
सांसदों के बाद अब विधायकों की बारी? उद्धव ठाकरे के सामने बढ़ा सियासी संकट
शिवसेना (UBT) के सांसदों के बाद विधायकों और नगरसेवकों की संभावित टूट की चर्चा तेज है। इससे उद्धव ठाकरे के सामने संगठन बचाने की चुनौती बढ़ गई है।
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में जाने के बाद अब उद्धव ठाकरे के सामने संगठन को बचाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। इसी मुद्दे पर आयोजित एक चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार योगेश पवार और शिवसेना प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े ने संभावित विधायकों और नगरसेवकों की टूट, उसके कारणों और महाराष्ट्र की राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तार से बात की।
ठाकरे की बैठक से चार प्रमुख नेता रहे नदारद
चर्चा में बताया गया कि उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई एक महत्वपूर्ण बैठक में चार प्रमुख नेता शामिल नहीं हुए। इनमें कालिना से विधायक संजय पोटनिस, परभणी के राहुल पाटिल, विधान परिषद सदस्य सुनील शिंदे और वानी के संजय देरकर का नाम शामिल है।इसके अलावा मुंबई और राज्य के अन्य हिस्सों में कई नगरसेवकों के भी शिंदे गुट के संपर्क में होने की खबरें सामने आई हैं। चर्चा में मुंबई महानगरपालिका सहित विभिन्न स्थानीय निकायों में संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण (रीअलाइनमेंट) की संभावना पर भी बात हुई।
कितनी बड़ी है टूट? तस्वीर अभी साफ नहीं
वरिष्ठ पत्रकार योगेश पवार का कहना है कि अभी तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि आखिर कितने नेता शिवसेना (UBT) छोड़कर दूसरे खेमे में जा चुके हैं।उनके मुताबिक फिलहाल स्थिति "धुंधली" बनी हुई है और किसी बड़े पैमाने पर टूट की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि सांसदों के बाद अब विधायकों, नगरसेवकों और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के भी पार्टी छोड़ने की चर्चा तेज हो गई है। पवार ने कहा कि कई नगरसेवकों का रुख उनके स्थानीय विधायकों पर निर्भर करता है। यदि विधायक पार्टी बदलते हैं तो नगरसेवक भी उनके साथ जा सकते हैं।
क्या विकास निधि बन रही है राजनीतिक हथियार?
चर्चा के दौरान विकास कार्यों के लिए मिलने वाली सरकारी निधि का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा।योगेश पवार ने कहा कि यदि विकास निधि के आवंटन का इस्तेमाल नेताओं पर दबाव बनाने और उन्हें पार्टी बदलने के लिए किया जा रहा है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी क्षेत्र को केवल इसलिए कम धनराशि मिले क्योंकि वहां विपक्षी दल का प्रतिनिधि है, तो इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। पवार ने यह भी दावा किया कि कुछ स्थानीय निकायों के बजट में सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रतिनिधियों वाले क्षेत्रों को अधिक संसाधन मिलने के संकेत दिखाई देते हैं।
शिंदे गुट ने फंडिंग के आरोपों को किया खारिज
शिवसेना प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज किया कि नेता केवल विकास निधि या राजनीतिक लाभ के कारण शिंदे गुट में शामिल हो रहे हैं।उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी को व्यापक जनसमर्थन मिला है और लाखों लोग स्वेच्छा से उनके साथ जुड़े हैं। उनके अनुसार केवल जनप्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि ऐसे लोग भी शिंदे के साथ आए हैं जिनका सरकारी फंड या सत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं है।
हेगड़े का दावा था कि कई नेता शिंदे के नेतृत्व और कार्यशैली से प्रभावित होकर उनके साथ जुड़ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य दलों, विशेषकर कांग्रेस के कुछ नेता भी शिंदे खेमे में आने की इच्छा रखते हैं।
पार्टी विस्तार के साथ बढ़ रही हैं चुनौतियां
कृष्णा हेगड़े ने स्वीकार किया कि तेजी से बढ़ती किसी भी राजनीतिक पार्टी के सामने नए लोगों को समायोजित करने की चुनौती खड़ी हो जाती है।उन्होंने कहा कि नए नेताओं और कार्यकर्ताओं को जगह देने के दौरान पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं के हित प्रभावित होने का खतरा रहता है। दूसरी ओर योगेश पवार ने सवाल उठाया कि आखिर कोई भी संगठन कितने लोगों को समायोजित कर सकता है।
क्या उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ गए हैं?
जब चर्चा में यह सवाल उठा कि क्या उद्धव ठाकरे की राजनीतिक ताकत कम हो रही है, तो कृष्णा हेगड़े ने किसी भी नेता को राजनीति में समाप्त मानने से इनकार किया।हालांकि उन्होंने दावा किया कि शिवसेना (UBT) के भीतर कुछ चुनिंदा नेताओं का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की पहुंच उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे तक नहीं रह गई है। हेगड़े के अनुसार यही कारण कई नेताओं के पार्टी छोड़ने के पीछे प्रमुख वजहों में से एक है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पार्टी बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा से दूर चली गई है, जिसके कारण कुछ नेता असहज महसूस कर रहे हैं।
उद्धव ठाकरे के पास अब भी है भावनात्मक समर्थन
योगेश पवार का मानना है कि तमाम राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद उद्धव ठाकरे आज भी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाए हुए हैं।उन्होंने कहा कि बालासाहेब ठाकरे के उत्तराधिकारी होने के कारण उद्धव को अब भी एक विशेष पहचान और समर्थन प्राप्त है। साथ ही पार्टी विभाजन को लेकर लोगों के बीच यह धारणा भी मौजूद है कि उनके साथ राजनीतिक अन्याय हुआ है।हालांकि पवार ने स्पष्ट किया कि केवल सहानुभूति के आधार पर राजनीतिक वापसी संभव नहीं है।
क्या शिवसेना (UBT) कर पाएगी वापसी?
चर्चा के अंत में इस बात पर जोर दिया गया कि यदि शिवसेना (UBT) को फिर से मजबूत होना है तो उसे जमीनी स्तर पर संगठन को पुनर्गठित करना होगा।योगेश पवार के अनुसार पार्टी को कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने, नए समर्थकों को जोड़ने और मतदाताओं के बीच सक्रिय पहुंच बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि योजनाबद्ध तरीके से संगठनात्मक काम किया जाए तो पार्टी के लिए वापसी की संभावनाएं बनी रह सकती हैं।
फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये कथित टूट केवल चर्चा तक सीमित रहती है या फिर राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बनती है।

