
AAP नेताओं पर अवमानना कार्रवाई, दिल्ली HC में कानूनी घमासान
दिल्ली हाईकोर्ट ने आबकारी नीति मामले में केजरीवाल की सुनवाई दूसरी बेंच को सौंपी, AAP नेताओं पर अदालत की अवमानना नोटिस भी जारी हुआ।
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आखिरकार वह राहत मिल गई, जिसे वह कानूनी आधार पर हासिल नहीं कर पाए थे। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वराना कांता शर्मा ने 14 मई को दिल्ली आबकारी नीति मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की पुनर्विचार याचिका को दूसरी बेंच के पास भेजने का फैसला किया।
दिलचस्प बात यह है कि तीन हफ्ते पहले इसी मामले में जब केजरीवाल ने उनसे खुद को अलग करने की मांग की थी, तब जस्टिस शर्मा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। लेकिन अब उन्होंने खुद ही यह मामला दूसरी बेंच को सौंपने का निर्णय लिया। इसकी वजह बनी अदालत की अवमानना (क्रिमिनल कंटेम्प्ट) की कार्रवाई, जो उन्होंने केजरीवाल और AAP के पांच अन्य नेताओं के खिलाफ शुरू की है।
क्या है पूरा मामला?
जस्टिस शर्मा ने अपने 68 पन्नों के आदेश में पूरे घटनाक्रम का विस्तार से उल्लेख किया है।9 मार्च को उन्होंने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाई थी, जिसमें CBI और जांच अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं। इसके दो दिन बाद कुछ आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मामला दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की मांग की।
मुख्य न्यायाधीश ने यह मांग खारिज कर दी। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और विशेष अनुमति याचिका (SLP) तथा रिट याचिका दायर की, लेकिन बाद में बिना सुनवाई के ही दोनों याचिकाएं वापस ले ली गईं।इसके बाद ही जस्टिस शर्मा के सामने खुद को मामले से अलग करने की मांग रखी गई।
केजरीवाल की ओर से क्या तर्क दिए गए?
मार्च के अंत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, विजय नायर, अरुण पिल्लई और चनप्रीत सिंह रायत ने जस्टिस शर्मा के खिलाफ रिक्यूजल एप्लिकेशन दाखिल की।
इसमें तीन मुख्य आधार बताए गए:
जस्टिस शर्मा ने 9 मार्च को CBI और जांच अधिकारी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों पर रोक लगाई थी। उनके बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में शामिल है और उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए केस मिलते हैं, जो इस मामले में CBI की ओर से पेश हो रहे थे। उन्होंने 2022 से 2025 के बीच अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा संगठन माना जाता है।
20 अप्रैल को दिए गए 115 पन्नों के आदेश में जस्टिस शर्मा ने इन सभी आधारों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आधारों पर खुद को अलग करना “बेंच हंटिंग” को बढ़ावा देगा।
फिर क्या हुआ?
रिक्यूजल याचिका खारिज होने के बाद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट नहीं गए। इसके बजाय 27 अप्रैल को उन्होंने, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने जज को पत्र लिखकर कहा कि वे इस मामले की कार्यवाही का बहिष्कार करेंगे और न तो खुद पेश होंगे, न ही अपने वकीलों को भेजेंगे।इसके बाद सोशल मीडिया पर कई पोस्ट सामने आए, जिन्हें जस्टिस शर्मा ने प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना माना।
अदालत की अवमानना का नोटिस
14 मई को जस्टिस शर्मा को केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त करना था, क्योंकि वे कोर्ट में पेश नहीं हो रहे थे। लेकिन उसी दिन उन्होंने छह AAP नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी।
अपने आदेश में उन्होंने AAP नेता सौरभ भारद्वाज की 10 मार्च की प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी जिक्र किया, जिसमें भारद्वाज ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया था कि एक मौजूदा जज का भाजपा से क्या संबंध है।जस्टिस शर्मा ने कहा कि इन सभी घटनाओं का सामूहिक प्रभाव अदालत को बदनाम करने वाले एक संगठित अभियान जैसा था।हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि ये केवल प्रथम दृष्टया टिप्पणियां हैं और अंतिम फैसला अवमानना की सुनवाई के बाद होगा।
“यह रिक्यूजल नहीं, न्यायिक अनुशासन है”
इसके बाद जस्टिस शर्मा ने मुख्य मामले पर सुनवाई की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने उनसे मामला अपने पास बनाए रखने का आग्रह किया। उनका कहना था कि रिक्यूजल याचिका खारिज होने के बाद आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था। लेकिन जस्टिस शर्मा ने कहा कि जिस जज ने किसी आरोपी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की हो, वह उसी आरोपी के मुख्य मामले की सुनवाई नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने मामला दूसरी बेंच को भेजने का फैसला किया।
उन्होंने अपने आदेश में लिखा, “यह रिक्यूजल नहीं है। यह न्यायिक अनुशासन है।”यानी उनके अनुसार यह फैसला रिक्यूजल याचिका के दबाव में नहीं लिया गया, बल्कि अवमानना की कार्रवाई शुरू होने के बाद न्यायिक मर्यादा बनाए रखने के लिए लिया गया।
अब आगे क्या होगा?
अब मुख्य मामला और अवमानना दोनों ही दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिए गए हैं, जो इन्हें नई बेंच को सौंपेंगे।नई बेंच जस्टिस शर्मा के 68 पन्नों के आदेश को आधार बनाकर आगे की सुनवाई करेगी। इसमें उन्होंने कहा है कि सोशल मीडिया अभियान अदालत की आलोचना नहीं बल्कि उसकी छवि खराब करने की कोशिश थी।उन्होंने यह भी कहा कि एक वीडियो को एडिट करके उनका मजाक उड़ाया गया और जज को राजनीतिक रूप से पक्षपाती दिखाने की कोशिश की गई।हालांकि आरोपियों को अपनी सफाई देने का पूरा मौका मिलेगा और नई बेंच स्वतंत्र रूप से फैसला करेगी।
‘सत्याग्रह’ पर अदालत की टिप्पणी
अपने आदेश में जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द “सत्याग्रह” पर भी टिप्पणी की।उन्होंने कहा कि सत्याग्रह का अर्थ है “सत्य पर दृढ़ रहना।” संवैधानिक व्यवस्था में इसका मतलब यह है कि यदि किसी को अपने पक्ष की सच्चाई पर भरोसा है तो वह ऊपरी अदालत में जाए, न कि अदालत के बाहर जनमत बनाकर न्यायाधीश को कटघरे में खड़ा करे।
जस्टिस शर्मा के अनुसार, आरोपियों ने फैसले को चुनौती देने के बजाय जज की छवि खराब करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि किसी फैसले को चुनौती देना अधिकार है, लेकिन अदालत को बदनाम करना स्वीकार्य नहीं है।
राजनीतिक और कानूनी असर
राजनीतिक नजरिए से देखें तो अरविंद केजरीवाल को आखिरकार वह मिल गया, जिसकी वे मांग कर रहे थे — यानी मामला दूसरी बेंच में चला गया।लेकिन इसके साथ ही उन्हें अदालत की अवमानना का नोटिस भी मिला है, जिसका सामना अब उन्हें नई बेंच में करना होगा।अंततः यह मामला संभवतः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा, जहां यह तय होगा कि अदालत की गरिमा और राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमाएं कहां तक जाती हैं।

