
सुधार या सज़ा? सरकारी स्कूलों की तालाबंदी से क्यों बेहाल हैं गरीब छात्र और उनके माता-पिता?
कर्नाटक की नई 'KPS मैग्नेट स्कूल' योजना ने देश भर में सरकारी स्कूलों के विलय पर बहस छेड़ दी है। भाग एक में बताएंगे कि क्या संसाधनों की बचत के नाम पर छोटे स्कूलों को बंद करना सही है? सरकार का तर्क है कि छोटे और कम संसाधनों वाले स्कूलों को जोड़कर एक बड़ा 'हब' बनाने से शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी।
कर्नाटक सरकार की नई "KPS मैग्नेट स्कूल" (KPS Magnet Schools) पहल ने देश की शिक्षा व्यवस्था में एक गंभीर और पुरानी बहस को फिर से शुरू कर दिया है। सरकार की योजना है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक बड़ा स्कूल बनाया जाए, जिसमें आसपास के 8 से 10 छोटे स्कूलों का विलय कर दिया जाए। यह योजना 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूलों को एक छत के नीचे लाने की बात करती है। लेकिन क्या यह 'बड़ा' मॉडल वाकई शिक्षा की गुणवत्ता को 'बेहतर' बनाएगा? शिक्षक संगठनों, कार्यकर्ताओं और छात्र समूहों का विरोध कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।
नामांकन में भारी गिरावट: एक डरावना सच
सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में लगातार आ रही गिरावट इस पूरी योजना का मुख्य आधार है। 'यूनाइटेड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन' (UDISE+) के आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में सरकारी स्कूलों में कुल नामांकन 13.62 करोड़ था, जो 2024-25 तक घटकर 12.15 करोड़ रह गया है। यानी मात्र तीन वर्षों में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट।
विडंबना यह है कि भारत में स्कूली आयु वाली जनसंख्या इस गति से कम नहीं हुई है। इसका सीधा मतलब है कि अभिभावक अब सरकारी संस्थानों के बजाय निजी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। निजी स्कूलों में नामांकन 2014-15 के 7.92 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 9.58 करोड़ हो गया है।
स्कूलों की संख्या और छात्रों का असंतुलन
भारत में 2014-15 में लगभग 11.07 लाख कार्यात्मक सरकारी स्कूल थे। तब से अब तक लगभग 93,779 स्कूलों का विलय किया जा चुका है। इसके बावजूद, बड़ी संख्या में स्कूल ऐसे हैं जहाँ छात्रों की संख्या न के बराबर है। 2024-25 में 65,000 से अधिक स्कूल ऐसे पाए गए जहाँ 10 या उससे कम छात्र हैं। वहीं, 5,149 स्कूल ऐसे हैं जहाँ एक भी छात्र नहीं है, फिर भी वहां लगभग 1.44 लाख शिक्षक तैनात हैं।
इन्हीं असंतुलनों को ठीक करने के लिए केंद्र सरकार ने 2017 में 'स्कूलों के युक्तिकरण' (Rationalisation) के दिशा-निर्देश जारी किए थे। तर्क यह दिया गया कि संसाधनों को एक जगह इकट्ठा करने से स्कूल शिक्षा के अधिकार (RTE) के नियमों का बेहतर पालन कर पाएंगे।
विलय के अनपेक्षित परिणाम: विशेषज्ञों की चेतावनी
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत भी स्कूलों के एकीकरण पर जोर दिया गया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति (BGVS) की आशा मिश्रा कहती हैं, "सरकार का दावा है कि विलय से बुनियादी ढांचा और शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी, लेकिन डेटा कुछ और ही कहता है। यह सब केवल एक नैरेटिव बनाने के लिए है।"
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर की निखिता मैरी मैथ्यू द्वारा पाँच राज्यों (आंध्र प्रदेश, असम, हरियाणा, मध्य प्रदेश और ओडिशा) में किए गए एक शोध में पाया गया कि स्कूलों के विलय से गाँव के भीतर कुल नामांकन में 4.45 प्रतिशत की गिरावट आई। उन्होंने पाया कि सरकारी स्कूलों से हटने वाले छात्र निजी स्कूलों में नहीं गए, बल्कि उन्होंने पढ़ाई ही छोड़ दी। इसका मतलब है कि 'विलय' सीधे तौर पर 'ड्रॉपआउट' को बढ़ावा दे रहा है।
दूरी और जिम्मेदारी का बोझ
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रोफेसर एस. श्रीनिवास राव और उनकी टीम द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि विलय के बाद पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरने के बजाय और खराब हुई है। तेलंगाना और ओडिशा जैसे राज्यों में देखा गया कि स्कूल बंद होने के बाद बच्चे का पास के स्कूल में नामांकन कराने की पूरी जिम्मेदारी माता-पिता पर छोड़ दी गई।
कई मामलों में स्कूलों को बंद करने से पहले न तो स्थानीय समुदाय से चर्चा की गई और न ही पंचायत या स्कूल प्रबंधन समितियों (SMCs) को भरोसे में लिया गया। ओडिशा में तो अभिभावकों ने बताया कि स्कूल बंद होते ही बच्चों को बस 'ट्रांसफर सर्टिफिकेट' थमा दिया गया और उन्हें खुद ही नया स्कूल ढूंढने को कहा गया।
अनसुलझे सवाल और भविष्य की चुनौती
कर्नाटक जैसे राज्य जब इन योजनाओं को लागू कर रहे हैं, तो कई बुनियादी सवाल खड़े होते हैं-
यात्रा की दूरी: जब मोहल्ले का स्कूल बंद होता है, तो गरीब घरों के बच्चे लंबी दूरी कैसे तय करेंगे? क्या सरकार परिवहन की गारंटी देगी?
कल्याणकारी योजनाएं: सरकारी स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं हैं, वे पीएम पोषण (मिड-डे मील), मुफ्त वर्दी और पाठ्यपुस्तकों का भी जरिया हैं। स्कूल छूटने का मतलब है इन बुनियादी सुविधाओं का छिन जाना।
निजी स्कूलों की ओर पलायन: क्या सरकारी स्कूलों की दुर्गमता गरीब परिवारों को उन कम लागत वाले निजी स्कूलों की ओर धकेल रही है जहाँ पढ़ाई की कोई गारंटी नहीं है?
बजट की बचत: संसाधनों के नाम पर जो पैसा बच रहा है, क्या उसे वाकई परिवहन और छात्र सुरक्षा पर खर्च किया जा रहा है?
स्कूलों का विलय कागजों पर 'कुशल प्रबंधन' लग सकता है, लेकिन भारत जैसे देश में जहाँ 'पड़ोसी स्कूल' (Neighbourhood School) की अवधारणा शिक्षा की बुनियाद है, वहां स्कूलों को दूर करना खतरनाक साबित हो सकता है। कर्नाटक की इस पहल के नतीजे आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों के लिए एक सबक होंगे। क्या हम वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं, या हम अनजाने में उन बच्चों को शिक्षा से दूर कर रहे हैं जिनके पास सरकारी स्कूल के अलावा कोई और विकल्प नहीं है?
ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल राष्ट्रीय आंकड़ों के जरिए नहीं दिया जा सकता, बल्कि इसके लिए ज़मीनी स्तर पर यह देखना होगा कि यह नीति वास्तव में कैसे काम कर रही है।"
(बेंगलुरु से चंद्रप्पा एम. और लखनऊ से शिल्पी सेन के इनपुट्स के साथ।)
जल्द आ रहा है | भाग 2: विभिन्न राज्यों में स्कूलों के विलय का अनुभव कैसा रहा है?

