्होंने अपने कार्यकाल में झेला।
जाति जनगणना बन सकती है बड़ी चुनौती
विश्लेषकों ने कहा कि शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जाति जनगणना रिपोर्ट होगी। यह रिपोर्ट लंबे समय से लंबित है और माना जा रहा है कि सिद्धारमैया चाहते हैं कि इसे जल्द सरकार के सामने पेश किया जाए।यह रिपोर्ट पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन आर नाइक के पास है और जल्द सरकार को सौंपी जा सकती है। सवाल यह है कि शिवकुमार इस रिपोर्ट को कैसे संभालेंगे।
जाति जनगणना राहुल गांधी के राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे का भी अहम हिस्सा है। ऐसे में अगर कांग्रेस अपने एकमात्र OBC मुख्यमंत्री को हटाती है और नए नेतृत्व में संतुलन नहीं बना पाती, तो यह पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है।
‘ऑपरेशन लोटस’ का खतरा कितना बड़ा?
चर्चा में बीजेपी के कथित ‘ऑपरेशन लोटस’ का मुद्दा भी उठा। संदीप शास्त्री ने कहा कि फिलहाल कांग्रेस के पास विधानसभा में मजबूत संख्या है, इसलिए बीजेपी के लिए विधायकों को तोड़ना आसान नहीं होगा।हालांकि उन्होंने कांग्रेस के भीतर संभावित बगावत की आशंका जरूर जताई। दूसरी ओर, चंदन गौड़ा ने इस संभावना को खारिज किया कि सिद्धारमैया अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी में जा सकते हैं।
उनके मुताबिक, इतने बड़े पैमाने पर विधायकों का दल बदलना व्यावहारिक नहीं है और शायद बीजेपी भी इतनी बड़ी संख्या में कांग्रेस विधायकों को अपने साथ नहीं लेना चाहेगी।कुल मिलाकर, कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया भले शुरू हो गई हो, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल अभी खत्म होने से काफी दूर नजर आ रही है।

