
केरल-कर्नाटक में कांग्रेस सरकार, पुराने विवादों पर नई उम्मीद
केरल और कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बनने से बांदीपुर, रेलवे और भाषा विवादों के समाधान की उम्मीद बढ़ी, लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं।
केरल में वी.डी. सतीशन के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद अब कांग्रेस की सरकारें केरल और कर्नाटक — दोनों राज्यों में सत्ता में हैं। इससे दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच लंबे समय से लंबित कई विवादों के समाधान की नई उम्मीदें जगी हैं। इन मुद्दों में बांदीपुर में रात के समय यातायात प्रतिबंध, पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील जंगलों से होकर प्रस्तावित रेलवे लाइनें और केरल के कासरगोड जिले में कन्नड़ भाषी समुदायों के भाषा अधिकार जैसे विषय शामिल हैं। हालांकि दोनों राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार होना लाभकारी दिख सकता है, लेकिन इससे कांग्रेस नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि दो कांग्रेस सरकारें भी इन विवादों को नहीं सुलझा पातीं, तो फिर कौन सुलझाएगा?
बांदीपुर में रात के यातायात पर विवाद
सबसे बड़ा विवाद नेशनल हाईवे-766 पर लगे रात के यातायात प्रतिबंध को लेकर है। यह राजमार्ग बांदीपुर टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है और कर्नाटक के कोल्लेगल क्षेत्र को केरल के वायनाड से जोड़ता है। वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए रात 9 बजे से सुबह 6 बजे तक इस मार्ग पर वाहनों के आवागमन पर रोक है। यह इलाका भारत के सबसे संवेदनशील वन गलियारों में माना जाता है। इस मामले पर अंतिम फैसला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
केरल कई वर्षों से इस प्रतिबंध का विरोध करता आ रहा है। उसका तर्क है कि यह राजमार्ग उत्तरी केरल के व्यापार, पर्यटन और संपर्क व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। केरल के कई मुख्यमंत्रियों ने इस प्रतिबंध में ढील देने की कोशिश की, लेकिन कर्नाटक लगातार इसका विरोध करता रहा है।
राजनीतिक दबाव बढ़ा
अब यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक महत्व हासिल कर चुका है क्योंकि दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा वायनाड से लोकसभा सांसद हैं और यदि रात के यातायात प्रतिबंध में ढील मिलती है तो इसका सीधा लाभ वायनाड को होगा। वरिष्ठ कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल भी पहले इस मार्ग पर प्रतिबंध कम करने की मांग उठा चुके हैं।
हालांकि पर्यावरणविदों, वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ताओं और किसान संगठनों का कहना है कि बांदीपुर एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र है और यहां किसी भी तरह की ढील नहीं दी जानी चाहिए।इस विवाद के समाधान के तौर पर जंगल क्षेत्र के नीचे सुरंग (टनल) मार्ग बनाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। लेकिन इसकी व्यवहारिकता, पर्यावरणीय प्रभाव और दोनों राज्यों की सहमति को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं।
रेलवे परियोजनाओं पर भी असमंजस
कांग्रेस सरकारों के सामने केरल और कर्नाटक के बीच दो महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाओं को लेकर भी चुनौती है। पहली परियोजना केरल के नीलांबूर को कर्नाटक के नंजनगुड से जोड़ने वाली 236 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 4,266 करोड़ रुपये है। इससे उत्तरी केरल और मैसूरु के बीच यात्रा समय कम होने की उम्मीद है।
दूसरी प्रस्तावित रेलवे लाइन केरल के थलास्सेरी को कर्नाटक के मैसूरु से जोड़ने की योजना है। लेकिन दोनों परियोजनाएं कोडगु, बांदीपुर और नागरहोल जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों से होकर गुजरती हैं।
पर्यावरण संगठनों ने चेतावनी दी है कि इन परियोजनाओं से वनों की कटाई, वन्यजीवों के आवास में बाधा और पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी को अपूरणीय नुकसान हो सकता है। खुद केरल सरकार ने स्वीकार किया है कि ये परियोजनाएं अभी प्रारंभिक सर्वेक्षण चरण में हैं और इनके लिए विस्तृत व्यवहार्यता रिपोर्ट या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन नहीं हुआ है।
भाषा अधिकारों का मुद्दा
एक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा केरल के कासरगोड जिले में रहने वाले कन्नड़ भाषी समुदायों से जुड़ा है। यह जिला कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र की सीमा से लगा हुआ है।
केरल की पूर्व एलडीएफ सरकार ने एक नीति लागू की थी, जिसके तहत 10वीं कक्षा तक मलयालम भाषा को अनिवार्य बनाया गया। इससे कासरगोड के कन्नड़ भाषी परिवारों में चिंता बढ़ गई थी।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया और कन्नड़ विकास प्राधिकरण के माध्यम से केरल सरकार को पत्र लिखकर कहा कि भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।हालांकि केरल सरकार ने आश्वासन दिया कि नई नीति के तहत कन्नड़ भाषा की शिक्षा और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
इन सभी विवादों ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और वी.डी. सतीशन — दोनों को राजनीतिक रूप से कठिन स्थिति में ला खड़ा किया है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के वायनाड और उत्तरी केरल में मजबूत राजनीतिक हित हैं, जहां संपर्क परियोजनाएं और हाईवे कनेक्टिविटी बड़े मुद्दे हैं।
दूसरी ओर सिद्धारमैया पर पर्यावरण समूहों, कन्नड़ संगठनों और कर्नाटक के मतदाताओं का दबाव है कि राज्य के हितों से समझौता न किया जाए। वहीं सतीशन को केरल के विकास और राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ कर्नाटक की पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण और भाषाई अधिकारों से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ी राजनीतिक सच्चाई को भी उजागर करता है — पड़ोसी राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद, गहरे और पुराने अंतरराज्यीय विवादों का समाधान आसान नहीं होता।

