
बचपन पर लू के थपेड़ों का हमला, दिल्ली के स्कूलों में दम तोड़ती पढ़ाई
दिल्ली में बढ़ती गर्मी और प्रदूषण बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर असर डाल रहे हैं, जबकि स्कूल सिस्टम अब भी बदलाव से दूर है।
“अब मेरा स्कूल जाने का मन नहीं करता,” दिल्ली के एक स्कूल में कक्षा 5 के छात्र 11 वर्षीय निशांत (केवल पहला नाम इस्तेमाल किया गया है) शिकायत करते हुए कहते हैं। “सुबह से ही धूप बहुत तेज़ हो जाती है और कक्षा में गर्मी असहनीय होती है। हमें लंच ब्रेक में बाहर खेलने भी नहीं दिया जाता; शिक्षक रोक देते हैं।”
पिछले सप्ताह दिल्ली के शिक्षा निदेशालय (DoE) ने घोषणा की कि राष्ट्रीय राजधानी के सरकारी स्कूल 11 मई से 30 जून तक गर्मी की छुट्टियों के लिए बंद रहेंगे। हालांकि, कक्षा 9, 10 और 12 के छात्रों के लिए 11 मई से 23 मई तक विशेष कक्षाएं आयोजित की जाएंगी। वहीं, सूत्रों के अनुसार दिल्ली के निजी स्कूल छुट्टियों को लेकर अपने स्तर पर निर्णय ले सकते हैं, और कुछ स्कूल मई के बाद के दिनों में बंद होने का विकल्प चुन रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रीय राजधानी अप्रैल में ही हीटवेव जैसी परिस्थितियों का सामना कर चुकी थी, जब तापमान कई बार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। इससे एक अहम सवाल उठता है — क्या दिल्ली की स्कूल व्यवस्था अब भी ऐसे मौसम के लिए बनाई गई है, जो अब अस्तित्व में ही नहीं रहा?
अप्रैल-मई की भीषण गर्मी से लेकर नवंबर की जहरीली हवा तक, दिल्ली के स्कूली बच्चे अब ऐसे शैक्षणिक वर्ष से गुजर रहे हैं जो पढ़ाई की लय से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चरम स्थितियों से तय होता है। गर्मियों में कक्षाएं शारीरिक कष्ट का स्थान बन जाती हैं — सिरदर्द, डिहाइड्रेशन, नकसीर और यहां तक कि बेहोशी भी अब असामान्य नहीं रह गई है। अधिकांश कक्षाओं में एयर कंडीशनर नहीं हैं। दो-तीन छत के पंखे 30 या उससे अधिक छात्रों से भरे कमरे को ठंडा करने की कोशिश करते हैं, जबकि गर्मी उससे कहीं तेजी से जमा होती है जितनी तेजी से बाहर निकल सकती है।
कुछ बदलाव अन्य राज्यों में देखने को मिल रहे हैं — यहां तक कि पड़ोसी नोएडा में भी। इनमें स्कूल का समय जल्दी शुरू करना और स्कूल के घंटे कम करना शामिल है। ये समाधान भले ही पूर्ण नहीं हैं, लेकिन बदलती परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया देने की इच्छा को दर्शाते हैं। सवाल यह नहीं कि ये कदम पर्याप्त हैं या नहीं, बल्कि यह है कि दिल्ली जैसे शहर में, जहां देश की सबसे कठिन परिस्थितियां मौजूद हैं, ऐसी चर्चाएं कार्रवाई में क्यों नहीं बदल पातीं।
संरचनात्मक बदलावों के अभाव में फिलहाल छोटे-छोटे उपाय ही अंतर भरने की कोशिश कर रहे हैं — हर घंटे पानी पीने की घंटी, बच्चों को पानी पीने की याद दिलाना, यह जांचना कि वे भरी हुई बोतल लेकर आए हैं या नहीं, और कभी-कभी घर जाने से पहले ओआरएस देना। ये कदम जोखिम को स्वीकार करते हैं, लेकिन उसे कम नहीं करते। ये ऐसे सिस्टम में अस्थायी सुरक्षा उपाय हैं जो मूल रूप से अब भी अपरिवर्तित है।
दिल्ली के ओखला फेज-2 स्थित एक सरकारी बालिका विद्यालय की कक्षा 9 की छात्रा 14 वर्षीय जिया (पहला नाम ही इस्तेमाल किया गया है) कहती हैं, “मैं स्कूल में अपने साथ पानी की दो बोतलें लेकर जाती हूं।” वह यह भी बताती हैं कि जब कोई छात्रा बीमार पड़ती है तो क्या होता है: “जब किसी की तबीयत खराब होती है, तो शिक्षक उसे सिर नीचे रखकर चुपचाप बैठने के लिए कहते हैं।”
यह बेहद असहज करने वाली बात है कि ये प्रतिक्रियाएं अब कितनी सामान्य हो गई हैं। कक्षा में किसी बच्चे का चक्कर महसूस करना अब सिस्टम को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं रहा।यह परेशानी केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी के एक निजी स्कूल में कक्षा 2 के छात्र 8 वर्षीय संस्कार कहते हैं, “हमारी कक्षाओं में सिर्फ पंखे हैं, कूलर नहीं। एयर कंडीशनर केवल प्रिंसिपल के कमरे में है।”
सर्दियों तक यही बच्चे मास्क पहनकर कक्षाओं में बैठे रहते हैं और जहरीली हवा में सांस लेते हैं। धीरे-धीरे स्कूल का पूरा दिन ही जीवित रहने की रणनीति में बदलता जा रहा है — धूप से बचना, कम चलना-फिरना, पंखों के नीचे चुपचाप बैठना और गर्मी के कम होने का इंतजार करना। सर्दियों में यही बच्चे घरों के भीतर सीमित हो जाते हैं, जहां प्रदूषित हवा उनकी ऊर्जा और ध्यान क्षमता को प्रभावित करती है। यहां परेशानी शांत दिखती है — लगातार खांसी, आंखों में जलन, इनहेलर और नेबुलाइजर के पीछे छिपी हुई — लेकिन इसका असर कहीं अधिक गहरा और लंबे समय तक रहता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्थितियों को अब भी मौसमी व्यवधान की तरह देखा जा रहा है, जबकि वास्तव में ये वे परिस्थितियां बनती जा रही हैं जिनमें बच्चों को पढ़ाई जारी रखनी पड़ रही है।दो स्कूली बच्चों की मां और विशेषज्ञ डॉक्टर डॉ. रेश्मी राजन कहती हैं, “मानव शरीर जलवायु परिवर्तन पर संस्थाओं से कहीं पहले प्रतिक्रिया देता है। अत्यधिक गर्मी और खराब वायु गुणवत्ता के दौरान बच्चों में थकान, सिरदर्द, डिहाइड्रेशन, सांस लेने में तकलीफ और ध्यान में कमी जैसे लक्षण बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन इन्हें अब भी मौसमी असुविधा मानकर नजरअंदाज किया जाता है।”
अक्सर जो बात छूट जाती है, वह है इसका लगातार जमा होने वाला असर। बच्चा केवल “कुछ दिन की पढ़ाई मिस” नहीं कर रहा होता या “मौसम के अनुसार खुद को ढाल” नहीं रहा होता। उसका शरीर लगातार चरम स्थितियों के बीच झूलता रहता है — गर्म कक्षाएं, प्रदूषित हवा और घर-बाहर के वातावरण में अचानक बदलाव। इसका असर मन पर भी पड़ता है। थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान में कमी व्यवहार संबंधी समस्याएं नहीं, बल्कि अस्थिरता की प्रतिक्रियाएं हैं।
मनोचिकित्सक नयामत बावा कहती हैं, “बच्चों पर जलवायु तनाव का मनोवैज्ञानिक असर अक्सर तब तक सूक्ष्म रहता है जब तक वह स्पष्ट रूप से दिखाई न देने लगे। बच्चे हमेशा अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, लेकिन यह चिड़चिड़ापन, थकान, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, खराब नींद या स्कूल न जाने की इच्छा के रूप में सामने आता है। जब बच्चा लंबे समय तक शारीरिक असुविधा या चिंता में रहता है, तो पढ़ाई खुद ही थका देने वाली लगने लगती है।”
बच्चों के लिए यह जोखिम स्कूल के गेट पर खत्म नहीं होता। उनका स्कूल का दिन पूरे शहर से होकर गुजरता है — तपती सड़कों, ट्रैफिक से भरे रास्तों और ऐसे वातावरण के बीच, जो मौसम जितना ही बुनियादी ढांचे से भी प्रभावित होता है। वाहनों से निकलने वाला धुआं शहरी प्रदूषण का बड़ा कारण बना हुआ है, जबकि कंक्रीट की सतहें गर्मी को फंसा कर “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव को बढ़ाती हैं। यानी एक बच्चे का स्कूल दिवस अब प्राकृतिक नहीं, बल्कि कृत्रिम जलवायु के भीतर बीतता है।
विशेषज्ञ डॉ. उमामहेश्वरन राजसेकर कहते हैं, “हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि भारत के कई बड़े शहरों में हरित क्षेत्र 12–18 प्रतिशत के उस मानक से कम है जिसकी सिफारिश URDPFI दिशानिर्देश 2014 में की गई है। हरियाली में कमी और कंक्रीट की सतहों में वृद्धि शहरों को और गर्म बना रही है। तापमान बढ़ने के साथ एयर कंडीशनिंग की मांग भी बढ़ती है, जिससे जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन के कारण उत्सर्जन और बढ़ जाता है।”
दिल्ली के कुछ हिस्सों में हरियाली जरूर है, लेकिन उसका वितरण असमान है। इससे शहर खुद ही समस्या का हिस्सा बन जाता है। बच्चों के लिए ये संरचनात्मक विफलताएं बहुत प्रत्यक्ष रूप में महसूस होती हैं।दिल्ली के हरकेश नगर स्थित एक सरकारी स्कूल की कक्षा 8 की छात्रा 13 वर्षीय सिदरा शिकायत करती हैं, “हमारे स्कूल में बड़े पेड़ नहीं हैं जहां हम लंच के समय बैठकर आराम कर सकें।”
शिक्षक भी इसी संकट में फंसे हुए हैं। बदरपुर क्षेत्र के एक निजी स्कूल की शिक्षिका अंजलि भाटी कहती हैं कि मौसम की चरम स्थितियों से निपटने को लेकर होने वाली चर्चाओं में शिक्षकों से शायद ही कभी सलाह ली जाती है।वह कहती हैं, “गर्मी निश्चित रूप से समस्या है। हम अक्सर सोचते हैं कि स्कूल 50 प्रतिशत क्षमता के साथ एक दिन छोड़कर कक्षाएं चला सकते हैं, ताकि कक्षाओं में बच्चों की संख्या कम रहे। कम से कम तब बच्चों को पंखे के नीचे बैठने की जगह तो मिलेगी।”
किसी ठोस उपाय के अभाव में शिक्षक भी गर्मी, प्रदूषण, बिगड़े हुए समय-सारणी और कठोर शैक्षणिक कैलेंडर से जूझ रहे हैं, जबकि उन पर पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव बना रहता है।हर सर्दी में शैक्षणिक कैलेंडर को पुनर्गठित करने पर चर्चाएं होती हैं — पढ़ाई के दिनों को आगे खिसकाना, वार्षिक समारोह और खेल प्रतियोगिताएं पहले कराना, सर्दियों की छुट्टियां बढ़ाना और ऑनलाइन-ऑफलाइन पढ़ाई के बीच की अनिश्चितता को कम करना। लेकिन इससे पहले कि ऐसा ढांचा स्थिर हो, गर्मियां आ जाती हैं और हीटवेव फिर से वही सवाल खड़े कर देती है।प्रणाली दो संकटों के बीच झूलती रहती है, बिना किसी सार्थक अनुकूलन के।
इन परिस्थितियों का बोझ आखिरकार घरों तक पहुंचता है, खासकर माताओं के लिए यह एक मौन निराशा का कारण बनता जा रहा है। दक्षिण दिल्ली के एक निजी स्कूल में पढ़ने वाली सात वर्षीय बच्ची की मां रुबानी कपूर कहती हैं कि अपने बच्चे को अत्यधिक गर्मी और थकावट से जूझते देख वह खुद को “पूरी तरह असहाय” महसूस करती हैं।वह कहती हैं, “बच्चे गर्म माथे और पूरी थकान के साथ घर लौटते हैं। मेरी बच्ची अक्सर बताती है कि उसे शिक्षक से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है ताकि वह पंखे के नीचे बैठ सके।”
कपूर के अनुसार अभिभावकों में यह डर बढ़ रहा है कि बच्चे कक्षा में ठीक से ध्यान नहीं लगा पा रहे और अधूरा काम लेकर घर लौट रहे हैं क्योंकि शारीरिक असुविधा असहनीय हो चुकी है।“मेडिकल रूम के चक्कर अब आम हो गए हैं। किसी को उल्टी हो रही है, किसी को तेज बुखार है और किसी को चक्कर आ रहे हैं। यहां तक कि नकसीर भी अब बहुत आम हो गई है।”
वह पूछती हैं, “ऐसी स्थिति में माता-पिता आखिर करें तो क्या करें? जब गर्मी और धुंध ही बच्चे की बैठने, पढ़ने और स्कूल का दिन निकालने की क्षमता तय करने लगें, तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है।”यहां तक कि स्कूल यूनिफॉर्म जैसी सामान्य चीज भी अब दिखाती है कि संस्थान पुराने मौसम को ध्यान में रखकर बनाए गए थे।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिज़ाइन, अहमदाबाद की टेक्सटाइल डिज़ाइन फैकल्टी सुचरिता बेनीवाल कहती हैं, “स्कूल यूनिफॉर्म पारंपरिक रूप से टिकाऊपन, कम लागत और आसान रखरखाव को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं। लेकिन अब मौसम तेजी से बदल रहा है। जब बच्चे दिन में छह से आठ घंटे यात्रा, असेंबली, खेलकूद और अत्यधिक गर्मी में कक्षा में बिताते हैं, तो आराम और सांस लेने योग्य कपड़े अब द्वितीयक नहीं रह सकते।”जलवायु परिवर्तन के दबाव में पूरा शैक्षणिक वर्ष ही टूटता हुआ नजर आ रहा है — हीटवेव से बाधित और प्रदूषण से सिमटा हुआ।
मनोवैज्ञानिक अनुश्री शुक्ला कहती हैं, “बचपन का मतलब नियमित दिनचर्या होता है। जलवायु परिवर्तन सबसे पहले इसी नियमितता को तोड़ता है। स्कूल बंद होते हैं, समय-सारणी अनिश्चित हो जाती है। इससे चिंता, चिड़चिड़ापन और ध्यान में कमी आती है। बाहरी खेल भी बाधित होते हैं, जिसका बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।”
यह व्यवधान हर बच्चे के लिए समान नहीं है। कुछ संपन्न निजी स्कूलों के बच्चे एयर-कंडीशंड कक्षाओं, साफ हवा और हरियाली वाले परिसरों में पढ़ते हैं। बाकी बच्चों के लिए शिक्षा अब एक और संघर्ष बनती जा रही है।
दक्षिण दिल्ली की एक निजी स्कूल शिक्षिका निधि एम. (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि लगातार पर्यावरणीय व्यवधान बच्चों के सीखने से जुड़ाव को धीरे-धीरे प्रभावित करते हैं। वह कहती हैं, “खेल की कक्षा का रद्द होना ऐसा लगता है जैसे बच्चों से उनका बचपन छीन लिया गया हो।”
उनके अनुसार पानी के ब्रेक और सतर्कता जैसे उपाय मदद करते हैं, लेकिन अधिक व्यापक और प्रणालीगत बदलाव की जरूरत है। वह स्कूलों और दफ्तरों के समय में बदलाव की वकालत करती हैं ताकि परिवार और संस्थान मिलकर बच्चों के लिए सुरक्षित शिक्षण वातावरण बना सकें।
अधिकांश लोग अब भी जलवायु परिवर्तन को भविष्य का खतरा मानते हैं। लेकिन दिल्ली की कक्षाओं में यह पहले ही बच्चों के शरीर और जीवन में प्रवेश कर चुका है। और जैसे-जैसे गर्मी, प्रदूषण और सुरक्षा तक असमान पहुंच शिक्षा के अनुभव को बदल रही है, सवाल यह है कि कितने बच्चों को धीरे-धीरे सीखने के समान अवसर से वंचित किया जा रहा है, केवल इसलिए क्योंकि हमारी शैक्षणिक व्यवस्था अब भी उस वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पाई है।

