‘हर एनओसी की कीमत तय है’, दिल्ली होटल अग्निकांड पर गंभीर आरोप
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‘हर एनओसी की कीमत तय है’, दिल्ली होटल अग्निकांड पर गंभीर आरोप

दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे हादसा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी से हुई मानव-निर्मित हादसा बताया।


दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में 3 जून को लगी भीषण आग में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई, जिनमें अधिकांश विदेशी नागरिक थे। इस त्रासदी ने देश की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के बाद एआई विद संकेत कार्यक्रम में उपहार त्रासदी पीड़ित संघ (AVUT) की अध्यक्ष, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता नीलम कृष्णमूर्ति तथा नागरिक अधिकार कार्यकर्ता एवं हेल्पडेस्क के संस्थापक गौरव बक्शी ने अपनी बेबाक राय रखी। दोनों का कहना था कि भारत में होने वाले अग्निकांड महज दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि भ्रष्टाचार से संचालित एक ऐसी व्यवस्था का नतीजा हैं, जो लोगों की जान की कीमत पर मुनाफा कमाती है।

29 साल बाद भी नहीं बदला सिस्टम

13 जून 1997 को हुए उपहार सिनेमा अग्निकांड में अपने दो बच्चों को खो चुकीं नीलम कृष्णमूर्ति के लिए मालवीय नगर की तस्वीरें किसी पुराने जख्म को फिर से ताजा करने जैसी थीं।उन्होंने कहा, “हम यह सब पहले भी झेल चुके हैं और आज भी झेल रहे हैं। 29 साल बीत गए, लेकिन कुछ भी नहीं बदला।”

नीलम के मुताबिक, हर बड़ी त्रासदी के बाद एक तयशुदा प्रक्रिया दोहराई जाती है। नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, कुछ समय के लिए इमारतों को सील कर दिया जाता है, जांच बैठा दी जाती है, लेकिन जैसे ही लोगों का ध्यान घटना से हटता है, अधिकारियों की वसूली बढ़ जाती है और सब कुछ फिर पहले जैसा चलने लगता है।

उन्होंने कहा कि हर बार नेता कहते हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन बाद में मामला अदालत के हवाले बताकर जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। उनके अनुसार यह पूरा ‘आक्रोश का नाटक’ असल में सच्चाई को दबाने का एक तरीका है।

एनओसी भी बन गई कमाई का जरिया

नीलम कृष्णमूर्ति का मानना है कि समस्या की जड़ नियामक प्रक्रियाओं का व्यावसायीकरण है।उनके अनुसार, जो भवन मालिक अग्नि सुरक्षा नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं, उन्हें रिश्वत देने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन जो नियमों का पालन नहीं करते, उनके लिए सुरक्षा इंतजामों पर खर्च करने के बजाय अधिकारियों को पैसा देना ज्यादा सस्ता पड़ता है।

उन्होंने कहा, “आप करोड़ों रुपये खर्च कर बहुमंजिला होटल बनाते हैं। कुल लागत का सिर्फ तीन से चार प्रतिशत और खर्च करके पूरी अग्नि सुरक्षा व्यवस्था लागू की जा सकती है, लेकिन लोग ऐसा करना नहीं चाहते। हर एनओसी की एक कीमत तय है और यह बात दिल्ली ही नहीं, पूरे देश में सभी जानते हैं।”

नीलम का आरोप है कि अधिकारी केवल रिश्वत लेने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे खुद भवन मालिकों को नियमों में ‘ढील’ देने के तरीके बताते हैं और पैसे लेकर प्रमाणपत्र जारी कर देते हैं। परिणामस्वरूप ईमानदार अनुपालन करने वालों को नुकसान होता है जबकि भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

उपहार मामला: दोषियों को सजा नहीं, इनाम मिला?

नीलम कृष्णमूर्ति ने उपहार अग्निकांड का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार न्यायिक व्यवस्था भी अनजाने में दोषियों को लाभ पहुंचा देती है।उन्होंने बताया कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उपहार सिनेमा मामले में अंसल बंधुओं को उनकी उम्र का हवाला देते हुए जेल से राहत दी थी। बदले में दोनों को दिल्ली सरकार को 30-30 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया गया था, ताकि द्वारका में एक विशेष ट्रॉमा सेंटर बनाया जा सके।

नीलम के अनुसार, दिल्ली सरकार की एजेंसियां—नगर निगम, दिल्ली फायर सर्विस और दिल्ली विद्युत बोर्ड—खुद मूल त्रासदी के लिए जिम्मेदार थीं। ऐसे में दोषी संस्थाओं को दंडित करने के बजाय उन्हें आर्थिक लाभ मिल गया।उन्होंने कहा कि जब 2025 में उन्होंने इस आदेश के पालन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब पता चला कि 60 करोड़ रुपये सरकार के सामान्य बजट में समाहित कर दिए गए और ट्रॉमा सेंटर कभी बना ही नहीं।

'सजा इतनी कम कि डर ही खत्म'

नीलम ने बताया कि उपहार सिनेमा को एनओसी देने वाले एक अग्निशमन अधिकारी को दोषी ठहराया गया था, लेकिन उसे केवल 10 लाख रुपये का जुर्माना भरना पड़ा।उनके मुताबिक, ऐसी मामूली सजा भ्रष्ट अधिकारियों के लिए कोई डर पैदा नहीं करती। वे पहले से मानकर चलते हैं कि अगर कभी पकड़े भी गए तो जुर्माना भरकर बच निकलेंगे।

उन्होंने पूर्व आईपीएस अधिकारी अमोद कंठ का भी जिक्र किया, जिनका नाम उपहार मामले में सामने आया था। नीलम का आरोप है कि सरकारी एजेंसियां अक्सर अपने ही अधिकारियों को बचाने का काम करती हैं।

‘यह भ्रष्टाचार नहीं, संगठित आपराधिक तंत्र है’

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौरव बक्शी ने भी व्यवस्था पर तीखा हमला बोला।उन्होंने कहा कि यह कुछ व्यक्तियों की गलती नहीं, बल्कि एक संगठित आपराधिक नेटवर्क है जिसे नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व ने मिलकर खड़ा किया है।बक्शी के अनुसार, “यह व्यवस्था जानबूझकर ऐसी बनाई गई है कि त्रासदियां हों और उनसे पैसा कमाया जा सके। जब कोई बड़ा हादसा होता है तो भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं के लिए वह कमाई का अवसर बन जाता है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि लाइसेंस और अनुपालन के नाम पर देश के करोड़ों छोटे और मध्यम उद्योगों से वसूली की जाती है और यही पैसा राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ने का साधन बनता है।

लाखों इमारतें बनी हुई हैं ‘टाइम बम’

गौरव बक्शी ने चेतावनी दी कि इस भ्रष्ट तंत्र का सबसे खतरनाक परिणाम यह है कि देश में लाखों इमारतें भवन निर्माण और अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करतीं।उन्होंने कहा, “हम एक विशाल टाइम बम पर बैठे हुए हैं। बड़ी घटनाएं ही मीडिया की सुर्खियां बनती हैं, जबकि छोटी-छोटी आग की घटनाएं हर दिन होती रहती हैं और दब जाती हैं।”उनका मानना है कि जब तक वही लोग सत्ता और प्रशासन में बने रहेंगे जिनकी ईमानदारी पर सवाल हैं, तब तक यह चक्र चलता रहेगा।

क्या बदलाव जरूरी हैं?

नीलम कृष्णमूर्ति ने सुधार के लिए तीन प्रमुख सुझाव दिए—

भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और उदाहरणात्मक सजा। मानव-निर्मित आपदाओं से निपटने के लिए अलग कानून, जिसमें अपराध गैर-जमानती हों और मुकदमे दो वर्षों के भीतर निपटाए जाएं। दोषियों के लिए कम से कम 10 वर्ष की अनिवार्य सजा।उन्होंने कहा कि यदि दो-तीन मामलों में भी ऐसी कठोर कार्रवाई हो जाए तो व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है।

नीलम ने रोमानिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक भीषण अग्निकांड के बाद पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था, जबकि भारत में बार-बार ऐसी घटनाएं होने के बावजूद जवाबदेही तय नहीं होती।

‘ऊपर तक जाता है हफ्ता’

दोनों वक्ताओं का मानना था कि मालवीय नगर का वह होटल, जो छह कमरों के लिए पंजीकृत था लेकिन 25 कमरों का संचालन कर रहा था, स्थानीय प्रशासन की जानकारी के बिना नहीं चल सकता था।नीलम ने कहा कि केवल पार्किंग देखकर ही समझा जा सकता था कि भवन में छह से कहीं अधिक कमरे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने आशंका जताई कि घटना के बाद बंद हुए आसपास के कई होटल कुछ ही हफ्तों में फिर से शुरू हो जाएंगे और भ्रष्टाचार का वही पुराना खेल दोबारा चलने लगेगा।गौरव बक्शी ने कहा, “जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है। हमारी जान और हमारे पैसे की कीमत पर कुछ लोग मौज कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि लोग समझें कि उनके साथ खुलेआम धोखा किया जा रहा है।”

मालवीय नगर अग्निकांड ने एक बार फिर भारत में अग्नि सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार के मुद्दों को केंद्र में ला दिया है। नीलम कृष्णमूर्ति और गौरव बक्शी का मानना है कि जब तक भ्रष्टाचार के पूरे तंत्र पर सख्त प्रहार नहीं किया जाएगा और दोषियों को कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी त्रासदियां बार-बार होती रहेंगी और निर्दोष लोगों की जान जाती रहेगी।

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