
शपथ के दो दिन बाद ही डीके सरकार में असंतोष, राहुल को करना पड़ा हस्तक्षेप
कर्नाटक में मुख्यमंत्री बनने के दो दिन के भीतर ही डीके शिवकुमार मंत्रियों की नाराजगी, विभागों के विवाद और गुटबाजी से घिर गए हैं।
कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री DK Shivakumar (डीके शिवकुमार) का कार्यकाल शुरू से ही उथल-पुथल भरा रहा है। शपथ लेने के महज दो दिन बाद ही उनकी सरकार खुली नाराजगी, मंत्रियों के असंतोष और गुटबाजी से घिर गई है। अभी तक केवल 13 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जबकि 20 कैबिनेट पद खाली हैं। ऐसे में मंत्रिमंडल गठन के पहले चरण ने सरकार को सकारात्मक कारणों से नहीं बल्कि विवादों के कारण सुर्खियों में ला दिया है।
स्थिति तब और बिगड़ गई जब 5 जून को बेंगलुरु पहुंचे Rahul Gandhi और Mallikarjun Kharge के सामने कांग्रेस नेताओं ने मुख्यमंत्री के फैसलों पर खुलकर नाराजगी जताई। दोनों नेता कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के राज्यसभा नामांकन दाखिल करने के लिए राज्य की राजधानी पहुंचे थे।
रामलिंगा रेड्डी का खुला विद्रोह
सबसे बड़ा विवाद वरिष्ठ मंत्री Ramalinga Reddy को लेकर सामने आया। उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें प्रभावशाली "ग्रेटर बेंगलुरु डेवलपमेंट" विभाग मिलेगा, जो शहरी विकास, नागरिक प्रशासन और आगामी बीबीएमपी चुनावों से जुड़ा है। लेकिन इसके बजाय उन्हें सिंचाई विभाग सौंप दिया गया।
इससे नाराज होकर रेड्डी ने कथित तौर पर देर रात शिवकुमार को फोन किया और आरोप लगाया कि उन्होंने 2023 में किया गया वादा तोड़ दिया। उस समय शिवकुमार उपमुख्यमंत्री थे और उन्होंने रेड्डी को यह विभाग वापस देने का आश्वासन दिया था। नाराज रेड्डी ने इस्तीफा भी सौंप दिया और नई सरकार के खिलाफ खुलकर बगावत करने वाले पहले मंत्री बन गए।
हालांकि शिवकुमार ने यह कहकर उन्हें मनाने की कोशिश की कि यह फैसला दिल्ली स्थित कांग्रेस हाईकमान का था, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री की अधिकार क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कई मंत्री अपने विभागों से नाखुश
असंतोष का सिलसिला यहीं नहीं रुका।वरिष्ठ दलित नेता KH Muniyappa ने सार्वजनिक रूप से खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग मिलने पर नाराजगी जताई। उनका कहना था कि वे यह विभाग पहले भी संभाल चुके हैं और उन्हें सामाजिक कल्याण या कृषि विभाग दिया जाना चाहिए था। उन्होंने चेतावनी दी कि उनकी मांग नहीं मानी गई तो वे भी इस्तीफा दे सकते हैं।
वरिष्ठ मंत्री Satish Jarkiholi ने भी सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया। उन्होंने शिवकुमार द्वारा "भारत जोड़ो यूथ क्लब" योजना के तहत 10,000 क्लबों को 10-10 लाख रुपये देने की घोषणा पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।जर्खिहोली ने यह भी कहा कि वे अपने लोक निर्माण विभाग (PWD) से न तो खुश हैं और न ही नाराज, लेकिन हाईकमान के फैसले का सम्मान करेंगे।
के.जे. जॉर्ज और बायरथी सुरेश भी नाराज
वरिष्ठ मंत्री K J George ने भी नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी जानकारी के बिना आईएएस अधिकारी Gaurav Gupta का तबादला कर दिया गया और उनकी जगह Rajendra Cholan को नियुक्त कर दिया गया। जॉर्ज का मानना है कि विभागीय नियुक्तियों में उन्हें नजरअंदाज करना उनके अधिकार को कमजोर करता है।उधर मंत्री Byrathi Suresh भी परिवहन विभाग मिलने से खुश नहीं बताए जा रहे हैं। उन्हें शहरी नियोजन एवं विकास विभाग की उम्मीद थी, लेकिन यह जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री Siddaramaiah के पुत्र Dr Yathindra Siddaramaiah को दे दी गई।सूत्रों के अनुसार सुरेश का मानना है कि यह फैसला राजनीतिक कारणों से लिया गया और इसमें शिवकुमार की भूमिका रही।
एच.के. पाटिल ने दी चेतावनी
वरिष्ठ कांग्रेस नेता HK Patil, जिन्हें अभी तक मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है, ने इस स्थिति को "अच्छा संकेत नहीं" बताया। उन्होंने कहा कि सरकार को इसे चेतावनी के रूप में लेना चाहिए।
राहुल गांधी को करना पड़ा हस्तक्षेप
जैसे-जैसे संकट गहराता गया, राहुल गांधी ने बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास एक बंद कमरे में दोपहर भोज बैठक बुलाई। इसमें डीके शिवकुमार, सिद्धारमैया, उपमुख्यमंत्री G Parameshwara, मुनियप्पा, जॉर्ज, खड़गे और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नए अध्यक्ष B K Hariprasad शामिल हुए।
राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से शिकायतें सामने आने पर नाराजगी जताई और शिवकुमार को निर्देश दिया कि वे जल्द से जल्द मामले का समाधान करें। उन्होंने साफ कहा कि असंतुष्ट नेताओं को या तो मनाया जाए या उनके इस्तीफे स्वीकार किए जाएं, लेकिन सार्वजनिक विवाद पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।राहुल ने शिवकुमार, सिद्धारमैया, खड़गे और कांग्रेस महासचिव K C Venugopal के साथ अलग-अलग बैठकें भी कीं।
भाजपा ने साधा निशाना
सरकार की मुश्किलों को देखते हुए विपक्षी Bharatiya Janata Party (भाजपा) ने भी हमला तेज कर दिया है।विपक्ष के नेता R Ashoka और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष BY Vijayendra ने दावा किया कि सरकार का पहला "विकेट" गिर चुका है और आगे भी अस्थिरता बढ़ सकती है।
उनका कहना है कि यदि मंत्रिमंडल के भीतर यही खींचतान जारी रही तो सरकार को उम्मीद से कहीं पहले गंभीर राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या सिद्धारमैया अब भी सत्ता का केंद्र हैं?
डीके शिवकुमार के लिए स्थिति इसलिए और जटिल हो गई है क्योंकि असंतुष्ट मंत्री और विधायक कथित तौर पर सिद्धारमैया से सलाह लेने पहुंच रहे हैं।बेंगलुरु स्थित सिद्धारमैया का आवास "कावेरी" अब सरकार के भीतर एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में देखा जाने लगा है। बताया जा रहा है कि कई मंत्री अपने विभाग बदलवाने या अधिक प्रभाव हासिल करने के लिए सीधे शिवकुमार के बजाय सिद्धारमैया की शरण ले रहे हैं।यह घटनाक्रम दर्शाता है कि पद छोड़ने के बाद भी सिद्धारमैया का प्रभाव कांग्रेस और राज्य सरकार में बरकरार है।
डीके शिवकुमार के नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा
मुख्यमंत्री बनने के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वाले डीके शिवकुमार के सामने अब असली चुनौती खड़ी हो गई है। महज दो दिनों में उन्हें विभागों को लेकर विवाद, इस्तीफे की धमकियां, गुटबाजी, वरिष्ठ मंत्रियों की आलोचना और राहुल गांधी की चेतावनी जैसे कई मोर्चों का सामना करना पड़ रहा है।
आने वाले हफ्तों में मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के अंतिम बंटवारे पर सबकी नजर रहेगी। यही तय करेगा कि शिवकुमार अपनी सत्ता और नेतृत्व स्थापित कर पाते हैं या कांग्रेस सरकार आंतरिक खींचतान में उलझी रहती है।

