विजय सरकार के खिलाफ आक्रामक डीएमके, संगठन बचाने के लिए अकेले चलो की राह
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विजय सरकार के खिलाफ आक्रामक डीएमके, संगठन बचाने के लिए अकेले चलो की राह

2026 चुनाव में 59 सीटों पर सिमटने के बाद डीएमके सभी 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पर विचार कर रही है।


2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) खुद को एक अभूतपूर्व राजनीतिक स्थिति में पा रही है। चुनाव में महज 59 सीटों पर सिमटने और प्रमुख सहयोगी दलों के साथ छोड़ देने के बाद पार्टी अब अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने पर विचार कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, डीएमके अगले विधानसभा चुनाव में सभी 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकती है।

चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के भीतर गहन आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है। वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग गठबंधन की राजनीति को छोड़कर पार्टी की स्वतंत्र पहचान के साथ चुनावी मैदान में उतरने की वकालत कर रहा है।

चुनावी नतीजों ने दिया बड़ा झटका

चुनाव प्रचार के दौरान डीएमके अध्यक्ष और तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने गठबंधन की जीत को लेकर पूरा भरोसा जताया था। उन्होंने दावा किया था कि डीएमके के नेतृत्व वाला गठबंधन 200 से अधिक सीटें जीतकर सत्ता में वापसी करेगा।

हालांकि, चुनाव परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे। डीएमके केवल 59 सीटें जीत सकी, जबकि उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन भी सीमित रहा। दूसरी ओर अभिनेता से राजनेता बने सी जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) ने अकेले चुनाव लड़ते हुए 108 सीटों पर जीत दर्ज कर ऐतिहासिक सफलता हासिल की और सरकार बनाने में सफल रही।

सहयोगियों ने भी छोड़ा डीएमके का साथ

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब डीएमके के सहयोगी दल—कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और विदुथलाई चिरुथैगल काची (वीसीके)—ने टीवीके सरकार में शामिल होने का फैसला कर लिया। वहीं, वामपंथी दलों ने भी नई सरकार को समर्थन दे दिया। इसके साथ ही डीएमके के नेतृत्व वाला गठबंधन लगभग पूरी तरह बिखर गया।

पार्टी के भीतर उठी अकेले चुनाव लड़ने की मांग

गठबंधन के टूटने के बाद डीएमके के भीतर अकेले चुनाव लड़ने की मांग और मजबूत हो गई है। पार्टी की 38 सदस्यीय चुनाव समीक्षा समिति को मिले फीडबैक में अधिकांश नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भविष्य के चुनाव पार्टी के ‘राइजिंग सन’ चुनाव चिह्न पर स्वतंत्र रूप से लड़ने का समर्थन किया है।

पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि गठबंधन पर अत्यधिक निर्भरता ने डीएमके की संगठनात्मक ताकत को कमजोर किया है और उसकी राजनीतिक पहचान को धूमिल किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सांसद Kanimozhi Karunanidhi ने भी पार्टी के पुनरुत्थान की रणनीति के तहत अकेले चुनाव लड़ने के प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया है।

विजय सरकार पर हमलावर हुए स्टालिन

चुनाव के बाद शुरुआती दिनों में स्टालिन ने विजय के प्रति नरम रुख अपनाया था और उन्हें अपने आवास पर आमंत्रित कर स्वागत भी किया था। लेकिन अब डीएमके ने नई सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना शुरू कर दिया है।

पार्टी लगातार टीवीके सरकार पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जैसी राजनीति करने का आरोप लगा रही है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रतिक्रिया देते हुए स्टालिन ने कहा कि मुख्यमंत्री एआईएडीएमके विधायकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उन्हें अपनी सरकार पर भरोसा है, तो ऐसी कोशिशों की जरूरत क्यों पड़ रही है।

स्टालिन ने आरोप लगाया कि सत्ता बचाने के लिए टीवीके नेतृत्व डीएमके विधायकों के समर्थन की संभावनाएं भी खुली रख रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें भाजपा द्वारा अन्य राज्यों में अपनाई गई रणनीतियों की याद दिलाती हैं और मौजूदा मुख्यमंत्री भाजपा की जेरॉक्स कॉपी की तरह दिखाई देते हैं।

आगे की राह

स्थानीय निकाय चुनावों और उपचुनावों को देखते हुए डीएमके अब गठबंधन सहयोगियों के बिना नई राजनीतिक रणनीति तैयार करती नजर आ रही है। लंबे समय से व्यापक गठबंधन राजनीति पर भरोसा करने वाली पार्टी के लिए सभी 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला एक बड़ा रणनीतिक बदलाव होगा।क्या यह नई रणनीति डीएमके को दशकों की सबसे बड़ी चुनावी हार से उबरने में मदद करेगी या फिर पार्टी को और अधिक राजनीतिक अलगाव की ओर धकेल देगी। तमिलनाडु की राजनीति में आने वाले वर्षों में इसका जवाब देखने को मिलेगा।

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