
क्या खत्म हो जाएगी लुटियंस दिल्ली की पहचान? जिमखाना क्लब पर विवाद
दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद ने विरासत संरक्षण, पर्यावरण, विशेषाधिकार और पुनर्विकास को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से यह आश्वासन दिए जाने के बाद कि दिल्ली जिमखाना क्लब (Delhi Gymkhana Club) को जबरन खाली नहीं कराया जाएगा और पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाएगा, इस मुद्दे पर बहस और तेज हो गई है। अब चर्चा सिर्फ एक क्लब तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि विरासत संरक्षण, अभिजात्य संस्कृति, सार्वजनिक उपयोग और पुनर्विकास जैसे बड़े सवालों तक पहुंच चुकी है।
इसी विषय पर कैपिटल बीट में भारतीय इतिहासकार और लेखिका स्वप्ना लिडल (Swapna Liddle) ने क्लब के ऐतिहासिक महत्व, विशेषाधिकार बनाम संरक्षण की बहस, पर्यावरणीय प्रभाव और संस्थागत सुधारों पर विस्तार से अपनी राय रखी।
दिल्ली की राजधानी बनने से जुड़ा है क्लब का इतिहास
स्वप्ना लिडल ने बताया कि दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 1913 में हुई थी और इसका सीधा संबंध कोलकाता से दिल्ली में राजधानी स्थानांतरित होने से था। जब दिल्ली भारत की राजधानी बनी, तब यहां बड़े पैमाने पर नौकरशाही ढांचा विकसित हुआ। शुरुआती दौर में क्लब सिविल लाइंस इलाके में स्थित था, जो उस समय अस्थायी राजधानी का केंद्र माना जाता था।
बाद में जब आज का एनडीएमसी क्षेत्र विकसित हुआ, तब इस भवन का निर्माण भी शुरू हुआ। निर्माण कार्य मुख्य रूप से 1928 तक चला और 1929 में क्लब को वर्तमान स्थान पर खोला गया। इस वजह से यह भवन और परिसर ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
आजादी के बाद बदला क्लब का स्वरूप
उन्होंने कहा कि क्लब का चरित्र हमेशा एक जैसा नहीं रहा। शुरुआती समय में यह पूरी तरह ब्रिटिश अभिजात्य वर्ग का क्लब था, लेकिन धीरे-धीरे भारतीयों को भी सदस्यता मिलने लगी। आजादी के बाद इसका नाम इम्पीरियल जिमखाना क्लब से बदलकर दिल्ली जिमखाना क्लब कर दिया गया।लिडल के अनुसार, विरासत स्थिर नहीं होती बल्कि समय के साथ संस्थाएं बदलती और विकसित होती हैं।
क्या सिर्फ क्लब ही विशेषाधिकार का प्रतीक है?
इस सवाल पर कि अगर जिमखाना क्लब को विशेषाधिकार का प्रतीक मानकर निशाना बनाया जा रहा है, तो क्या लुटियंस दिल्ली की अन्य संस्थाओं की भी समीक्षा होनी चाहिए, लिडल ने कहा कि यह पूरी तरह वैध तर्क है।
उन्होंने कहा कि क्लब की सदस्यता को सीधे विशेषाधिकार से जोड़ना सही नहीं होगा। यहां सेवानिवृत्त सेना अधिकारी, नौकरशाह और अन्य लोग जुड़े हुए हैं। हालांकि देश की आम आबादी की तुलना में यह एक विशेष वर्ग हो सकता है, लेकिन लुटियंस दिल्ली के सरकारी बंगले भी इसी श्रेणी में आते हैं।
विरासत के साथ पर्यावरण का भी मुद्दा
स्वप्ना लिडल ने जोर देकर कहा कि यह विवाद केवल क्लब संस्था का नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक इमारतों और हरित परिसर का भी है। दिल्ली भवन उपनियमों के तहत इस परिसर को संरक्षित विरासत घोषित किया गया है और 2010 में एनडीएमसी ने इसे आधिकारिक रूप से हेरिटेज बिल्डिंग के रूप में अधिसूचित किया था।
उन्होंने कहा कि इस परिसर में बड़ी संख्या में पुराने पेड़ और खुले हरे क्षेत्र मौजूद हैं, जो प्रदूषण और बढ़ते तापमान से जूझ रही दिल्ली के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
बार-बार पुनर्विकास पर उठे सवाल
लिडल ने कहा कि नई दिल्ली के इलाकों का लगातार पुनर्विकास चिंता का विषय है। उन्होंने किदवई नगर और नौरोजी नगर पुनर्विकास परियोजनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि इन परियोजनाओं में बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए।उनका मानना है कि अगर यहां भी पुनर्विकास होता है तो पर्यावरणीय नुकसान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सार्वजनिक उद्देश्य की परिभाषा पर सवाल
सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि भूमि सार्वजनिक उद्देश्य, संभवतः रक्षा परियोजना, के लिए आवश्यक है। इस पर लिडल ने कहा कि “सार्वजनिक उद्देश्य” का मतलब केवल सरकार की इच्छा नहीं हो सकता।उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस बात पर कोई व्यापक चर्चा हुई कि यह संस्थान जनता के लिए और बेहतर तरीके से कैसे काम कर सकता है? उनके अनुसार, बिना संवाद के सिर्फ सरकारी निर्णय को सार्वजनिक हित मान लेना सही नहीं है।
सुधार हो, लेकिन संवाद के जरिए
विशेषाधिकार और विशिष्टता की बहस पर उन्होंने कहा कि संस्थाएं समय के साथ बदलती हैं और उनमें सुधार संभव है। क्लब को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर लाइब्रेरी, खेल सुविधाएं और अन्य सेवाएं अधिक लोगों के लिए खोली जा सकती हैं।उन्होंने सुझाव दिया कि सदस्यता के अलग-अलग स्तर बनाए जा सकते हैं ताकि अधिक लोग इन सुविधाओं का लाभ उठा सकें। लेकिन यह बदलाव सरकारी दबाव से नहीं बल्कि संवाद और सहमति से होने चाहिए।
कर्मचारियों और सदस्यों की चिंता भी अहम
लिडल ने कहा कि क्लब से जुड़े करीब 600 कर्मचारियों और लगभग 14,000 सदस्यों का भविष्य भी इस विवाद का महत्वपूर्ण पहलू है। उनके अनुसार, यह धारणा गलत है कि क्लब से जुड़े सभी लोग अत्यधिक संपन्न वर्ग से आते हैं।कई सदस्य ऐसे हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी सरकारी सेवा में बिताई और अब पेंशन पर जीवन यापन कर रहे हैं। उनके लिए यह क्लब केवल एक सामाजिक स्थान नहीं बल्कि सामाजिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण माध्यम है।
क्या गाजियाबाद शिफ्ट होने पर खत्म हो जाएगी यह संस्कृति?
जब उनसे पूछा गया कि अगर क्लब को गाजियाबाद जैसे किसी दूर इलाके में स्थानांतरित किया गया तो क्या इसकी मौजूदा संस्कृति खत्म हो जाएगी, उन्होंने कहा कि इससे क्लब की पहचान और व्यवहारिकता दोनों पर बड़ा असर पड़ेगा।उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में क्लब पहले जैसा प्रभावी और सक्रिय नहीं रह पाएगा।

